बरेली: बुखार से एक ही गांव में 25 मौतें लेकिन सरकारी आंकड़ों में कोई नहीं

अकेले बरेली में 13 से 24 सितंबर के बीच सरकारी जांच में मलेरिया के 17,110 रोगी पाए गए हैं. इसमें से 6071 मामले जानलेवा मलेरिया (पीएफ) के हैं. आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक, 25 सितंबर तक इस रोग से बरेली जिले में 25 लोग मारे गए हैं. न्यूज़ पोर्टल द क्विंट ने इस मामले में रिपोर्ट तैयार की जिसके अनुसार जिले के चार ब्लॉक मझगवां, रामपुर, फरीदपुर और भमौरा बुरी तरह से इस बीमारी की चपेट में हैं. मझगवां के बेहेटा बुजुर्ग में हालात सबसे ज्यादा खराब हैं. सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, यहां बुखार से अब तक 9 मौतें हो चुकी हैं.

बब्बू अब्बासी के पड़ोसी बाबू हसन भी मातमपुर्सी की लिए उनके घर पहुंचे हुए थे. मौत के सरकारी आंकड़े सुनने के बाद वो गुस्से से भर गए. बाबू कहते हैं:

“ये लोग क्या कह रहे हैं 9 ही मौतें हुईं. जिस दिन लक्की की मौत हुई थी ना, उस दिन गांव में एक साथ 6 लाशें उठी थीं. इसके सात दिन पहले 5 लोग एक साथ मरे थे. हर मोहल्ले में 10-5 आदमी मरे हैं. सिर्फ 9 मौतें कैसे हो सकती हैं? सरकार झूठ बोल रही हैं.”

मौतें बुखार की वजह से हो चुकी हैं.”

सरकारी आंकड़ों में नूरपुर से एक भी मौत दर्ज नहीं है. मीनाक्षी, प्रेमपाल, लक्की, नरगिस, हनीफ, बांके, मोतिनी, ओमपाल, गंगादेवी, चन्द्रकली, ओमपाल जैसे दर्जनों नाम भी इन दस्तावेजों में नहीं हैं.

सरकारी तंत्र के काम करने का अपना तरीका है. यह किसी भी आपदा को दो स्तर पर नियंत्रित करता है. पहला जमीन पर और दूसरा दस्तावेजों में. जिला प्रशासन की तरफ से मीडिया को मलेरिया फेल्सीफेरम से हुई मौतों के बारे में जो आंकड़ा उपलब्ध करवाया जा रहा है, वो महज 25 का है. कमाल की बात यह है कि अगर एक केस को छोड़ दें, तो इनमें से एक भी मौत जिला अस्पताल में नहीं हुई है. ये वो लोग हैं, जिनकी मौत घर या निजी अस्पतालों में हुई है.

मेडिकल विभाग ने उन लोगों की मौत की जांच करवाई, जिनके मरने की वजह बुखार बताई जा रही थी. इसमें से लक्षणों के आधार और लैब रिपोर्ट के हिसाब से 25 लोगों की मौत की वजह मलेरिया फेल्सीफेरम पाई गई. इस जांच में 21 ऐसे लोग भी हैं, जिनकी मौत की वजह मलेरिया फेल्सीफेरम की बजाए डेंगू या दूसरे किस्म के बुखार हैं. इस सरकारी दस्तावेजों में ही यह आंकड़ा 46 का हो जाता है.

मझगवां का सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र

इसके अलावा इस दस्तावेज में एक और बात गौर करने वाली है. 14 सितंबर और उसके बाद हुई चार मौतों की वजह के खांचे में मलेरिया फेल्सीफेरम साफ तौर पर लिखा गया है. इससे पहले हुई 21 मौतों में एक वजह के खांचे में एक ही मजमून चिपका दिया गया है, जो कि कुछ इस तरह है:

“एपडीमीओलॉजिकल ओरल ऑटोप्सी और मरीज की मेडिकल हिस्ट्री जांचने से मरीज के प्लेटलेट्स और हीमोग्लोबिन में गिरावट की बात सामने आई है. स्ट्रेन इंफेक्शन के साथ वायरल फीवर जैसे लक्षण दिखाई देते हैं.”

