आखिर क्यों एक-दो नहीं, तीन मौकों पर जेटली ने सूचना छिपाई

द टेलीग्राफ ने आज अपने पहले पेज पर लगभग आधे में एक लंबी सी खबर छापी है और दो लाइन के अपने स्तर से असामान्य कहे जा सकने वाले शीर्षक में कहा है कि कैसे जेटली एक-दो नहीं, तीन बार माल्या मामले में देश को सही जानकारी देने से चूक गए (या नहीं दी)। अनिता जोशुआ ने अपनी रिपोर्ट में लिखा है कि वित्त मंत्रालय का नियम है कि जो भी व्यक्ति रीटर्न दाखिल करता है वह उसके साथ में एलान करता है कि जो भी जानकारी दी गई है वह उसके सर्वश्रेष्ठ ज्ञान और विश्वास के अनुसार सही और पूर्ण है। संक्षेप में, पूरा खुलासा है। पर वित्त मंत्री ने माल्या के मामले में जानकारी देने में इस नियम का पालन नहीं किया बल्कि अपने मूल पेशे के सिद्धांत के अनुसार वही बताया जो उनकी राय में जरूरी था।

खबर के मुताबिक जेटली को पहला मौका 10 मार्च 2016 को मिला था जब यह सार्वजनिक हो गया कि माल्या ने एक हफ्ता पहले देश छोड़ दिया है। उस दिन यह मामला राज्य सभा में उठाया गया था और विपक्ष ने पूछा कि कैसे बैंकों का कर्ज नहीं लौटाने वाले को देश छोड़कर भागने का मौका मिला। जेटली के लिए यह सुनहरा मौका था और वे स्वेच्छा से सदन के साथ सूचना साझा कर सकते थे कि माल्या ने संसद के सेंट्रल हॉल में उनसे जबरदस्ती बात करने की कोशिश की थी और मजबूरी में एक वाक्य का आदान-प्रदान हुआ था। जेटली ने गुलाम नबी आजाद को बताया कि जिस दिन माल्या लंदन गया उस दिन देश की किसी एजेंसी को उसे रोकने का आदेश नहीं था। इसके बाद जेटली ने ललित मोदी के मामले में कांग्रेस पार्टी पर आरोप लगाए।

उस समय तो यह विवरण देने जैसा लग रहा था पर अब माल्या के दावे की पृष्ठभूमि में प्रासंगिक हो गया है। दावा है कि माल्या ने जेटली से कहा था कि वह लंदन जा रहा है। जेटली ने इससे इनकार नहीं किया है। भले ही कहा है कि एक वाक्य का ही आदान-प्रदान हुआ था। अगर माल्या ने वाकई लंदन जाने की बात की थी तो सवाल उठता है कि जेटली को यह ख्याल क्यों नहीं आया कि कानून लागू करने वाली एजेंसियों को सतर्क कर देना चाहिए और माल्या को रोकने की कोशिश की जानी चाहिए। अगर जेटली ने वाकई ऐसा कुछ किया हो तो यह अभी तक सार्वजनिक जानकारी में नहीं है। द टेलीग्राफ ने इस संबंध में जेटली से प्रतिक्रिया लेनी चाही पर बताया गया कि वे एक मीटिंग में व्यस्त थे। अखबार ने लिखा है कि जेटली ने शुक्रवार को एक मीटिंग में हिस्सा लिया।

जेटली ने उस समय राज्य सभा में कहा था कि कांग्रेस ने ललित मोदी को भागने से नहीं रोका और माल्या के खिलाफ कोई आदेश नहीं था तो जेटली को बताया गया था कि ग्रीन पीस ऐक्टिविस्ट प्रिया पिल्लई को उसी साल जनवरी में किसी कोर्ट के आदेश के बिना लंदन की उड़ान में जाने से रोका गया था। इस मामले में सरकारी आदेश पर रोक लिया गया पर माल्या के मामले में कहा गया कि कोर्ट का आदेश नहीं था इसलिए रोका नहीं जा सकता था।
इसी तरह, दूसरा मौका कुछ साल बाद तब आया जब राज्य सभा के एक पूर्व सदस्य भालचंद्र मंगेकर ने इस बारे में सवाल पूछा। जवाब था, उसे (माल्या को) कर्ज किसने दिया। अखबार ने आगे की पूरी बात लिखी है। और अखबार के अनुसार जेटली को तीसरा मौका 10 मार्च 2016 को ही शून्य काल के दौरान मिला था। कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने क्रमवार घटी कुछ घटनाओं का जिक्र कर पूछा था कि क्या यह मिलीभगत नहीं है तो लापरवाही भी नहीं है।

उन्होंने कहा था, मुख्य मुद्दा यह है कि माल्या को देश छोड़ने से रोकने के लिए अदालत जाने में देरी करने के लिए क्यों कहा गया। वकीलों ने 29 फरवरी को केस दायर करने के लिए कहा था पर केस 5 मार्च को दायर किया गया। मुख्य मुद्दा है और सदन के नेता (जेटली) इससे बच रहे हैं। इस मौके पर भी पूरा खुलासा किया गया होता तो जेटली ने बताय़ा होता कि माल्या ने उनसे बात करने की कोशिश की।

वरिष्ठ पत्रकार संजय कुमार सिंह की एफबी वॉल से.