मोदी शासन में बेहद तेज़ी से बढ़े हैं शिक्षित बेरोज़गार, 20 साल का टूटा रिकॉर्ड, मजदूरों की आय भी 10 हजार से कम

मोदी शासन में बेहद तेज़ी से बढ़े हैं शिक्षित बेरोज़गार
अजीम प्रेमजी विश्वविद्यालय के सेंटर फॉर सस्टेनेबल एम्प्लॉयमेंट द्वारा ‘स्टेट ऑफ वर्किंग इंडिया’ शीर्षक से किये गए अध्ययन के मुताबिक उच्च आर्थिक विकास के आंकड़ों के बावजूद भारत नौकरियों का सृजन करने में नाकाम रहा है।

कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी राफेल डील को लेकर पीएम मोदी पर लगातार हमलावर हैं। इसी कड़ी में बुधवार को उन्होंने देश में बढ़ती बेरोजगारी का हवाला देते हुए राफेल डील को लेकर एक बार फिर पीएम मोदी पर निशाना साधा। देश में बढ़ती बेरोजगारी की स्थिति से जुड़ी एक खबर शेयर करते हुए उन्होंने अपने ट्वीट में लिखा, “प्रधानमंत्री का “किल” इंडिया कार्यक्रम। हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (एचएएल) से 30 हजार करोड़ रुपये का ठेका छीनकर विमान बनाने में बिल्कुल ‘अकुशल’ व्यक्ति को राफेल का ठेका देना प्रधानमंत्री मोदी का ‘किल इंडिया’ कार्यक्रम है। और इस बीच, देश के करोड़ों कुशल युवा 20 वर्षों के सबसे उच्च स्तर की बेरोजगारी का सामना कर रहे हैं।”

इस समय भारत में बेरोजगारी की दर पिछले 20 वर्षों के सबसे उच्चतम स्तर पर पहुंच गई है। अजीम प्रेमजी विश्वविद्यालय के सेंटर फॉर सस्टेनेबल एम्प्लॉयमेंट द्वारा ‘स्टेट ऑफ़ वर्किंग इंडिया’ विषय पर किये गए अध्ययन के मुताबिक उच्च आर्थिक विकास के बावजूद भारत नौकरियों का सृजन करने में नाकाम रहा है। रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत में बेरोजगारी हर साल बढ़ रही है। कई सालों तक तो बेरोजगारी की दर 2 से 3 प्रतिशत के बीच रही, लेकिन 2015 में यह बढ़कर 5 प्रतिशत पर पहुंच गई। सबसे गंभीर स्थिति युवाओं की है। अध्ययन के मुताबिक युवाओं और शिक्षित लोगों में बेरोजगारी की दर 16 प्रतिशत तक पहुंच गई है, जो 20 वर्षों में सबसे अधिक है।

श्रम बाजार, नीति निर्माताओं, पत्रकारों, शोधकर्ताओं और सामाजिक कार्यकर्ताओं से इकट्ठा किए गए आंकड़ों पर आधारित इस रिपोर्ट में कहा गया है कि जीडीपी में 10 फीसदी की वृद्धि की तुलना में रोजगार में 1 फीसदी से भी कम की वृद्धि देखने को मिली है, जो बेरोजगारी की गंभीर स्थिति को दर्शाती है। रिपोर्ट में कहा गया है कि ज्यादातर क्षेत्रों में मजदूरी प्रति वर्ष करीब 3 फीसदी बढ़ी है, लेकिन उसके बावजूद 82 प्रतिशत पुरुष और 92 प्रतिशत महिला श्रमिक 10,000 रुपये प्रति माह से भी कम कमाते हैं। यह बताता है कि देश में बताए जा रहे विकास से श्रमिकों की तुलना में नियोक्ताओं को कहीं ज्यादा फायदा हुआ है। रिपोर्ट में जॉबलेस ग्रोथ की बात कही गई है।