इसके अलावा इस दस्तावेज में एक और बात गौर करने वाली है. 14 सितंबर और उसके बाद हुई चार मौतों की वजह के खांचे में मलेरिया फेल्सीफेरम साफ तौर पर लिखा गया है. इससे पहले हुई 21 मौतों में एक वजह के खांचे में एक ही मजमून चिपका दिया गया है, जो कि कुछ इस तरह है:

“एपडीमीओलॉजिकल ओरल ऑटोप्सी और मरीज की मेडिकल हिस्ट्री जांचने से मरीज के प्लेटलेट्स और हीमोग्लोबिन में गिरावट की बात सामने आई है. स्ट्रेन इंफेक्शन के साथ वायरल फीवर जैसे लक्षण दिखाई देते हैं.”

हालांकि मेडिकल विभाग फिलहाल इन मरीजों की मौत की वजह मलेरिया फेल्सीफेरम मान तो रहा है, लेकिन यह सिर्फ जुबानी गुणा-भाग है. लिखित तौर पर इनमें से 21 लोगों की बीमारी के बारे में साफ तौर पर कुछ नहीं कहा गया है. शहर में निजी अस्पताल चलाने वाले एक डॉक्टर इस हवाले से मौजूं बात कहते नजर आते हैं:

दरअसल पिछले कई सालों से बरेली और आस-पास के इलाकों में अगस्त से अक्टूबर तक इस किस्म के रोगों की भरमार रहती है. पिछले तीन सालों से डेंगू के काफी मामले देखे गए थे. इस बार मलेरिया फेल्सीफेरम का जोर है. जब इस किस्म के रोग बेकाबू हो जाते हैं, तो प्रशासन का दबाव बढ़ जाता है.पिछले कुछ सालों में डेंगू के मामले में भी यही देखा गया. सरकार शुरुआत में मानने को तैयार नहीं थी कि यह डेंगू है. उस समय निजी अस्पताल सरकारी दबाव से बचने के लिए ‘डेंगू लाइक फीवर’ कहने लगे थे. यह इस साल भी हो रहा है.मलेरिया (पीएफ) संभलने का बहुत मौका नहीं देता. झोलाछाप डॉक्टर के भरोसे बैठे ग्रामीण लोग सबसे ज्यादा इसका शिकार बन रहे हैं. मौत का असल आंकड़ा सरकारी आंकड़े से काफी बड़ा है.

बरेली में 13 सितंबर से 24 सितंबर के बीच महज 10 दिनों में मलेरिया के 17,110 मामले सामने आए हैं. यह आंकड़े सिर्फ सरकारी एजेंसियों के हैं. इसके अलावा हेल्थ सेक्टर में निजी क्लिनिक से लेकर बड़े अस्पतालों तक का एक मकड़जाल है. यहां आ रहे रोगियों की संख्या अभी गणना से बाहर है. ऐसे में महज दो दर्जन लोगों के आंकड़ों को कितना भरोसेमंद माना जा सकता है?

दरअसल पिछले कई सालों से बरेली और आस-पास के इलाकों में अगस्त से अक्टूबर तक इस किस्म के रोगों की भरमार रहती है. पिछले तीन सालों से डेंगू के काफी मामले देखे गए थे. इस बार मलेरिया फेल्सीफेरम का जोर है. जब इस किस्म के रोग बेकाबू हो जाते हैं, तो प्रशासन का दबाव बढ़ जाता है.पिछले कुछ सालों में डेंगू के मामले में भी यही देखा गया. सरकार शुरुआत में मानने को तैयार नहीं थी कि यह डेंगू है. उस समय निजी अस्पताल सरकारी दबाव से बचने के लिए ‘डेंगू लाइक फीवर’ कहने लगे थे. यह इस साल भी हो रहा है.मलेरिया (पीएफ) संभलने का बहुत मौका नहीं देता. झोलाछाप डॉक्टर के भरोसे बैठे ग्रामीण लोग सबसे ज्यादा इसका शिकार बन रहे हैं. मौत का असल आंकड़ा सरकारी आंकड़े से काफी बड़ा है.

