उर्दू ग़ज़ल:शायरों की “राम राम”

राम शब्द को नफरत की राजनीति ने क्या से क्या बना दिया लेकिन मुहब्बत की ज़ुबान उर्दू की गज़लों में आज भी राम शब्द की महिमा का बखान होता है…
कुछ खास अशआर:-
इस क़दर महफ़ूज़ रहता है कि वो
राम का अवतार लगता है मुझे।।
अहमद सोज़

हम भी तो उस ख़ुदा के बंदे हैं
हम से भी राम-राम कर लीजे।।
नाज़िम नकवी

काबा छूटा ख़ुदा ख़ुदा कर के
दैर में राम राम करते हैं।।
सखी लखनवी

शैख़ उस से पनाह माँगते हैं
बरहमन राम राम करते हैं।।
सबा लखनवी

ख़ूब-रू आश्ना हैं ‘फ़ाएज़’ के
मिल सबी राम राम करते हैं।।
फ़ाइज़ देहलवी

कि बे-अदब का भला एहतिराम क्या करते
जो नास्तिक था उसे राम-राम क्या करते।।
रइस सिद्दीकी

क्या वफ़ादार हैं कि मिलने में
दिल सूँ सब राम-राम करते हैं।।
वली मुहम्मद वली

एक काटा राम ने सीता के साथ
दूसरा बन-बास मेरे नाम पर।।
नासिर शहज़ाद

रथ-यात्रा में मारे गए
राम की लीला वाले राम
और दिसम्बर छे के बा’द
जिस जा देखो क़त्ल-ए-आम
रघुपति राघव राजा राम पतित पावन सीता राम
अशोक लाल
#संकलन_रबीअ_बहार