भीमा कोरेगांव: जस्टिस चंद्रचूड़ ने याद दिलाया इसरो जासूसी केस, कहा- ‘मीडिया ट्रायल’ हुआ

जस्टिस चंद्रचूड़ ने यह भी कहा, “अलग राय लोकतंत्र के प्रेशर कुकर में सेफ्टी वॉल्व की तरह है. इसे पुलिस की कड़ी ताकत से बांधा नहीं जा सकता.”

सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा की अगुवाई में तीन जजों की बेंच ने अपने आखिरी फैसलों में से एक भीमा कोरेगांव हिंसा केस में गिरफ्तार पांच एक्टिविस्टों को रिहा करने से मना कर दिया. उनकी कस्टडी को बढ़ा दिया गया है. हालांकि, जस्टिस चंद्रचूड़ ने अन्य जजों से अलग राय रखते हुए इस मामले में ‘मीडिया ट्रायल’ होने की बात कही.

जस्टिस चंद्रचूड़ ने ‘इसरो जासूसी केस’ की याद दिलाते हुए कहा कि इसरो वैज्ञानिक नंबी नारायण को गलत तरीके से फंसाया गया था. इसके लिए उन्हें अच्छा हर्जाना दिए जाने का आदेश दिया गया जो एक उदाहरण है.

नारायण को 50 लाख रुपये का हर्जाना दिया गया था क्योंकि उन्हें संवेदनशील जानकारी लीक करने के गलत आरोप में फंसाया गया था. जस्टिस चंद्रचूड़ ने कहा कि यह हमारे लिए एक ‘रिमाइंडर’ होना चाहिए.

सुप्रीम कोर्ट बेंच के अधिकांश फैसले में मानवाधिकार कार्यकर्ताओं की कस्टडी 4 हफ्तों के लिए बढ़ा दी गई है और उन्हें ट्रायल कोर्ट में जाने के लिए कहा गया है. इसी बीच बेंच ने महाराष्ट्र पुलिस को भी जांच जारी रखने की मंजूरी दी है. कोर्ट ने गिरफ्तारियों में एसआईटी जांच कराने की अपील खारिज कर दी है.

हालांकि, अलग राय रखने वाले जज ने मीडिया और पुणे पुलिस को लेकर गंभीर बातें कही हैं. जस्टिस चंद्रचूड़ ने अपने फैसले में कहा, “सुधा भारद्वाज की कथित तौर पर लिखी चिट्ठी को टीवी चैनल पर दिखाया गया. पुलिस सलेक्टिव होकर जांच की सूचनाएं मीडिया को दे रही है. जिससे जांच की संजीदगी पर असर पड़ रहा है.”

पुणे पुलिस ने अगस्त के अंत में पूरे देश में छापेमारी करते हुए 5 मानवाधिकार कार्यकर्ताओं को गिरफ्तार किया था. इनमें वरवर राव, वर्नोन गोन्साल्विस, सुधा भारद्वाज, अरुण फरेरा, गौतम नवलखा और आनंद तेलतुंबडे शामिल थे.

जस्टिस चंद्रचूड़ ने कहा जिस तरह से ज्वाइंट कमिश्नर ऑफ पुलिस ने इन लोगों के खिलाफ जनता की राय को प्रभावित करने के लिए सबूतों को टीवी चैनलों को दिया, उससे उनकी प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचने के साथ स्वतंत्र जांच भी प्रभावित हुई है.”

जस्टिस चंद्रचूड़ ने जो बातें कही हैं, वे सितंबर की शुरुआत में बॉम्बे हाईकोर्ट में विवाद का विषय बनी हुई थीं.

बॉम्बे हाईकोर्ट ने भीमा कोरेगांव केस में 5 एक्टिविस्टों और वकीलों की गिरफ्तारी पर प्रेस ब्रीफिंग करने को लेकर महाराष्ट्र पुलिस की फटकार भी लगाई थी. हाईकोर्ट ने मामले के कोर्ट में चलने के दौरान जांच करने वाली एजेंसियों से प्रेस कॉन्फ्रेंस करने को लेकर जवाब तलब भी किया था. कोर्ट ने आगे ऐसा न करने के लिए कहा था.

उन्होंने कहा, कार्यकर्ताओं की गिरफ्तारी पर इतिहासकार रोमिला थापर की ओर से जारी जनहित याचिका जारी रखने योग्य है. उन्होंने कहा कि पुलिस की तरफ से की गई मीडिया ब्रीफिंग जांच में भेदभाव का संदेह पैदा करती है.

जस्टिस चंद्रचूड़ ने सबूतों को सार्वजनिक करने पर पुणे पुलिस की फटकार लगाई. उन्होंने इसे, “तिरस्कारयोग्य व्यवहार” कहा.

जस्टिस चंद्रचूड़ ने कहा कि एक स्पेशल इंवेस्टिगेशन टीम को नियुक्त किया जाना चाहिए, जो मामले की जांच को देख सके. उन्होंने कहा, “यह एसआईटी की नियुक्ति के लिए फिट केस है. एसआईटी जांच की मॉनीटरिंग सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में होनी चाहिए. पर माइनॉरिटी में होने के चलते यह केवल अकादमिक स्तर पर ही रह जाएगा.”

जस्टिस चंद्रचूड़ ने यह भी कहा, “अलग राय लोकतंत्र के प्रेशर कुकर में सेफ्टी वॉल्व की तरह है. इसे पुलिस की कड़ी ताकत से बांधा नहीं जा सकता.”