चार लाख करोड़ के नए एनपीए और एलआईसी

मुकेश असीम:
माल्या के पीछे जो खबर छिप रही है वो ये कि और 4 लाख करोड़ के कर्ज एनपीए होने की ओर हैं और इन्हें चुनाव तक किसी तरह खींचना है क्योंकि एनपीए का बढ़ता संकट पूरी बैंकिंग और आर्थिक व्यवस्था में संकट को ओर गहरा करेगा जिसका बोझ हमेशा की तरह मेहनतकश जनता पर ही डाला जाना है।
इनमें ढाई लाख करोड़ तो सिर्फ विद्युत उत्पादन क्षेत्र का है। पूंजीवाद के अतिउत्पादन के संकट की वजह से उद्योग पहले ही 70-72% क्षमता पर काम कर रहे हैं इससे बिजली की मांग अनुमान के मुक़ाबले कम है, बिजली बिक नहीं पा रही है (निर्यात के बावजूद भी फालतू है), इसलिए लगभग 40 संयंत्र संकट में हैं। रिजर्व बैंक के 12 फरवरी के सर्कुलर के मुताबिक बैंकों को अब तक इनके खिलाफ दिवालिया होने की कार्रवाई शुरू करनी थी, पर उसके बाद इन कर्जों को एनपीए दिखाना पड़ता जो नहीं किया गया है। पहले इलाहाबाद हाईकोर्ट से इसको रुकवाने का प्रयास हुआ, मगर असफल। पर अब सुप्रीम कोर्ट ने एक 3 लाइन के आदेश से इसे रोक दिया है।
पर और भी बड़ा मामला है आईएल&एफ़एस समूह का जो भारत का लीमैन ब्रदर्स साबित होने की तरफ बढ़ रहा है और कहीं इसकी चर्चा तक नहीं हो रही है। इसमें सबसे ज्यादा 40% शेयर एलआईसी व सरकारी बैंको के हैं पर इसे निजी क्षेत्र की तरह चलाया जाता रहा है (दो महीने पहले इसे डुबाने वाला रवि पार्थसारथी सेहत के बहाने रिटायर हो गया है)। यह बैंकों, म्यूचुअल फंड, बीमा कंपनियों, आदि दे कर्ज लेकर सड़क, हवाई अड्डा, बांध, विद्युत संयंत्र, आदि जैसे ढांचागत उद्योगों को कर्ज देता है। जहां यह कर्ज देता है वहाँ इसके मूल्यांकन के बाद बैंक और भी कर्ज देते हैं। अब इसके प्रोजेक्ट कमाई नहीं कर पा रहे और नकदी तरलता के अभाव में यह डूबने के कगार पर है। कुछ दिन पहले भुगतान की तारीख पर यह कमर्शियल पेपर की किश्त नहीं चुका पाया, इस महीने और भुगतान की तारीख है। अगले 6 महीने में इसे 3600 करोड़ रु चुकाना है पर इसके पास कुल नकदी की संभावना 200 करोड़ रु ही है। इस पर कुल कर्ज लगभग साढ़े नौ हजार करोड़ रु है। पर इससे भी बड़ी बात ये कि इसके प्रोजेक्ट्स को सीधे बैंक कर्ज और भी बड़ी मात्रा में, संभवतः डेढ़ लाख करोड़ रु के फेर में हैं जिनको भी अंततः एनपीए वर्गीकृत करना पड़ेगा।

देखना है कि क्या मोदी सरकार इसे भी आईडीबीआई की तरह इसके सबसे बड़े शेयरधारक एलआईसी के ही गले बांधकर संकट को टालेगी, क्योंकि इस राह आखिर में संकट एलआईसी तक भी पहुंचेगा ही जिसमें मध्यमवर्गीय लोगों ने संकट के जोखिम से निपटने के लिए भारी पैसा लगाया हुआ है, और जो वास्तव में एसबीआई से भी बड़ा वित्तीय संस्थान है।