फैसला: न्यायमूर्ति चंद्रचूड़ ने आधार परियोजना को पूरी तरह असंवैधानिक बताते हुए इसपर ऐतिहासिक विरोध दर्ज किया।

आधार कार्ड पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला आ चुका है । इस फैसले के साथ ही आधार कार्ड को संंवैधानिक तौर पर मंजूरी भी दी गई है । लेकिन, क्या आप जानते है कि आधार कार्ड पर जस्टिस चंद्रचूड़ की राय सभी न्यायाधीशों से अलग है । डी हां, जस्टिस चंद्रचूड़ ने आधार को पूरी तरह से असंवैधानिक बताया है ।

संवैधानिक गारंटी पर तकनीकी हेरफेर से समझौता नहीं किया जा सकता”

बहुमत के फैसलों से हटते हुए सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश न्यायमूर्ति डीवाई चंद्रचूड़ ने कहा कि पूरी आधार परियोजना असंवैधानिक है।

आधार अधिनियम 2016 को धन विधेयक के रूप में पास करने को न्यायमूर्ति चंद्रचूड़ ने असंवैधानिक कहा। आधार पर बहुमत का फैसला न्यायमूर्ति सिकरी ने सुनाया पर न्यायमूर्ति का फैसला बहुमत का फैसला नहीं था। उन्होने कहा कहा कि इस विधेयक को धन विधेयक के रूप में पेश करने में कोई गलती नहीं हुई।

“आधार अधिनियम को धन विधेयक के रूप में पास करना संविधान के साथ धोखा है,” न्यायमूर्ति चंद्रचूड़ ने अपने फैसले में कहा। उन्होने कहा कि किसी विधेयक को धन विधेयक के रूप में वर्गीकृत करने के अध्यक्ष के अधिकार की न्यायिक समीक्षा की जानी चाहिए। इस फैसले में कानून को पास करने में राज्यसभा की भूमिका पर भी प्रकाश डाला गया।

“अगर संविधान को राजनीतिक प्रभुत्व, ताकत के प्रभाव और अथॉरिटी से अपने को बचाना है तो कानून के शासन को मानना जरूरी है,” न्यायमूर्ति चंद्रचूड़ ने विरोध में दिये अपने फैसले में कहा।

सुप्रीम कोर्ट के फैसले में आधार परियोजना को सूचनातामक निजता और डाटा संरक्षण का उल्लंघन करने वाला बताया गया।

न्यायमूर्ति चंद्रचूड़ ने कहा, “संवैधानिक गारंटी पर तकनीकी हेरफेर से समझौता नहीं किया जा सकता”।

आधार अधिनियम की धारा 57 को संविधान के अनुच्छेद 14 और 21 का उल्लंघन करने वाला बताया गया। यह भी कहा गया कि अगर निजी एजेंसियों को आधार नंबर के प्रयोग की छूट दी गई तो इन आंकड़ों का दोहन होगा।

फैसले में कहा गया कि आधार लोगों पर निगरानी को बढ़ाएगा और इसकी संरचना ऐसी है जिसमें इससे जुड़े आंकड़ों के लीक होने की आशंका है। फैसले में पीठ ने कहा, “डाटा हमेशा ही उस व्यक्ति में निहित होना चाहिए”। यह कहा गया कि आधार अधिनियम के कई प्रावधान ऐसे हैं जिनमें बायोमेट्रिक डाटा के संग्रहण के लिए आक्रामक तरीके अपनाए जाते हैं।

सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि सम्पूर्ण आधार परियोजना जो कि वर्ष 2009 में शुरू हुई, संवैधानिक अवैधता का शिकार है। यह भी कहा गया कि सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के अन्तरिम आदेश का उल्लंघन किया जिसने आधार को सुविधाओं की प्राप्ति के लिए प्रयोग में लाने पर प्रतिबंध लगाया था।

फैसले में कहा गया कि मोबाइल और बैंक खातों को आधार से जोड़ने के लिए किसी पर दबाव नहीं डाला जा सकता। दूरसंचार कंपनियों को कहा गया कि वे आधार नंबर को तत्काल नष्ट कर दें। यह निर्देश भी दिया गया कि सम्पूर्ण आधार डेटा को नष्ट कर दिया जाए।