जीएसटी: पूंजीपतियों को लाभ पहुंचाने के रास्ते

पूंजीवादी पैरोकारों के इस या उस गुट में संकटमोचक ढूँढने वालों को अभी सीएनबीसी पर प्रसारित रघुराम राजन का साक्षात्कार देखना चाहिए। कई मोदी विरोधी राजन के बड़े भक्त हैं और समझते हैं कि ऊर्जित पटेल के बजाय राजन के रहने से अर्थव्यवस्था की स्थिति और कुछ होती।
पर राजन की मोदी सरकार को सबसे बड़ी सलाह है कि वह चुनाव की वजह से वित्तीय घाटे पर से नजर न हटाये अर्थात जनता को करों के बोझ से कोई राहत न दे। सरकार ठीक वही कर रही है – पेट्रोल-डीजल पर भारी टैक्स वसूलकर वित्तीय घाटा नियंत्रित कर रही है। पर सवाल यह है कि हर ओर बढ़ते अप्रत्यक्ष करों, नियंत्रित मूल्यों-किरायों-भाड़ों-शुल्कों में भयंकर वृद्धि तथा जनकल्याण कार्यों पर खर्च में भारी कटौती के बावजूद वित्तीय घाटा आया कहाँ से? कुछ वजहें –
1. पूँजीपतियों को प्रत्यक्ष करों में दी गई बड़ी छूट – हालत यह है कि नोटबंदी के बाद के सारे प्रचार के बावजूद कॉर्पोरेट टैक्स में चालू साल में मात्र 1% का इजाफा हुआ है – मुद्रास्फीति के साथ देखें तो असल में यह गिरावट है।
2. जीएसटी की वसूली हर महीने सरकारी अनुमान से औसत 20 हजार करोड़ कम है। पर टैक्स तो कम नहीं हुआ, कीमतें तो कहीं कम नहीं हुईं, जनता तो खरीदी पर टैक्स भर रही है, फिर जीएसटी की वसूली में कमी क्यों है? ये ढाई लाख करोड़ कहाँ जा रहा है?
3. सरकारी बैंकों के कर्ज राइट ऑफ के जरिये लाखों करोड़ की राहत पूँजीपतियों को दी गई है जिसकी भरपाई जनता से वसूले गए अप्रत्यक्ष करों से ही की गई है।
4. संकटग्रस्त पूँजीपतियों और सत्ता के करीबियों को बड़े सरकारी ठेकों के जरिये पहुंचाया गया फायदा, शुल्क आदि में छूट जैसे अदानी पर 200 करोड़ का जुर्माना माफ करना।
पर वित्तीय घाटे की इन असली वजहों पर सवाल उठाने के बजाय ‘लोकप्रियता’ के लिए जनता को राहत देने से बचने की सलाह देने वाले पूंजीपति वर्ग के ही हित की हिफाजत में लगे हुए हैं चाहे उनके आपसी मतभेद कुछ भी क्यों न हों।

मुकेश असीम