सुप्रीम कोर्ट: IPC की  धारा 497 पर सुनाएगा फैसला, क्या व्यभिचार के लिए सिर्फ पुरुष ही जिम्मेदार है इस का मिलेगा जवाब

व्यभिचार की IPC की धारा 497 की वैधता को चुनौती देने वाली रिट याचिका पर सुनवाई पूरी कर सुप्रीम कोर्ट में पांच जजों की संविधान पीठ ने फैसला सुरक्षित रख लिया था जिसे कल सुनाया जाएगा। संविधान पीठ को ये तय करना है कि सिर्फ पुरुष को दंडित करने वाली ये धारा असंवैधानिक है या नहीं।

वहीं सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार की ओर से पेश ASG पिंकी आनंद ने व्यभिचार को लेकर भारतीय दंड संहिता यानी IPC की धारा 497 के कानून का समर्थन किया। उन्होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट भी ये कह चुका है कि व्यभिचार विवाह संस्थान के लिए खतरा है और परिवारों पर भी इसका असर पड़ता है। पिंकी आंनद ने कहा कि भारतीय समाज में हो रहे विकास और बदलाव के मद्देनजर किसी कानून को देखा जाना चाहिए ना कि पश्चिमी देशों के लिहाज से।

दो अगस्त को सुप्रीम कोर्ट ने यह स्पष्ट कर दिया कि व्यभिचार कानून में ये तर्कसंगत आधार नहीं है कि वह केवल पुरुष को दंडित करे, उसे आरोपी के रूप में पेश करे और महिला को पीड़ित के रूप में माने जबकि इसमें दोनों पक्षों को समान लाभ प्राप्त होता है।

मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा, जस्टिस रोहिंटन नरीमन, जस्टिस एएम खानविलकर, जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ और जस्टिस इंदु मल्होत्रा ने आईपीसी धारा 497 की वैधता को चुनौती देने वाली रिट याचिका की सुनवाई के दौरान ये प्रारंभिक टिप्पणी की थी।

शुरुआत में सीजेआई ने कहा, “अगर यौन आजादी एक मौलिक अधिकार है तो व्यभिचार अकेले पुरुष के लिए आपराधिक कानून क्यों रहना चाहिए। अगर व्यभिचार महिला के पुरुष की संपत्ति होने का आधार है तो धारा 497 भेदभावपूर्ण है। “

न्यायमूर्ति चंद्रचूड़ ने याचिकाकर्ता जोसेफ शाइन के लिए उपस्थित वकील कलीमेश्वम राज को बताया, “शादी में प्रत्येक साथी विवाह की पवित्रता को बरकरार रखने के लिए समान रूप से जिम्मेदार है। अगर एक विवाहित महिला अपने पति के अलावा किसी विवाहित व्यक्ति के साथ यौन संभोग करती है तो अकेले आदमी को दंडित क्यों किया जाना चाहिए जबकि महिला भी अपराध में बराबर हो? ऐसा भेदभाव

प्रकट रूप से मनमाना दिखाई देता है। ” सीजेआई ने कहा, “एक महिला को संपत्ति के रूप में पेश करना बेतुका है। अगर किसी महिला के पति की सहमति के साथ विवाहेतर संबंध है तो कोई अपराध नहीं है। क्या महिलाएं अपने पतियों की संपत्ति हैं? “

न्यायमूर्ति नरीमन ने हैरानी जताई कि भारतीय दंड संहिता में इस तरह के प्रावधान का मसौदा तैयार किया गया।

सीजेआई ने कहा, “यह प्रावधान पीड़ित के रूप में मानते हुए पत्नी को राहत प्रदान करता है। यह भी ध्यान देने योग्य है कि जब अपराध दोनों द्वारा किया जाता है तो अपराध के लिए एक उत्तरदायी होता है लेकिन दूसरा गायब हो जाता है। ऐसा लगता है कि यह एक सामाजिक धारणा पर आधारित है। “
आइपीसी 497 में प्रावधान है कि अगर कोई विवाहित महिला अपने दांपत्य संबंध से बाहर किसी ऐसे पुरुष से संबंध बनाती है, जो यह जानता है कि वह विवाहित है, तो उसका पति उस पुरुष के खिलाफ व्यभिचार (एडल्टरी) की शिकायत दर्ज करा सकता है और अपराध साबित होने पर ऐसे व्यक्ति को अधिकतम 5 साल और जुर्माने की सजा हो सकती है। इस तरह के अपराध को बलात्कार नहीं माना जाएगा और इसके तहत विवाहित महिला के खिलाफ कोई शिकायत नहीं की जा सकेगी। ऐसे में इस कानूनी प्रावधान पर कई संवैधानिक सवाल खुद-ब-खुद उठते हैं। पहला पति, पत्नी पर व्यभिचार के खिलाफ कोई शिकायत नहीं कर सकता है। दूसरा आपसी सहमति से भी किसी पुरुष द्वारा किसी विवाहित महिला से संबंध बनाए जाने पर भी केवल पुरुष को ही सजा का प्रावधान है। यदि पत्नी का किसी और पुरुष से यौन संबंध पति की सहमति से होता है, तो उसे व्यभिचार नहीं माना जाएगा। अगर कोई पुरुष किसी अविवाहित महिला से यौन संबंध बनाता है तो किसी भी स्थिति में यह व्यभिचार नहीं माना जाएगा।