चौराहे पर लुटे खड़े किसान…

नया इंडिया वेब पोर्टल से साभार: विवेक सक्सेना

एक समय था जब इस देश में किसानों के नाम पर उन्हें साथ लेकर राजनीति की जाती थी। चौधरी चरण सिंह किसानों के बहुत बड़े नेता माने जाते थे। कांग्रेंस में बलराम जाखड़ को भी इसलिए अहमियत थी। चौधरी देवीलाल भी किसानों के बलबूते पर उभरे। पर अब हालात बदल गए हौ। एक वक्त उत्तरप्रदेश में भी राजनीति किसान चौधरी चरणसिंह, बाद में टिकैत का नाम ले कर हुआ करती थी। ऐसे ही मजदूरों के महत्व को देखते हुए उत्तर प्रदेश के दल कानपुर को व महाराष्ट्र के मुंबई में मजदूरों को महत्व देते थे।

मजदूर आसानी से हड़ताल कर पुलिस की लाठी गोलियां खाने के लिए तैयार हो जाते थे। इसके चलते मुंबई में सामंत व देश की राजनीति में जार्ज फर्नाडीज सरीखे नेता उभरे। पूर्व प्रधानमंत्री चरण सिंह का पश्चिम उत्तर प्रदेश में प्रभाव इतना ज्यादा बढ़ गया था कि तत्कालीन मुख्यमंत्री वीर बहादुर सिंह ने महेंद्र सिंह टिकैत को उनके मुकाबले उभरने व उनके मुकाबले उसकी राजनीति चमकाने के लिए अपनी खास योजना तक बना डाली।

जहां चरण सिंह के न रहने व अजीत सिंह ने किसानों का नेता बनने की कोशिश की वहीं टिकैट के बेटे गौरव टिकैत ने अपने किसानों की चौधराहट संभालने की पूरी कोशिश की। किसानों को राजनीति के चलते उत्तर प्रदेश का सबसे संपन्न पश्चिमी इलाके ने वहां का राजनीति में अपनी अलग जगह बना ली। हाल ही में वहां के किसान चर्चा में आए जबकि टिकैट द्वारा स्थापित की गई भारतीय किसान यूनियन ने अपनी 11 मांगों को लेकर हरिद्वार से दिल्ली तक कूच करने व उन्हें मनाने के लिए सीधे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मुलाकात करने का ऐलान कर दिया।

उन्होंने 12 सितंबर को अपना जुलूस रवाना किया और बड़ी तादाद में उत्साही किसानों ने दिल्ली के लिए कूच किया मगर बीच में जो हुआ उससे किसानों का दिल टूट गया। आशंका है कि इस मामले से जुड़े नेताओं व भाजपा को निकट भविष्य में लोकसभा चुनाव में इसकी भारी कीमत चुकानी पड़ सकती है। किसानों की मांगों में शामिल था कि उनकी लागत को देखते हुए उनकी फसल का उचित मूल्य देने के बाद नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूल द्वारा 10 साल पुराने उनके ट्रैक्टरों को नष्ट करने का आदेश रद्द किया जाए। किसानों के ट्रैक्टरों पर प्रदूषण फैलाने का आरोप लगाते हुए ट्रिब्यूनल ने उन्हें 10 साल बाद नष्ट कर देने का आदेश दिया था जबकि किसान ट्रैक्टर निर्माताओं को लाभ पहुंचाने वाला आदेश बताते हुए दलील दे रहे है कि 10 साल में तो मुश्किल से वे इनकी किश्त ही अदा कर पाते हैं तो वे नया ट्रैक्टर कैसे खरीदेंगे।

वे अपनी मांगों को लेकर गाजियाबाद में धरने पर बैठ गए। उनके नेताओं ने प्रधानमंत्री के अलावा किसी और नेता से बात करने से इंकार कर दिया। इनमें प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से लेकर केंद्रीय गृहमंत्री राजनाथसिंह तक शामिल थे। उन्हें मनाने के लिए पुलिस ने लाठी चार्ज किया। आंसू गैस के गोले छोड़े, उनके ट्रैक्टरो के पहियो की हवा निकाली मगर वे अपनी मांगों को लेकर जमे रहे। मगर अचानक हालात ने ऐसा पलटा खाया कि सरकार द्वारा उसकी मांगें मानने का आधिकारिक बयान जारी किए जाने के पहले ही किसानों ने अपनी हड़ताल समाप्त कर दी व धरना व यात्रा समाप्त कर वापस लौट गए।

