लोकसभा सीटों पर उपचुनाव की क्या तुक? चुनाव आयोग पर सवाल

चुनाव आयोग ने पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव के साथ साथ तीन लोकसभा सीटों पर उपचुनाव की घोषणा भी की है। पांच राज्यों की विधानसभाओं के लिए पहले चरण का मतदान 12 नवंबर को होना है। पर उससे पहले तीन नवंबर को लोकसभा की तीन और विधानसभा की दो सीटों के लिए कर्नाटक में उपचुनाव होगा। दस अक्टूबर को इसके लिए अधिसूचना जारी हो जाएगी। जाने अनजाने में चुनाव आयोग ने इस फैसले से भाजपा को फायदा पहुंचा दिया है।

गौरतलब है कि ये तीनों सीटें कर्नाटक की हैं। इनमें से एक सीट जनता दल एस की ओर दो भाजपा की हैं। तीनों सीटें भाजपा और जेडीएस के असर वाले इलाकों में है। इन चुनावों के नतीजे 11 दिसंबर को पांच राज्यों के साथ ही घोषित होंगे। यानी उसके बाद इन तीनों लोकसभा सीटों का कार्यकाल छह महीने से भी कम बचा रहेगा। तभी सवाल है कि इन पर चुनाव कराने की क्या जरूरत आन पड़ी। वैसे भी ये सीटें छह महीने से ज्यादा समय से खाली हैं और चुनाव आयोग ने उपचुनाव कराने की सुध नहीं ली। अब जबकि छह महीने से कम समय लोकसभा का कार्यकाल बचा है तो उपचुनाव कराए जा रहे हैं!

कर्नाटक की तीन लोकसभा सीटों पर चुनाव होना रणनीतिक रूप से भाजपा के लिए फायदे का साबित हो सकता है। उसे दो तरह से फायदा होगा। पहला तो यह कि उसकी जो सीटें खाली हुई हैं उनमें से एक बीएस येदियुरप्पा की शिमोगा और दूसरी बी श्रीरामुलू की बेल्लारी सीट है। ये दोनों मार्च में हुए विधानसभा चुनाव में भाजपा की ओर से मुख्यमंत्री और उप मुख्यमंत्री पर के दावेदार थे। विधानसभा चुनाव के बाद दोनों ने इस्तीफा दिया था। दोनों अपने दम पर भी सीट जितवाने में सक्षम हैं और इस इलाके में पार्टी का आधार भी मजबूत है। इसलिए लोकसभा चुनाव से ठीक पहले दो सीटें जीतने का सकारात्मक मैसेज जाएगा।

दूसरा फायदा यह है कि मांड्या की लोकसभा सीट पर कांग्रेस और जेडीएस में खींचतान हो सकती है। दोनों के बीच तालमेल है पर इस सीट पर दोनों का असर है और दोनों की समान दावेदारी है। पांच साल पहले 2014 के लोकसभा चुनाव से ठीक पहले इस सीट पर उपचुनाव हुआ था तो कांग्रेस की दिव्या स्पंदन उर्फ राम्या ने चुनाव जीत था पर 2014 के चुनाव में जेडीएस ने यह सीट जीती। यह सीट कांग्रेस छोड़ देगी जेडीएस के लिए पर अंदरखाने कोई गड़बड़ी हुई तो दोनों पार्टियों के बीच तनाव बढ़ सकता है।

साभार: नया इंडिया