बरेली में 13 सितंबर से 24 सितंबर के बीच महज 10 दिनों में मलेरिया के 17,110 मामले सामने आए हैं. यह आंकड़े सिर्फ सरकारी एजेंसियों के हैं. इसके अलावा हेल्थ सेक्टर में निजी क्लिनिक से लेकर बड़े अस्पतालों तक का एक मकड़जाल है. यहां आ रहे रोगियों की संख्या अभी गणना से बाहर है. ऐसे में महज दो दर्जन लोगों के आंकड़ों को कितना भरोसेमंद माना जा सकता है?बरेली में 13 सितंबर से 24 सितंबर के बीच महज 10 दिनों में मलेरिया के 17,110 मामले सामने आए हैं. यह आंकड़े सिर्फ सरकारी एजेंसियों के हैं. इसके अलावा हेल्थ सेक्टर में निजी क्लिनिक से लेकर बड़े अस्पतालों तक का एक मकड़जाल है. यहां आ रहे रोगियों की संख्या अभी गणना से बाहर है. ऐसे में महज दो दर्जन लोगों के आंकड़ों को कितना भरोसेमंद माना जा सकता है?दरअसल पिछले कई सालों से बरेली और आस-पास के इलाकों में अगस्त से अक्टूबर तक इस किस्म के रोगों की भरमार रहती है. पिछले तीन सालों से डेंगू के काफी मामले देखे गए थे. इस बार मलेरिया फेल्सीफेरम का जोर है. जब इस किस्म के रोग बेकाबू हो जाते हैं, तो प्रशासन का दबाव बढ़ जाता है.पिछले कुछ सालों में डेंगू के मामले में भी यही देखा गया. सरकार शुरुआत में मानने को तैयार नहीं थी कि यह डेंगू है. उस समय निजी अस्पताल सरकारी दबाव से बचने के लिए ‘डेंगू लाइक फीवर’ कहने लगे थे. यह इस साल भी हो रहा है.मलेरिया (पीएफ) संभलने का बहुत मौका नहीं देता. झोलाछाप डॉक्टर के भरोसे बैठे ग्रामीण लोग सबसे ज्यादा इसका शिकार बन रहे हैं. मौत का असल आंकड़ा सरकारी आंकड़े से काफी बड़ा है.बरेली में 13 सितंबर से 24 सितंबर के बीच महज 10 दिनों में मलेरिया के 17,110 मामले सामने आए हैं. यह आंकड़े सिर्फ सरकारी एजेंसियों के हैं. इसके अलावा हेल्थ सेक्टर में निजी क्लिनिक से लेकर बड़े अस्पतालों तक का एक मकड़जाल है. यहां आ रहे रोगियों की संख्या अभी गणना से बाहर है. ऐसे में महज दो दर्जन लोगों के आंकड़ों को कितना भरोसेमंद माना जा सकता है?बरेली में 13 सितंबर से 24 सितंबर के बीच महज 10 दिनों में मलेरिया के 17,110 मामले सामने आए हैं. यह आंकड़े सिर्फ सरकारी एजेंसियों के हैं. इसके अलावा हेल्थ सेक्टर में निजी क्लिनिक से लेकर बड़े अस्पतालों तक का एक मकड़जाल है. यहां आ रहे रोगियों की संख्या अभी गणना से बाहर है. ऐसे में महज दो दर्जन लोगों के आंकड़ों को कितना भरोसेमंद माना जा सकता है?

