मानवाधिकार कार्यकर्ताओं की गिरफ्तारी की एसआईटी जांच पर सुप्रीम कोर्ट में तीखी बहस, फैसला सुरक्षित।

भीमा-कोरेगांव में हुई हिंसा के संबंध में माओवादियों से कथित संबंधों को लेकर कवि वरवरा राव, अधिवक्ता सुधा भारद्वाज, सामाजिक कार्यकर्ता अरुण फरेरा, गौतम नवलखा और वर्णन गोंसाल्विस बीते 29 अगस्त से नज़रबंद हैं.

सर्वोच्च न्यायालय ने गुरुवार को पांच मानवाधिकार कार्यकर्ताओं के प्रतिबंधित गुट भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) से संबंध और प्रमुख नेताओं की हत्या की साजिश में संलिप्तता के आरोप की जांच अदालत की निगरानी में विशेष जांच दल (एसआईटी) से करवाने की मांग वाली याचिका पर अपने फैसले को सुरक्षित रख लिया।

पीठ ने महाराष्ट्र पुलिस को भीमा-कोरेगांव हिंसा मामले की जांच से संबंधित केस डायरी पेश करने का निर्देश दिया, जबकि उसने संबंधित पक्षों को 24 सितंबर तक अपने लिखित कथन दाख़िल करने का निर्देश दिया है.

महाराष्ट्र पुलिस ने पिछले साल 31 दिसंबर को एलगार परिषद के सम्मेलन के बाद पुणे के भीमा-कोरेगांव में हिंसा के मामले में दर्ज प्राथमिकी की जांच के सिलसिले में कई स्थानों पर छापे मारे थे. इसके बाद इस साल 28 अगस्त को पुणे पुलिस ने माओवादियों से कथित संबंधों को लेकर पांच कार्यकर्ताओं- कवि वरवरा राव, अधिवक्ता सुधा भारद्वाज, सामाजिक कार्यकर्ता अरुण फरेरा, गौतम नवलखा और वर्णन गोंसाल्विस को गिरफ़्तार किया था.

भीमा कोरेगांव मामले में सुप्रीम कोर्ट में तीखी बहस

भीमा कोरेगांव हिंसा मामले में नक्सल कनेक्शन के आरोपों पर पहले गिरफ्तार और अब नजरबंद ऐक्टिविस्ट्स पर सुप्रीम कोर्ट ने अपना फैसला सुरक्षित रखा है। सुप्रीम कोर्ट ने महाराष्ट्र पुलिस और ऐक्टिविस्ट्स, दोनों पक्षों से सोमवार तक लिखित नोट दाखिल करने को कहा है। आपको बता दें कि ऐक्टिविस्ट्स की तरफ से दाखिल अर्जी में इस मामले को मनगढ़ंत बताते हुए एसआईटी जांच की मांग की गई है।

गुरुवार को सुप्रीम कोर्ट में इस मामले की सुनवाई शुरू हुई तो ऐक्टिविस्टों की तरफ से वरिष्ठ वकील आनंद ग्रोवर पेश हुए। ग्रोवर ने दलील दी कि पुलिस जिस लेटर का जिक्र कर रही है उसका कंटेंट हिंदी में है। ग्रोवर ने बेंच से कहा कि पुलिस कह रही है कि रोना विल्सन और सुधा भारद्वाज ने चिट्ठी लिखी है। उन्होंने आगे कहा कि कंटेंट से साफ जाहिर होता है कि किसी मराठी जानने वाले ने हिंदी में चिट्ठी लिखी है। ग्रोवर ने कहा कि इस आधार पर यह मामला फर्जी लगता है।

ऐक्टिविस्ट्स की तरफ से पेश हुए ऐडवोकेट अभिषेक मनु सिंघवी ने कहा कि पुलिस के ट्रांजिट रिमांड में भी लेटर का जिक्र नहीं है। जिस माओवादी प्लॉटिंग का जिक्र किया जा रहा है उसका कोई रिकॉर्ड कोर्ट में पेश नहीं किया गया। सिंघवी ने कहा कि पुलिस ने मीडिया के सामने लेटर दिखाया कि पीएम की हत्या की साजिश है पर किसी भी एफआईआर में इसका जिक्र नहीं है।’

इतिहासकार रोमिला थापर, अर्थशास्त्री प्रभात पटनायक और देवकी जैन, समाजशास्त्र के प्रो. सतीश पांडे और मानवाधिकार कार्यकर्ता माजा दारूवाला ने शीर्ष अदालत में याचिका दायर कर इन मानवाधिकार एवं नागरिक अधिकार कार्यकर्ताओं की तत्काल रिहाई तथा उनकी गिरफ्तारी की स्वतंत्र जांच कराने का अनुरोध किया था.

इससे पहले बीते 19 सितंबर को सुनवाई करते हुए उच्चतम न्यायालय ने मामले में नज़र रखेगा क्योंकि अटकलों के आधार पर किसी की स्वतंत्रता की बलि नहीं दी जा सकती. न्यायालय ने इसके बाद इन कार्यकर्ताओं की नज़रबंदी की अवधि एक दिन के लिए और बढ़ा दी.

शीर्ष अदालत ने महाराष्ट्र सरकार से कहा कि एक ओर विरोध और असहमति तो दूसरी ओर गड़बड़ी पैदा करने, कानून व्यवस्था की समस्या और सरकार उखाड़ फेंकने के बीच स्पष्ट विभेद होना चाहिए.

न्यायालय ने 29 अगस्त को इन सभी कार्यकर्ताओं को उनके घरों में ही नजरबंद रखने का आदेश दिया था. इसके बाद से वे घरों में ही नजरबंद हैं. शीर्ष अदालत ने 29 अगस्त को इन कार्यकर्ताओं को छह सितंबर तक अपने घरों में ही नज़रबंद करने का आदेश देते हुए कहा था, ‘लोकतंत्र में असहमति सेफ्टी वॉल्व है.’

इससे पहले पुलिस ने पिछले साल पुणे में आयोजित एलगार परिषद की ओर से आयोजित कार्यक्रम से माओवादियों के कथित संबंधों की जांच करते हुए सामाजिक कार्यकर्ता सुधीर धावले, रोना विल्सन, सुरेंद्र गाडलिंग, शोमा सेन और महेश राउत को इसी साल जून महीने में गिरफ्तार किया था.