भीम आर्मी चीफ की रिहाई का श्रेय सुप्रीम कोर्ट को जाता है!

चंद्रशेखर उर्फ रावण की रिहाई का श्रेय मीडिया के माध्यम से योगी सरकार ले रही है। जबकि सच्चाई बिल्कुल अलग है। रावण की रिहाई के श्रेय सुप्रीम कोर्ट को जाता दिखाई देता है. जिसपर पूरा मीडिया खामोश है.
सुप्रीम कोर्ट ने दलित नेता और भीम सेना के संस्थापक चंद्रशेखर आजाद की याचिका पर जब अगस्त में योगी आदित्यनाथ सरकार को नोटिस जारी किया था. तभी से ये माना जाने लगा था कि अब राज्य सरकार बुरी तरह फंस चुकी है. अपनी इस याचिका में चंद्रशेखर ने राष्ट्रीय सुरक्षा कानून के तहत अपनी नजरबंदी को चुनौती दी है. आजाद उर्फ रावण को सहारनपुर दंगों में उनकी कथित भूमिका के कारण जून, 2017 में गिरफ्तार किया गया था. आजाद की गिरफ्तारी के करीब छह महीने के बाद उनके खिलाफ रासुका के प्रावधान भी लगा दिये गये थे.

प्रधान न्यायाधीश दीपक मिश्रा, न्यायमूर्ति एएम खानविलकर और न्यायमूर्ति धनंजय वाई चंद्रचूड़ की पीठ ने दलित नेता की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता कोलिन गोन्साल्विज के इस कथन पर विचार किया कि भीम सेना का नेता बगैर किसी राहत के जेल में बंद है. पीठ ने याचिका पर राज्य सरकार को दस्ती जवाबी नोटिस जारी किया था और अगली सुनवाई के लिए याचिका कर्ता को कभी कोर्ट में सुनवाई करवाने की छूट दी थी. जब अगली सुनवाई 6 सितम्बर को हुई तो सरकार के पास अपनी बात सही साबित करने को कोई जवाब नहीं था.

चूंकि इस याचिका में दावा किया गया है कि आजाद के मौलिक अधिकारों का हनन किया गया है. दंगा करने के आरोपी आजाद को उत्तर प्रदेश पुलिस के विशेष कार्यबल ने आठ जून, 2017 को हिमाचल प्रदेश के डलहौजी से गिरफ्तार किया था. तब से अब तक सरकार उसे जेल में रखे थी। जानकारों का कहना है कि सुप्रीम कोर्ट की सख्ती के चलते सरकार को चंद्रशेखर को रिहा करना पड़ा.