यूपी: बरेली में मंकी मलेरिया से अब तक 7,862 लोगों की मौत, IVRI करेगा रिसर्च

उत्तर प्रदेश के बरेली जिले में अब तक प्लाज्मोडियम फाल्सीपेरम मलेरिया से 7, 862 मौतें हो चुकी हैं। वहीं 14,988 लोगों में प्लाज्मोडियम विवैक्स मलेरिया की पुष्टि हुई है। इन मामलों के सामने आने के बाद अब स्वास्थ्य विभाग ने इंडियन वेटरनरी रिसर्च इंस्टिट्यूट (आईवीआरआई) से मंकी मलेरिया पर रिसर्च करने को कहा है।

बरेली के आंवला डिविजन इस बीमारी से सर्वाधिक प्रभावित है। स्वास्थ्य विभाग ने आरवीआरआई के वैज्ञानिकों से कहा है कि इस डिविजन के बंदरों का ब्लड सैंपल लेकर मंकी मलेरिया की जांच करें। विभाग के अधिकारियों ने बताया कि दक्षिण पूर्वी एशिया में बंदरों में मलेरिया पैरासाइट, प्लाज्मोडियम नोलेसी का कारण है, इसलिए विभाग चाहता है कि यहां पर भी इसकी संभावनाओं के वास्तविक कारण पता चल सके।

एडी हेल्थ डॉ. प्रमिला गौर ने बताया कि उनकी ओर से संबंधित विभाग को पत्र भेजा गया है। बंदरों और मानव शरीर के जीन्स एक तरह के होते हैं। हम लोग यह अध्ययन करके इस संभावना का पता लगाना चाहते हैं कि लोगों में इस मलेरिया का कारण बंदर हैं। यह अध्ययन भवष्य में मलेरिया के मामलों को लेकर मददगार साबित होगा।
डॉ. दीपक कुमार ने बताया कि यह संभव है कि बंदरों को मलेरिया का पैरासाइट्स फीमेल अनॉफिलीज मच्छरों से मिलते हों। यह अध्ययन बहुत आवश्यक है क्योंकि अभी तक मंकी मलेरिया को लेकर कोई अध्ययन नहीं हुआ है।
वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गनाइजेशन की मानें तो साउथ ईस्ट एशिया में जो लोग वर्षावन या जंगलों की सीमा वाले इलाके में रहते हैं वे मंकी मलेरिया पैरासाइट से प्रभावित हो सकते हैं। इस पैरासाइट का जीवन 24 घंटे का होता है। इसमें लोगों को 9 से 12 दिन तक बुखार आता है।
आईवीआरआई के पैरासाइटॉलजी विभाग के एचओडी डॉ. दिनेश चंद्र ने कहा कि वैज्ञानिकों को अंडमान निकोबार द्वीप में मंकी मलेरिया के केस मिले हैं। हालांकि बहुत कम संभावना है कि बरेली में मंकी मलेरिया होगा लेकिन हम रिसर्च करेंगे। इस रिसर्च में पूर्व डॉक्टर वाई डी शर्मा की मदद ली जाएगी जो उस टीम का हिस्सा थे जिन्होंने अंडमान के आदिवासी लोगों में प्लाज्मोडियम नोलेसी पाया था।