राफेल सौदा: क्या रक्षा मंत्री एक ‘झूठ’ को छिपाने के लिए ले रही हैं बार बार झूठ का सहारा?

राफेल सौदे में रक्षा मंत्री निर्मला सीतारमण का एक और झूठ पकड़ा गया

राफेल विमान सौदा सरकार के गले की फांस बना हुआ है। अभी तक यह बात विपक्ष, खासतौर से कांग्रेस कहती रही है, लेकिन यह पहला मौका है जब सरकारी कंपनी एचएएल ने इस बारे में खुलकर न सिर्फ बोला है, बल्कि सौदे पर कई किस्म के सवाल भी उठाए हैं।

केंद्र की मोदी सरकार और खासतौर से रक्षा मंत्री निर्मला सीतारमण का एक और झूठ पकड़ा गया है। उन्होंने अभी दो दिन पहले ही कहा था कि सरकारी कंपनी हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (एचएएल) विमान बनाने में सक्षम ही नहीं है। एचएएल के मुखिया रहे टी सुवर्ना राजू ने उनके इस बयान की धज्जियां उड़ा दी हैं। हिंदुस्तान टाइम्स में प्रकाशित खबर के मुताबिक, राजू ने कहा कि अगर सरकार राफेल विमानों के लिए दसाल्ट से मूल समझौते पर अमल करती और उसके साथ साझा काम का समझौता करती तो एचएएल राफेल विमान बना सकता था। टी सुवर्ना राजू अभी तीन सप्ताह पहले ही सेवानिवृत्त हुए हैं। उन्होंने सरकार पर सवाल उठाते हुए कहा, “आखिर सरकार राफेल विमान सौदे से जुड़ी फाइलें सार्वजनिक क्यों नहीं कर रही है?”

हालांकि राजू ने माना कि हो सकता है कि एचएएल द्वारा बनाए गए विमान की प्रति विमान कीमत अधिक हो, लेकिन यह कहना गलत है कि एचएएल के पास आधुनिक लड़ाकू विमान बनाने की योग्यता नहीं है। उन्होंने कहा, “जब एचएएल वायुसेना की ताकत का मुख्य हथियार 25 टन वज़न का सुखोई-30 एकदम शुरू से बना सकता है, तो यह कैसी बातें की जा रही हैं? हम निश्चित तौर पर राफेल बना सकते थे।”

एचएएल के पूर्व प्रमुख के इस खुलासे पर कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने कहा, “रक्षा मंत्री को तो भ्रष्टाचार छिपाने का जिम्मा दिया गया है, लेकिन उनका झूठ पकड़ा गया।” राफेल विमान सौदे को लेकर रक्षा मंत्री के लगातार बदलते बयानों से उनकी विश्वसनीयता संदिग्ध होती जा रही है।

राफेल विमान सौदा यूं भी सरकार के गले की फांस बना हुआ है। कांग्रेस के निरंतर प्रहार और उस पर सरकार की सफाई से कम से कम एक बात तो स्पष्ट हो ही गई है कि सरकार इस मामले में बहुत कुछ छिपा रही है। अभी तक यह बात विपक्ष, खासतौर से कांग्रेस कहती रही है, लेकिन यह पहला मौका है जब सरकारी कंपनी एचएएल ने इस बारे में खुलकर न सिर्फ बोला है, बल्कि सौदे पर कई किस्म के सवाल भी उठाए हैं।

बीते कई महीने से सरकार और कांग्रेस के बीच लगभग रोज ही इस मुद्दे पर आरोप-प्रत्यारोप का दौर जारी है। मंगलवार को ही रक्षा मंत्री ने कहा था कि यूपीए शासन के दौर में ही एचएएल को सौदे से बाहर कर दिया गया था क्योंकि विमान निर्माण की कुछ शर्तों पर सहमति नहीं हो पाई थी।

दरअसल सारा मामला यह है कि केंद्र की मोदी सरकार ने अप्रैल 2015 में फ्रांस सरकार के साथ समझौता कर एकतरफा ऐलान किया था कि भारत 36 राफेल विमान खरीदेगा। सरकार ने इसके साथ यूपीए शासन के दौर में 126 राफेल विमान खरीदने के लिए शुरू हुई बातचीत और शुरुआती समझौतों को बदल दिया था। यूपीए सरकार जो सौदा करने वाली थी उसमें 18 विमान रेडी-टू-फ्लाई यानी एकदम तैयार हालत में मिलने थे और बाकी 108 विमानों का निर्माण एचएएल द्वारा किया जाना था। इसमें फ्रांस की कंपनी से मिले कल-पुर्जे और तकनीक का इस्तेमाल होना था।

1 सितंबर को सेवानिवृत्त हुए एचएएल के प्रमुख टी सुवर्ना राजू ने हिंदुस्तान टाइम्स से बातचीत में कहा, “एचएएल राफेल बनाने वाली कंपनी दसाल्ट द्वारा निर्मित मिराज-2000 लड़ाकू विमानों की देखभाल का काम पिछले 20 साल से कर रही है। इसके अलावा एचएएल मिराज को तकनीकी तौर पर अपग्रेड करने की प्रक्रिया में भी शामिल रही है। और हम राफेल के मामले में भी सक्षम साबित होते।” उनका कहना है कि जो तकनीकी टीम विमानों के अपग्रेड कार्यक्रम में शामिल थी उसका नेतृत्व वही कर रहे थे।

राफेल विमान को लेकर पूरा विवाद क्या है?

