विचारों को लोगों को पहुंचाने में क्या था प्रिंट मीडिया का योगदान

17 दिसंबर 1928 को लाहौर में सांडर्स की हत्या और 8 अप्रैल 1929 को दिल्ली की केंद्रीय असेंबली में भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त के बम फेंके जाने से पहले भारत की जनता को भगत सिंह के बारे में जानकारी बहुत अधिक नहीं थी. लेकिन इन घटनाओं के बाद न सिर्फ हिंदुस्तान, बल्कि दुनिया भर में भगत सिंह का नाम गूंजने लगा.

1929 से 1934 तक के पांच वर्षों में हिंदुस्तान की अनेक जबानों, खास कर हिंदी, उर्दू, पंजाबी और अंग्रेजी के अखबारों/पत्रिकाओं, किताबों में भगत सिंह और उनके क्रांतिकारी आंदोलनों संबंधी इतनी सामग्री छपी कि उनमें से काफी प्रकाशनों पर ब्रिटिश सरकार ने पाबंदी लगाई, अनेक लेखकों/संपादकों को बरसों की जेल की हवा खिलाई.

न जाने कितनी पत्रिकाओं में छपी भगत सिंह की कहानी

विडंबना यह कि 1947 के बाद इस सारी सामग्री को विस्मृति के कुएं में धकेल दिया गया. हिंदी में ‘प्रताप’ (कानपुर) ‘चांद’, ‘अभ्युदय’ और ‘भविष्य’ (इलाहाबाद), ‘महारथी’ और ‘अर्जुन’ (दिल्ली), उर्दू में ‘रियासत’, ‘किरती’ (अमृतसर), ‘मिलाप’, ‘बंदेमातरम’ (लाहौर), पंजाबी में ‘अकाली ते परदेसी’ (अमृतसर) ‘अकाली’, अंग्रेजी में ‘ट्रिब्यून’ और ‘दी पीपल’ (लाहौर), ‘लीडर’ (इलाहाबाद), ‘हिंदुस्तान टाइम्स’ (दिल्ली) आदि में इतनी अधिक सामग्री छापी गई कि उनका संपादन कर छापा जाए तो कई किताबें बन जाएंगी. लेकिन विडंबना यह है कि आज इस सामग्री को अगर ढूंढना हो तो नेहरू मेमोरियल म्यूजियम और लाइब्रेरी, नई दिल्ली को छोड़कर शायद ही कोई और ऐसा संस्थान हो जहां इस सामग्री के थोड़े से हिस्से का भी व्यवस्थित रूप मिलता हो!

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आधुनिक भारत के इतिहास पर केंद्रित इस पुस्तकालय ने निश्चय ही भारत के स्वतंत्रता संग्राम से जुड़ी काफी सामग्री का अच्छा संकलन और संयोजन किया है, हालांकि पूरी तरह या बहुत अधिक सामग्री यहां भी उपलब्ध नहीं है. इस पुस्तकालय में सैकड़ों हिंदुस्तानी अखबारों, मैगजीनों की माइक्रो फिल्में बनाकर उन्हें सुरक्षित रूप दिया गया है. बहुत से स्वतंत्रता सेनानियों से साक्षात्कार लेकर उन्हें सुरक्षित रूप दिया है, भगत सिंह के अनेक साथियों के साक्षात्कार इस पुस्तकालय के ‘मौखिक इतिहास कक्ष’ में सुरक्षित हैं. कई क्रांतिकारियों के साक्षात्कार चार-चार सौ पृष्ठों तक फैले हैं.

क्रांतिकारी पक्ष को दबाया गया है

जाहिर है कि इस सामग्री का उपयोग भारत के स्वाधीनता संग्राम का वास्तविक इतिहास लिखने में किया जा सकता है, कुछ हद तक किया भी गया है, लेकिन भारतीय इतिहास लेखन के अपने अंतर्विरोध भी उभरकर सामने आए हैं. एक ओर सांप्रदायिक संकीर्ण धार्मिक नजरिए से ऐतिहासिक तथ्यों को विकृत कर प्रस्तुत किया गया है तो दूसरी ओर गांधी-नेहरू परंपरा को स्वाधीनता संग्राम का वर्चस्वकारी पहलू दिखाने के सायास उद्देश्य से हिंदुस्तानी इतिहास के क्रांतिकारी पक्ष को उपेक्षित किया गया है.

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इलाहाबाद से पद्म कांत मालवीय द्वारा सम्पादित ‘अभ्युदय’ ने भगत सिंह के मुकदमे और फांसी के हालात पर भरपूर सामग्री छापी और 8 मई 1931 को प्रकाशित उनका ‘भगत सिंह विशेषांक’ ब्रिटिश सरकार द्वारा जब्त कर लिया गया. इस अंक में एक और अंक के प्रकाशन की भी घोषणा थी, लेकिन इस अंक पर जब्ती की कार्रवाई के बाद संभवतः विशेषांक का दूसरा हिस्सा कभी छप ही नहीं पाया. ‘अभ्युदय’ का भगत सिंह अंक जब जब्त किया गया था या उससे पहले भी संपादक कृष्णकांत मालवीय के नाम के साथ कोष्ठकों में (जेल में) छपता था.