ऐसा करवाने में उनके नेताओं की अहम भूमिका रही। इसे लेकर न सिर्फ प्रदेश बल्कि पूरे देश के किसानों में चर्चा हो रही है कि लगभग ऐसी मांगों को लेकर दिल्ली रवाना होने वाले नेता की नियत पर सवाल उठाए जाने लगे हैं। किसान नेताओं में राजगोपाल हो या शेतकारी संगठन के नेता राजू सेठ सबको ले कर अब चर्चाएं है। जो हो टिकैत की इस हरकत को लेकर किसानों में तरह-तरह की चर्चा है।

चर्चा चली हुई है कि नेताओं ने नरेंद्र मोदी, भाजपा से सांठ-गांठ करके हमारा आंदोलन बेच दिया और हमें लावारिस कर चौराहे पर खड़ा कर दिया। लोग तरह-तरह के उदाहरण दे रहे हैं। किसानों को अहसास तब हुआ जब रात को 11 बजे उनके नेताओं ने अचानक धरना समाप्त करने का ऐलान कर दिया। इसमें टिकैत के अलावा मुजफ्फरनगर के सांसद व पूर्व खेल मंत्री संजीव बालियान ने इस क्षेत्र में असर पैदा करने के लिए ही सारा खेल खेला था। राज्य के गन्ना मंत्री सुरेश राणा, बीकेयू के राष्ट्रीव प्रवक्ता राकेश टिकैट की अहम भूमिका रही। ध्यान रहे कि इन लोगों ने दिल्ली पर धरने पर बठने के लिए राष्ट्रपिता बापू की समाधि को न चुनकर राजघाट चुना था व दिल्ली में नेताओं ने मुलाकात के लिए उत्तर प्रदेश भवन की जगह त्रिपुरा भवन को अहमियत दी।

वहां सुरेश राणा, लक्ष्मीकांत चौधरी सरीखे उत्तर प्रदेश सरकार के नेताओं ने इन नेताओं से मुलाकात की व उसके बाद आंदोलन समाप्त करने का अचानक फैसला कर डाला। ऐसा माना जाता है कि इस बैठक में बीकेयू के नेताओं से अहम वादे करते हुए उनके आगे लालच की गाजरे लटकाई गई। इसकी दास्तां बताते पत्रकार केपी मलिक का आरोप है कि टिकैत के भाई व पार्टी के युवा इकाई के अध्यक्ष रहे गौरव को अमरोहा अथवा कैराना से भाजपा का लोकसभा टिकट देने का वादा किया गया व युद्धवीर सिंह को राज्यसभा में भेजने का लालच दिया गया है। भाजपा पश्चिम यूपी के जाटों को राजनैतिक तौर पर पटाने के पहले भी दांव चल चुकी है।

मोटी बात यह है कि आंदोलन का हल्ला बना कर लोगों को दिल्ली तक लाया गया और अचानक फिर आंदोलन को खत्म उन किसानों के लिए विचित्र स्थिति पैदा की जो किसानी के संकटों में जूझ रहे है। तमाम खापो के नेता किसानों को कौड़ी भाव बेच देने का आरोप लगाते हुए कह रहे हैं कि सरकार ने जो आश्वासन दिए हैं वे लॉलीपॉप पकड़ाने जैसे हैं। टिकैत ने तो पिछली बार भी लोकसभा चुनाव में भाजपा का टिकट हासिल करने की कोशिश की थी। मलिक का आरोप है कि उनका आंदोलन समाप्त करने के लिए इन लोगों की तमाम निजी मांगें व जरूरते पूरी की गई जिनका वे खुलासा करके ही दम देंगे। उन्हें ऐसा करने के पहले ही धमकियां मिलने लगी है। उनका कहना है कि एक तो मैं पश्चिमी उत्तर प्रदेश का जाट हूं व उसके साथ पत्रकार भी हूं। सो इन सबको नंगा करके ही दम लूंगा।