दरअसल इस सौदे के कुछ महत्वपूर्ण पड़ाव हैं, जिनसे इस मामले में शक पैदा होता है। पिछले दिनों वरिष्ठ वकील प्रशांत भूषण, पूर्व केंद्रीय मंत्री अरुण शौरी और यशवंत सिन्हा ने इस सौदे में हुए कथित भ्रष्टाचार को उजागर करते हुए कुछ बिंदु उठाए थे, जिससे राफेल विमान सौदे की पूरी कहानी और विवाद साफ हो जाता है। उन्होंने कहा था कि 10 अप्रैल 2015 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और फ्रांस के राष्ट्रपति ओलांद राफेल सौदे का ऐलान करते हैं और बताते हैं कि भारत 36 राफेल लड़ाकू विमान खरीदेगा।

इस घोषणा के 16 दिन पहले यानी 25 मार्च 2015 को राफेल विमान बनाने वाली कंपनी दसाल्ट एविएशन के सीईओ मीडिया से बात करते हुए हिंदुस्तान एरोनॉटिक्स लिमिटेड (एचएएल) के चेयरमैन का ज़िक्र करते हैं। उन्होंने कहा था, ”एचएएल चेयरमैन से बात करने के बाद मैं संतुष्ट हूं कि हम ज़िम्मेदारियों को साझा करने पर सहमत हैं। हम रिक्वेस्ट फॉर प्रपोजल (आरएफपी) की तय की गई प्रक्रिया को लेकर प्रतिबद्ध हैं और मुझे पूरा भरोसा है कि समझौते को पूरा करने और उस पर हस्ताक्षर करने का काम जल्दी हो जाएगा।“

दरअसल दसाल्ट के सीईओ जिस रिक्वेस्ट फॉर प्रपोजल (आरएफपी) की बात कर रहे हैं वह यूपीए सरकार के दौर में हुई बातचीत का हिस्सा है। इससे यह भी साबित होता है कि इस सौदे में एचएएल शामिल है।

फिर 8 अप्रैल 2015 को तत्कालीन विदेश सचिव एस जयशंकर ने एक प्रेस कांफ्रेंस में कहा, “राफेल को लेकर मेरी समझ यह है कि फ्रेंच कंपनी, हमारा रक्षा मंत्रालय और हिंदुस्तान एरोनॉटिक्स लिमिटेड के बीच चर्चा चल रही है। ये सभी टेक्निकल और डिटेल्ड चर्चा है। नेताओं के स्तर पर जो यात्रा होती है उसमें हम रक्षा सौदों को शामिल नहीं करते हैं। वो अलग ही ट्रैक पर चल रहा होता है।“

विदेश सचिव के इस बयान से यह भी साबित होता है कि 8 अप्रैल तक इस सौदे में एचएएल शामिल था।

इसके अलावा एक और तथ्य है कि एचएएल और राफेल बनाने वाली कंपनी दसाल्ट के बीच मार्च 2014 में एक करार हुआ था, जिसमें तय हुआ था कि 108 लड़ाकू विमान भारत में ही बनाए जाएंगे, इसलिए उसे लाइसेंस और टेक्नोलॉजी मिलेगी। करार के तहत 70 फीसदी काम हिंदुस्तान एरोनॉटिक्स लिमिटेड को करना था और बाकी 30 फीसदी दसाल्ट को।

लेकिन 10 अप्रैल 2015 को जब पीएम मोदी सौदे का ऐलान करते हैं तो एचएएल का नाम इस सौदे में से बाहर हो जाता है और उसकी जगह एक नई नवेली कंपनी वजूद में आ जाती है जिसके विमान बनाने के क्षमता और अनुभव पर सवालिया निशान लगे हुए हैं।

इस पूरे विवाद में एक और रोचक पहलू है। अविश्वास प्रस्ताव के दौरान जब कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने इस मुद्दे को उठाया तो सरकार की तरफ से कहा जाता रहा कि इस सौदे से जुड़ी कोई बात नहीं बताई जा सकती, क्योंकि यह देश की सुरक्षा का सवाल है और वह गुप्त करार से बंधी हुई है। लेकिन जैसे-जैसे यह मामला बढ़ता है, दसाल्ट के साथ ऑफसेट करार में शामिल हुई कंपनी रिलायंस डिफेंस बाकायदा चार पन्ने का प्रेस रिलीज़ जारी करती है और सारी जानकारी सार्वजनिक कर देती है।

बहरहाल, राफेल पर बहस जारी है। पक्ष-विपक्ष के बीच तलवारें खिंची हुई हैं। देखना है कि अब किसके हमले में कितनी धार है और किसके हमले चुनाव तक और रफ्तार पकड़ेंगे!