दरअसल पिछले कई सालों से बरेली और आस-पास के इलाकों में अगस्त से अक्टूबर तक इस किस्म के रोगों की भरमार रहती है. पिछले तीन सालों से डेंगू के काफी मामले देखे गए थे. इस बार मलेरिया फेल्सीफेरम का जोर है. जब इस किस्म के रोग बेकाबू हो जाते हैं, तो प्रशासन का दबाव बढ़ जाता है.पिछले कुछ सालों में डेंगू के मामले में भी यही देखा गया. सरकार शुरुआत में मानने को तैयार नहीं थी कि यह डेंगू है. उस समय निजी अस्पताल सरकारी दबाव से बचने के लिए ‘डेंगू लाइक फीवर’ कहने लगे थे. यह इस साल भी हो रहा है.मलेरिया (पीएफ) संभलने का बहुत मौका नहीं देता. झोलाछाप डॉक्टर के भरोसे बैठे ग्रामीण लोग सबसे ज्यादा इसका शिकार बन रहे हैं. मौत का असल आंकड़ा सरकारी आंकड़े से काफी बड़ा है.बरेली में 13 सितंबर से 24 सितंबर के बीच महज 10 दिनों में मलेरिया के 17,110 मामले सामने आए हैं. यह आंकड़े सिर्फ सरकारी एजेंसियों के हैं. इसके अलावा हेल्थ सेक्टर में निजी क्लिनिक से लेकर बड़े अस्पतालों तक का एक मकड़जाल है. यहां आ रहे रोगियों की संख्या अभी गणना से बाहर है. ऐसे में महज दो दर्जन लोगों के आंकड़ों को कितना भरोसेमंद माना जा सकता है?बरेली में 13 सितंबर से 24 सितंबर के बीच महज 10 दिनों में मलेरिया के 17,110 मामले सामने आए हैं. यह आंकड़े सिर्फ सरकारी एजेंसियों के हैं. इसके अलावा हेल्थ सेक्टर में निजी क्लिनिक से लेकर बड़े अस्पतालों तक का एक मकड़जाल है. यहां आ रहे रोगियों की संख्या अभी गणना से बाहर है. ऐसे में महज दो दर्जन लोगों के आंकड़ों को कितना भरोसेमंद माना जा सकता है?
दरअसल पिछले कई सालों से बरेली और आस-पास के इलाकों में अगस्त से अक्टूबर तक इस किस्म के रोगों की भरमार रहती है. पिछले तीन सालों से डेंगू के काफी मामले देखे गए थे. इस बार मलेरिया फेल्सीफेरम का जोर है. जब इस किस्म के रोग बेकाबू हो जाते हैं, तो प्रशासन का दबाव बढ़ जाता है.पिछले कुछ सालों में डेंगू के मामले में भी यही देखा गया. सरकार शुरुआत में मानने को तैयार नहीं थी कि यह डेंगू है. उस समय निजी अस्पताल सरकारी दबाव से बचने के लिए ‘डेंगू लाइक फीवर’ कहने लगे थे. यह इस साल भी हो रहा है.मलेरिया (पीएफ) संभलने का बहुत मौका नहीं देता. झोलाछाप डॉक्टर के भरोसे बैठे ग्रामीण लोग सबसे ज्यादा इसका शिकार बन रहे हैं. मौत का असल आंकड़ा सरकारी आंकड़े से काफी बड़ा है.बरेली में 13 सितंबर से 24 सितंबर के बीच महज 10 दिनों में मलेरिया के 17,110 मामले सामने आए हैं. यह आंकड़े सिर्फ सरकारी एजेंसियों के हैं. इसके अलावा हेल्थ सेक्टर में निजी क्लिनिक से लेकर बड़े अस्पतालों तक का एक मकड़जाल है. यहां आ रहे रोगियों की संख्या अभी गणना से बाहर है. ऐसे में महज दो दर्जन लोगों के आंकड़ों को कितना भरोसेमंद माना जा सकता है?बरेली में 13 सितंबर से 24 सितंबर के बीच महज 10 दिनों में मलेरिया के 17,110 मामले सामने आए हैं. यह आंकड़े सिर्फ सरकारी एजेंसियों के हैं. इसके अलावा हेल्थ सेक्टर में निजी क्लिनिक से लेकर बड़े अस्पतालों तक का एक मकड़जाल है. यहां आ रहे रोगियों की संख्या अभी गणना से बाहर है. ऐसे में महज दो दर्जन लोगों के आंकड़ों को कितना भरोसेमंद माना जा सकता है?
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बरेली में 13 सितंबर से 24 सितंबर के बीच महज 10 दिनों में मलेरिया के 17,110 मामले सामने आए हैं. यह आंकड़े सिर्फ सरकारी एजेंसियों के हैं. इसके अलावा हेल्थ सेक्टर में निजी क्लिनिक से लेकर बड़े अस्पतालों तक का एक मकड़जाल है. यहां आ रहे रोगियों की संख्या अभी गणना से बाहर है. ऐसे में महज दो दर्जन लोगों के आंकड़ों को कितना भरोसेमंद माना जा सकता है?बरेली में 13 सितंबर से 24 सितंबर के बीच महज 10 दिनों में मलेरिया के 17,110 मामले सामने आए हैं. यह आंकड़े सिर्फ सरकारी एजेंसियों के हैं. इसके अलावा हेल्थ सेक्टर में निजी क्लिनिक से लेकर बड़े अस्पतालों तक का एक मकड़जाल है. यहां आ रहे रोगियों की संख्या अभी गणना से बाहर है. ऐसे में महज दो दर्जन लोगों के आंकड़ों को कितना भरोसेमंद माना जा सकता है?