आर्थिक मंदी और आम चुनाव की आहट

कुछ अपनी करनी और कुछ अमरीका की दादागिरी से लगातार बिगड़ते आर्थिक हालात ; डॉलर के मुकाबले धराशायी होता रुपया, आमसमान छूती महंगाई और बेरोजगारी, कच्चे तेल सा बढता भाव और परिणामी बजटीय दबाव, डूबते कार्पोरेटी कर्ज़ को चलते लाइफ सिस्टम पर लेटी बैंकिंग प्रणाली- सब मिला कर आर्थिक मंदी के संकेत ही तो हैं ! चहीते थैलीशाहों के दबाव में और महज़ डिग्रीधारी (दिमागधारी तो कतई नहींं) अर्थशास्त्रियों की सलाह पर देश को खुली प्रयोगशाला बना कर जो नोटबंदी और फिर जीएसटी जैसे रासायनिक बमों का प्रयोग किया गया, उसका यह असर तो होना ही था, सो हुआ भी।

पूरी बैंकिंग व्यवस्था ही चरमरा गई; नोटबंदी और उसके बाद गलती को सुधारने के लिए एक के बाद एक लगातार जो ‘डिजिटल इंडिया’ जैसे नियम बनाए गए उनके चलते बैंकों में नकदी का ढेर तो लग गया और लेकिन कर्ज लेने वाला तो कोई रहा ही नहीं क्योंकि छोटे उद्योग-धंधोंं पर तो नोटबंदी की मेहरबानी से पहले ही ताला लग चुका था। पूरी तरह बाजार की ताकतों पर निर्भर अर्थव्यवस्था की पैरोकार पार्टी और उसकी सरकार उसके बुनियादी नियम को ही भूल गई कि ‘मांग और पूर्ति’ में गहरा संबंध होता है।

बैंकों का धंधा तो दिए गए कर्ज पर मिलने वाले ब्याज से ही चलता है। लेकिन नोटबंदी की मजबूरी में जमा कराए गए पैसों का बैंकों में अंबार लग गया जिस पर उन्हें ब्याज तो अदा करना ही था। लेकिन कर्जा लेने वाले तो जैसे बैंकों का रास्ता ही भूल गए थे। जब नहीं कुछ समझ में आया तो लगे वे धड़ाधड़ फिक्स्ड डिपॉजिट की दरें घटाने बिना विचार किए कि ऐसे जमा करने वालों में एक बड़ा समूह पैंशनधारियों का भी है जिन्होंने पूरा जीवन प्रशासन और अर्थव्यवस्था चलाने में लगा कर पेंशन का हक हासिल किया था। उनकी पेंशन तो वहीं रही और मगर खर्चे वही नहीं रहे ; कुलांचे मार बढ़ती हुई महंगाई ने 50% से भी अधिक इन खर्चों को बढ़ा दिया। कोढ़ में खाज तो यह कि उसके फिक्स्ड डिपॉजिट पर मिलने वाला ब्याज भी लगभग 40% कम हो गया। लेकिन सांसदों और विधायकों के वेतन बादस्तूर बढ़ते रहे। सबसे बुरी खबर तो RBI की तरफ से आई कि नोटबंदी का बताया गया बुनियादी मकसद (काला धन फिर से सिस्टम में लाना) ही फेल हो गया है क्योंकि लगभग सारा पैसा तो वापस आ ही गया !

इसी पृष्ठभूमि में अगले साल आम चुनाव के साथ ही देश के 11 राज्यों में एक साथ चुनाव कराए जाने पर चर्चा शुरू हो गई है। इसके लिए अभी से ही तैयारियां भी शुरू कर दी गई हैं। भाजपा का कथित मकसद तो चुनाव में होने वाले खर्च पर अंकुश लगाना है लेकिन असल में उसे डर सता रहा है कि ये हालात और बिगड़ने वाले हैं और
चुनाव के लिए तैयार तीन राज्यों से मिल रही रपटों से भी यह साफ हो गया है जहां पार्टी के सामने इस बार एंटी इनकंबैंसी का गम्भीर खतरा भी मौजूद है। इसलिए पार्टी प्रधानमंत्री मोदी की लोकप्रियता को भुना कर हालात अपने पक्ष में करने का मन बना रही है।

मध्यप्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ विधानसभाओं का कार्यकाल खत्म होने के बाद इन राज्यों में कुछ समय के लिए राष्ट्रपति शासन लगाने की अटकलों का बाजार भी गर्म है और इन्हें झुटलाया भी नहीं गया है। वहीं खबर यह भी आ रही है कि देश में एक साथ चुनाव कराने को लेकर एक सर्वदलिय बैठक भी बुलाने पर विचार किया जा रहा है। सरकार विधि आयोग की रिपोर्ट का इंतजार कर रही है जो दोनों चुनाव एक साथ कराने के लिए कानूनी ढांचा पेश करेगी।

आम चुनाव यदि इन तीन राज्यों के चुनाव के साथ ही करवा लिए जाते हैं तो इन राज्यों के स्थानीय मुद्दे एकदम गायब हो जाएंगे और उनका स्थान राष्ट्रीय मुद्दे ले लेंगे। इस तरह इन राज्यों में भी फिर से पार्टी की जीत की संभावना बन सकती है क्योंकि दोनों चुनाव मोदी के नाम पर लड़े जा सकते हैं।

दूसरे,जैसा कि पहले भी बताया जा चुका है, केंद्र सरकार की लोकप्रियता घट रही है। अर्थव्यवस्था का पैमाना कह कर प्रचारित किए जाने वाले शेयर बाजार का बुलबुला भी अचानक फूटने लगा है। पार्टी को सत्ता में में लाने वाले थैलीशाह और पारम्परिक समर्थक व्यापारी वर्ग पांव पसारती मंदी के चलते लगातार घटते अपने मुनाफे से परेशान है। इस मंदी का सीधा असर उसकी लोकप्रियता पर होने वाला है। इसलिए वह समय से पहले ही चुनाव करवा कर अपनी बची हुई लोकप्रियता को समय से पहले चुनाव करवा कर भुना लेना चाहती है।

साभार :गुरुचरण सिंह