SC में यूपीए का ‘आधार’ जीता-NDA का हारा, सिंघवी ने किया दावा

उच्चतम न्यायालय ने बुधवार को अपने फैसले में केन्द्र की महत्वाकांक्षी योजना आधार को संवैधानिक रूप से वैध बताया है

सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को अपने फैसले में केन्द्र की महत्वाकांक्षी योजना आधार को संवैधानिक रूप से वैध बताया लेकिन योजनाओं में आधार लिंक करने को लेकर सुप्रीम कोर्टने तल्ख टिप्पणियां की. प्रधान न्यायाधीश दीपक मिश्रा की अध्यक्षता वाली पांच सदस्यीय संविधान पीठ ने बुधवार को अपने फैसले में कहा कि सर्वश्रेष्ठ होने के मुकाबले अनोखा होना बेहतर है.

चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा, न्यायमूर्ति ए. एम. खानविलकर और अपनी ओर से न्यायमूर्ति ए. के. सीकरी ने आधार पर फैसला पढ़ा और कहा कि आधार संवैधानिक रूप से वैध है. इस बीच कांग्रेस नेता अभिषेक मनु सिंघवी ने दावा किया कि आधार पर मोदी सरकार को सुप्रीम कोर्ट से बड़ा झटका लगा है. कोर्ट ने मौजूदा केंद्र सरकार के 90 फीसदी दावों को खारिज कर दिया है.

उन्होंने कहा, ‘केंद्र की मोदी सरकार ने यूपीए द्वारा गठित अच्छे आधार बिल को पूरी तरीके से खत्म कर दिया था. बीजेपी से सीखा जा सकता है कि कैसे किसी अच्छी अवधारणा को खत्म किया जाता है. उन्होंने कहा कि आधार के फायदों से इनकार नहीं किया जा सकता. साथ ही सिंघवी ने बताया कि अब आधार बैंक खाते, यूजीसी, मोबाइल कनेक्शन, सीबीएसई के लिए जरूरी नहीं रहा. साथ ही निजी कंपनियां आधार नंबर की मांग नहीं कर सकती हैं.’

सुब्रमण्यम स्वामी ने कोर्ट के फैसले पर जताई खुशी

कांग्रेस के अलावा बीजेपी नेता सुब्रमण्यम स्वामी ने भी सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर खुशी जताई है. स्वामी ने कहा कि आधार पर कोर्ट का फैसला उनकी उम्मीद के मुताबिक ही आया है. उन्होंने कहा, ‘कैलिफॉर्निया में मैंने बताया था कि मेरे सामने 50 डॉलर देकर एक सुप्रीम कोर्ट के जज की आधार से जुड़ी सभी जानकारी डाउनलोड की गईं. मैं कोर्ट के फैसले का पूर्ण रूप से स्वागत करता हूं. ये बिलकुल मेरे विरोध के अनुरूप है.’

डेटा प्रोटेक्शन लॉ पर स्वामी ने कहा, ‘ये बेहद जरूरी है, डेटा बेचा जा रहा है, अमेरिकन कंपनी सब जगह बेच रही है और वो ब्लैक लिस्टेड कंपनी है. मुझे लगता है कि इस पर केस चलना चाहिए.’ उन्होंने कहा कि आधार से संबंधित लगभग सभी दावों को कोर्ट ने खारिज कर दिया है. इसलिए सरकार को इसके लिए डेटा प्रोटेक्शन लॉ जरूर लाना चाहिए.

यूपीए लेकर आई थी ‘आधार बिल’

बता दें कि पहली बार 2009-10 में यूपीए सरकार ‘आधार बिल’ को लेकर आई थी. 2009 के जनवरी महीने में प्लानिंग कमीशन ने UIDAI पर नोटिफिकेशन जारी किया था. इसके बाद 2010-11 में नेशनल आइडेंटीफिकेशन अथॉरिटी ऑफ इंडिया बिल पेश किया गया. हालांकि, इस दौरान विपक्ष में बैठी एनडीए गठबंधन ने इसका पूरजोर विरोध किया.

बाद में इसे वित्त विभाग की संसदीय समिति को सौंप दिया गया. इस समिति की रिपोर्ट में निजता और संवेदनशीलता जैसे अहम मुद्दे उठाए गए. हालांकि, नवंबर, 2012 में रिटायर्ड जज के एस पुत्तास्वामी समेत कई लोगों ने सुप्रीम कोर्ट में 31 याचिकाएं दाखिल कीं. इसके बाद 23 सितंबर, 2013 को कोर्ट ने सुनवाई की और कहा कि सभी पर सुनवाई की जाएगी.

विपक्ष में एनडीए का विरोध, सत्ता में आने पर किया समर्थन

संसद में विपक्ष की भूमिका में रहने के दौरान ‘आधार’ का एक सूर में विरोध करने वाली एनडीए का सत्ता में आते ही आधार के प्रति रुख बदल गया. सरकार ने आधार को महत्वकांक्षी योजना बताया और उसमें 90 फीसदी बदलाव कर 2016 में सदन में ‘आधार बिल’ पेश किया.

सरकार ने बदले हुए आधार को सरकारी योजनाओं में दी जाने वाली सब्सिडी से जोड़ दिया. लेकिन इसे राज्य सभा में पेश करने के बजाय सरकार ने मार्च, 2016 में इसे मनी बिल के तौर पर पास करा लिया.

मनी बिल के तौर पास कराने के बाद कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने आधार को मनी बिल के तौर पर पास कराने के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की. इसके बाद आधार एक्ट की वैधता को लेकर एसजी वोमबातकेरे और मोदी सरकार के बीच केस शुरू हुआ.

इस बीच आधार को लेकर उच्च न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश के एस पुत्तास्वामी की याचिका सहित कुल 31 याचिकाएं दायर की गयी थीं. जिसके बाद प्रधान न्यायाधीश दीपक मिश्रा के नेतृत्व में पांच न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने 38 दिनों तक सुनवाई की और सुनवाई के बाद 10 मई को मामले पर फैसला सुरक्षित रख लिया था.