यूपी फीस नियमन विधेयक ने बढ़ाई अभिभावकों और स्कूलों की मुश्किलें

उत्तर प्रदेश स्ववित्तपोषित स्वतंत्र विद्यालय शुल्क विनियमन अध्यादेश के प्रभावी रहने के बाद अब विधेयक आ गया है। अभिभावकों के साथ साथ अधिकारी और स्कूल संचालक इसके शासनादेश का बेसब्री से इंतजार कर रहे थे। विधेयक और अध्यादेश में प्रथम दृष्टया कोई बड़ा अंतर नजर नहीं आ रहा है। बस इस बार मंडल समिति की जगह जिला समिति सभी फैसले लेगी। इसका गठन डीएम को करना है।

स्कूलों और अभिभावक लड़ा दिए इस विधेयक ने

एडमिशन के समय ही स्कूल छात्रों को उनकी पूरी वार्षिक फीस की जानकारी देगा। स्कूल शैक्षिक सत्र शुरू होने से 60 दिन पहले अपनी वेबसाइट और सूचना पट्ट पर फीस का विवरण देंगे। वर्तमान वर्ष में इस अधिनियम के लागू होने के 30 दिनों के भीतर यह विवरण दिया जाना है।

6 माह बीत जाने के बाद भी इस विधेयक का कोई परिणाम नहीं निकला है। इसके उलट इंडिपेंडेंट स्कूल एसोसिएशन ने रविवार को प्रेस वार्ता कर अभिभावकों से बकाया फीस जल्द जमा करने की अपील की है। बरेली में 18 छात्रों पर लगभग 20 करोड़ रुपये की फीस बकाया है।
बरेली क्लब में प्रेस वार्ता के दौरान चेयरमैन पारुष अरोड़ा ने बताया कि पिछले 6 महीने से अध्यादेश के चलते अभिभावकों में संशय की स्थिति है। इंडिपेंडेंट स्कूल एसोसिएशन से जुड़े 36 स्कूल हैं। इनमें 60 हजार बच्चे पढ़ाई करते हैं। इनमें से 18 हजार ने अभी तक अपनी फीस नहीं दी है। पूर्व अध्यक्ष कैप्टन राजीव ढींगरा ने कहा कि लगभग 20 करोड़ रुपये की फीस अटकी हुई है। बीएल इंटरनेशनल के चेयरमैन राजेश गुप्ता ने कहा कि अगर फीस एक्ट के अनुसार किसी भी स्कूल को फीस समायोजित करनी पड़ती है तो वे तीसरी और चौथी तिमाही की फीस में से उस को समायोजित कर देंगे। ऐसा नहीं है कि अभिभावक ज्यादा फीस जमा करते हैं तो उसको समायोजित नहीं किया जाएगा।

विधेयक के प्रावधान लागू करने पर स्कूल और अभिभावक आमने सामने

अभिभावक पक्ष का कहना है कि जब फीस की जाँच चल रही है तो अभिभावक भी नतीजे का इंतज़ार कर रहे हैं। वाजिब से अतिरिक्त फ़ीस क्यों वसूल रहे स्कूल वाले। कॉपी-किताब से लेकर हर साल करोड़ों पीट रहे तो इस बार जरा सी देर क्या हुई अब पीसी में चिल्ला रहे। फिर खाते-पीते लोग सवाल उठाएँगे कि जब पैसे नहीं हैं तो फिर महँगे स्कूलों में क्यों बच्चों को भेजते हैं ? मगर अभिभावकों का दर्द अभिभावक ही समझ सकेंगे…

दूसरी ओर स्कूल समर्थकों का कहना है कि यह कौन तय करेगा कि फीस वाजिब से ज्यादा है। इसके लिए कमेटी बनी है। वही तय करेगी। जो छह महीने में कर नहीं पाई। स्कूल वाले कह रहे कि यदि फीस कम होती है तो वो समायोजित करेंगे। अभी दो क्वार्टर की फीस जमा होनी बाकी भी है। फिर फीस न जमा करना कहां तक ठीक। 10 हज़ार से ज्यादा ने तो अप्रैल से आज तक एक पैसा जमा नहीं किया। स्कूल फीस मांगे तो डीएम से लेकर सीएम तक शिकायत शुरू हो जाती। क्या इस विधेयक के बाद पढाई बिल्कुल फ्री हो जाएगी जो फीस नहीं जमा की जा रही। बच्चों को शिक्षा देने का काम कर रहे स्कूल संचालक पिछले छह महीने में विलेन बना दिये गए। जब स्कूल फीस समायोजन को राजी हैं तो फीस न जमा करने की बात क्यों हो रही। एक्ट को मनाना स्कूलों की नैतिक जिम्मेदारी है तो फीस जमा करना अभिभावकों की नैतिक जिमेदारी है।

इसपर अभिभावक पक्ष का कहना है कि अभिभावक बरसों से ठगे गए, लूटे गए, कुछ नहीं हुआ, सिर्फ इधर दो महीने के बीच स्कूल वालों पर जरा सा चाबुक चल गया तो संचालक परेशान हो गए. वे दो महीने नहीं झेल पाए और अभिभावक बरसों से झेल रहे. जायज-नजायज फीस सबको पता है. चलिए आप मोटी फीस वसूलिए…कोई बात नहीं….मगर शिक्षकों और शिक्षणेत्तर स्टाफ को भी उसी अनुपात में वेतन मिलना चाहिए….सब कुछ मालिक डकार कर बैठ जाते हैं

जानकारों का कहना है कि यदि आप पूरा विधेयक सही से पढ़ेंगे तो यह नहीं कहेंगे कि उस अनुपात में वेतन मिलना चाहिए। क्यों कि विधेयक के अनुसार पे कमीशन के आसपास भी जाने पर फीस अभी के मुकाबले सातवें आसमान पर पहुंच जाएगी। जिन स्कूलों को चोर और लुटेरा कहा जा रहा, इनके ही दम पर थोड़ी बहुत पढाई का स्तर बचा हुआ है। नहीं तो प्रशासन ने सरकारी स्कूलों पर भी क्या एक्शन ले लिया। कुल मिलाकर इस फीस नियमन विधेयक ने सिर्फ अभिभावकों और स्कूलों की मुश्किलें ही बढ़ाई हैं और कोई लाभ नहीं हुआ है। अभी भी इस पर बहस जारी है।