सुप्रीम कोर्ट: दागियों के चुनाव लडऩे से रोकने के मामले में कल आएगा फैसला

राजनीति में अपराधीकरण पर गंभीर चिंता व्यक्त करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को कहा कि उसे गंभीर स्थिति के बारे में संसद को याद दिलाना है और आपराधिक आरोपों का सामना करने वाले व्यक्तियों को चुनाव लड़ने से रोकने के लिए संविधान में संशोधन करना संसद का संवैधानिक दायित्व है।

मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा की अध्यक्षता में पांच जजों की संविधान पीठ ने पब्लिक इंटरेस्ट फाउंडेशन, पूर्व चुनाव आयुक्त जेसी लिंगदोह और बीजेपी नेता अश्विनी कुमार उपाध्याय द्वारा दायर याचिकाओं पर सुनवाई के दौरान ये प्रारंभिक टिप्पणी की थी जिसमें कानून का एक महत्वपूर्ण सवाल उठाया गया है कि गंभीर आपराधिक मामले का सामना कर रहे व्यक्ति को विधानसभा या संसदीय चुनाव लड़ने से अयोग्य करार कब किया जाए, आरोपपत्र दाखिल करने या आरोप तय हो या फिर सजा सुनाए जाने के बाद।

पीठ जिसमें जस्टिस रोहिंटन नरीमन,जस्टिस एएम खानविलकर, जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ और जस्टिस इंदु मल्होत्रा भी शामिल हैं, इस सवाल की जांच कर रही है कि क्या संविधान के अनुच्छेद 102 (ए) से (डी) से परे अनुच्छेद 102 (ई) के तहत अदालत द्वारा सदस्यता के लिए अयोग्यता निर्धारित की जा सकती है ?

सुप्रीम कोर्ट इस बात को तय करेगा कि जिन नेताओं के खिलाफ गंभीर मामले में आरोप तय हो गए हैं, उनके चुनाव लडऩे पर रोक लगाई जाए या नहीं? संविधान पीठ में उस याचिका पर सुनवाई हुई थी जिसमें मांग की गई है कि गंभीर अपराधों में जिसमें सजा 5 साल से ज्यादा हो और आरोप तय होते हैं तो उसके चुनाव लड़ने पर रोक लगाई जाए।