पद्म कांत मालवीय की तरह कृष्णकांत मालवीय का भी विशेष परिचय नहीं मिलता. राष्ट्रीय अभिलेखागार ने ‘अभ्युदय’ के 8 मई 1931 अंक के साथ ही अन्य अंकों में प्रकाशित भगत सिंह की सामग्री को एक संकलन में प्रकाशित कर सराहनीय कार्य किया, लेकिन इस अंक की जानकारी आम पाठकों को नहीं है.

चांद सम्पादक रामरख सिंह सहगल द्वारा सम्पादित ‘भविष्य’ में भगत सिंह को फांसी के बाद के हालात का जीवंत चित्रण हुआ है, साथ ही नए लाहौर षड्यंत्र केस जो भगत सिंह की फांसी के बाद चला और जिसमें प्रसिद्ध हिंदी लेखक यशपाल भी अभियुक्त थे, का विवरण मिलता है. दिल्ली षड्यंत्र केस भी भगत सिंह के साथियों, जिनमें यशपाल, उनकी पत्नी प्रकाशवती और सच्चिदानंद हीरानंद ‘अज्ञेय’ भी शामिल थे, की मनोरंजन कार्रवाई का चित्रण भी मिलता है. ‘अज्ञेय’ ने पांच वर्षों की यंत्रणादाई जेल झेली, इसे हिंदी के बहुत कम पाठक जानते हैं और यह और भी कम कि चंद्रशेखर आज़ाद से वे निकट से परिचित थे और उनके प्रशंसक भी.

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हिंदुस्तानी पत्रकारिता का जज्बा

‘भविष्य’ और ‘अभ्युदय’ के साथ उस समय की हिंदुस्तानी पत्रकारिता से अगर आज के भारत को पत्रकारिता से तुलना की जाए तो पता चलता है कि कैसे स्वाधीनता आंदोलन के दिनों में पत्रकारिता में कुर्बानी का जज़्बा या और पत्रकारिता एक मिशन थी, आज की तरह शुद्ध मुनाफा कमाने का व्यापार नहीं.

उस दौर में सैकड़ों संपादकों को जेल हुई और जब संपादक/पत्रकार गिरफ्तार होकर जेल जाते थे तो उनके साथी उन्हें फूलमालाएं पहनाकर विदा करते थे. जिन दिनों ‘भविष्य’ में भगत सिंह पर सामग्री छप रही थी तो एक ही अंक को बार-बार छापना पड़ता था और प्रसार संख्या हमेशा कई हजार होती थी. ‘भविष्य’ के कुछ अंकों की संख्या 14 हजार से ऊपर तक गई, ऐसे ही ‘चांद’ का फांसी अंक भी कई हजार ग्राहकों ने खरीदा.

साहित्य और इतिहास-दोनों में दस्तावेजों और उनकी प्रमाणिकता का महत्व अत्यधिक है, विशेषतः ऐसे व्यक्तित्वों संबंधी जो लोकप्रिय हो जाएं, लेकिन जिनकी छवि पर संकीर्ण हितों से रंग चढ़ाने की कोशिश की जाए. भगत सिंह के तो चित्रों के साथ भी छेड़छाड़ की गई है. भगत सिंह के चार वास्तविक चित्र दस बरस, 16 बरस, 20 बरस और 21 बरस की उम्र के उपलब्ध हैं. अंतिम चित्र दिल्ली के कश्मीरी गेट के फोटोग्राफर द्वारा 3 या 4 अप्रैल 1929 को बटुकेश्वर दत्त के साथ और अलग-अलग खींचा चित्र है, जो अपने हैट के कारण दुनिया भर में प्रसिद्ध है.

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भगत सिंह की तस्वीरें

उससे पहले लाहौर पुलिस स्टेशन में मई-जून 1927 में बिना पगड़ी के खुले केशों वाला चित्र है, उससे पहले लाहौर के नेशनल कॉलेज का 1923 का चित्र है, जिसमें भगत सिंह ने सफेद कुर्ता पायजामा और पगड़ी पहनी है और उससे पहले कुर्सी पर बैठे 10-11 साल के बच्चे भगत सिंह का चित्र है.

न तो केंद्र, न राज्य सरकारें, न संगठन अपने विज्ञापनों, पोस्टरों के भगत सिंह के इन चार वास्तविक चित्रों का प्रयोग करते हैं, वे अपनी मनचाही पेंटिंग, वास्तविक चित्र के एवज में करते हैं, जिनमें कई पेंटिंग तो बहुत भद्दी और भगत सिंह का विकृत रूप प्रस्तुत करती है. खासकर पीली पगड़ी और हाथ में पिस्तौल वाली पेंटिंग. इस तरह की विकृत पेंटिंग का विरोध होना चाहिए और केवल भगत सिंह के वास्तविक चित्रों में से किसी एक या उससे अधिक चित्रों का उपयोग सरकारों और संगठनों को करना चाहिए. ऐसा न करके वे शहीद का सम्मान करने की बजाय अपमान करते हैं.

(चमन लाल जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय, दिल्ली से सेवामुक्त प्रोफेसर हैं और भगत सिंह के दस्तावेजों के संपादन के साथ वे उन पर बहुत सी अन्य पुस्तकों के लेखक भी हैं.