लोकतंत्र के लिए सबसे ख़तरनाक है: न्यायपालिका और कार्यपालिका की मिलीभगत

रबीअ बहार

लोकतंत्र की मौत का संकेत है किसी देश में न्यायपालिका और सरकार के बीच साठगांठ:जस्टिस चेलामेश्वर

कल इलाहाबाद हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश डीबी भोन्सले के सम्मान में कार्यक्रम आयोजित हुआ। इस कार्यक्रम की तस्वीर सरकार की ओर से जारी की गई है।

ये तस्वीरें सामने आने के बाद से आम जनमानस के मन मे सवाल उठने लगे हैं। सरकार और न्यायपालिका के गठजोड़ पर लोगों के विचार आना शुरू हो चुके हैं। क्या कोई मुख्य न्यायाधीश इस प्रकार खुलेआम सरकार की भेंटे स्वीकार कर सकता है? क्या प्रोटोकाल और संविधान उसे इसकी इज़ाज़त देती है। क्या नैतिकता का कोई तकाज़ा नहीं है?

जस्टिस गोगोई ने बिल्कुल सही फ़रमाया कि न्यायपालिका का लोकतंत्र की बाक़ी दो में से किसी भी शाखा के साथ गठजोड़ बना लेना सबसे ख़तरनाक है। क्योंकि इससे अलग-अलग क्षेत्राधिकार वाली संविधान की मूल भावना का दमन हो जाता है। संसदीय लोकतंत्र में कार्यपालिका और विधायिका को एक-दूसरे के साथ सुर-ताल में चलना होता है, लेकिन यदि कार्यपालिका का न्यायपालिका से गठजोड़ हो जाए तो फिर लोकतंत्र के लिए इससे बड़ा ख़तरा और कुछ नहीं हो सकता। इसी गठजोड़ के ज़रिये जब अन्याय और अत्याचार को जारी रखा जाता है तब अदालती आदेश को अन्तिम मानने का सिद्धान्त बेहद घातक हो जाता है।

ये निर्विवाद सत्य है कि हमारा राजनीतिक लोकतंत्र करोड़ों लोगों को इंसाफ़ देने में नाकाम रहा है। हमारे देश में ऐसे मुद्दों की भरमार है जिसका समतामूलक समाज की अभिकल्पना से कोई वास्ता नहीं है। धार्मिक ध्रुवीकरण को पैदा करने वाली बहस, किसी ख़ास धर्म के लोगों के ख़िलाफ़ हिंसा और राजनेताओं की उस वक़्त की ख़ामोशी जब उनसे बयान की अपेक्षा हो। ऐसे मुद्दों का विकास से कोई नाता नहीं है। न्यायपालिका ने अतीत में जनहित याचिका को बेज़ुबानों की ज़ुबान बनाया था। इसके लिए हुक़ूमत को कई ऐसे क़दम उठाने के लिए मज़बूर किया गया, जिनसे वो कन्नी काट रही थी। लेकिन अब जनहित याचिका का चरित्र बदल चुका है। अब अक्सर इसका इस्तेमाल उन लोगों की रक्षा करने के लिए हो रहा है तो ख़ुद अन्यायकारी हैं।

सतर्क और सक्रिय न्यायपालिका की बदौलत ही नागरिकों के बुनियादी और संवैधानिक अधिकारों की हिफ़ाज़त हो पाती है। ऐसी सतर्कता के बग़ैर लोकतंत्र जीवित नहीं रह सकता।

संवैधानिक मूल्यों की रक्षा के लिए न्यायपालिका का स्वतंत्र और निर्भीक होना ज़रूरी है। संविधान की आत्मा का बसेरा न्यायपालिका में ही होता है। न्यायपालिका के बग़ैर संविधान के शब्द निर्जीव बने रहते हैं। क़ानून के मुताबिक़ इंसाफ़ करते हुए अदालतें जहाँ दुस्साहसी कार्यपालिका पर अंकुश लगाती हैं, वहीं विधायिका की सीनाज़ोरी पर भी नकेल कसती हैं। सतर्क और सक्रिय न्यायपालिका की बदौलत ही नागरिकों के बुनियादी और संवैधानिक अधिकारों की हिफ़ाज़त हो पाती है। ऐसी सतर्कता के बग़ैर लोकतंत्र जीवित नहीं रह सकता। इसीलिए जजों से ये अपेक्षा रहती है कि वो अदालतों की निष्पक्षता और निर्भीकता को क़ायम रखने के प्रति जहाँ न्यायपालिका में रहते हुए उत्साह दिखाते रहें, वहीं अन्य सभी का ये फ़र्ज़ है कि वो बाहर रहकर इस काम को आगे बढ़ाएँ।

कल की घटना को इस बात से भी जोड़ कर देखा जा सकता है कि ऐसा ही कुछ 25 अगस्त 2017 को बिलासपुर में न्यायिक भवन का उद्घाटन करने बिलासपुर आ रहे सीजेआई दीपक मिश्रा के स्वागत को लेकर हुआ। राज्य सरकार के जनसम्पर्क विभाग द्वारा राजधानी रायपुर में जस्टिस मिश्रा के स्वागत के लिए बड़े -बड़े बोर्ड लगाए गए। जबकि यह प्रोटोकाल में ही शामिल नहीं है और संविधान में भी न्यायाधीशों को सरकार से दुरी रखनी पड़ती है क्योंकि कोर्ट में जजों को सरकार के विरुद्ध कड़े फैसले देने पड़ते हैं। लेकिन छत्तीसगढ़ की भाजपा सरकार संविधान का अध्ययन नहीं करना चाहती,इसलिए एक जज को भी राजनीति का हिस्सा बना दिया। बोर्ड लगाने के बाद कानून के जानकारों ने सरकार के इस निर्णय की जमकर आलोचना की और दबाव में आकर राज्य सरकार को बोर्ड को हटाना पड़ा। गौरतलब है कि पूर्व सीजेआई एच एल दत्तू भी कई बार छत्तीसगढ़ सरकार के मेहमान रहे हैं और उनके स्वागत के लिए भी बनी बनाई परंपरा को तोडा गया था।

गुवाहाटी हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस न्यायमूर्ति अजीत सिंह पर नियम और प्रोटोकॉल तोड़ने का आरोप गुवाहाटी हाईकोर्ट बार एसोसिएशन लगा चुका है। जब चीफ जस्टिस ने आर्ट ऑफ लिविंग के संस्थापक प्रमुख और आध्यात्मिक गुरू श्री श्री रविशंकर को अपनी कार में बिठाकर खुद गाड़ी चलाकर एयरपोर्ट पर पहुंचाया था। ऐसा करते हुए उनकी तस्वीर भी सामने आई है। लाइव लॉ डॉट इन के मुताबिक यह घटना 5 सितंबर 2017 की है, जब श्री श्री रविशंकर गुवाहाटी में पूर्वोत्तर के मूल निवासियों के जनसमागम में हिस्सा लेने आए थे।

इस तरह घटनाएं लोकतंत्र की बुनियाद को कमज़ोर करती हैं और आम जनता के मन मे जो न्यायपालिका के लिए जो श्रद्धा और विश्वास है उसकी जड़ें हिल जाती है। इस पर रोक लगना ही चाहिए?