चुनाव आयोग पर उठते सवाल…

नया इंडिया से साभार शशांक राय का नज़रिया

पिछले दो दशकों में जिन संवैधानिक संस्थाओं की गरिमा और साख लोगों की नजर में बहाल हुई थी उनमें एक संस्था चुनाव आयोग भी है। टीएन शेषन ने बताया कि यह भी एक संस्था है, जिसके ऊपर देश के लोकतंत्र को सुरक्षित रखने की सबसे बड़ी जिम्मेदारी है और उसके पास असीमित अधिकार भी हैं। बाद में मुख्य चुनाव आयुक्त के तौर पर जेएम लिंगदोह ने इसकी प्रतिष्ठा को नई ऊंचाई पर पहुंचाया। पर अफसोस की बात है कि अब इस संस्था की साख और प्रतिष्ठा दोनों खराब हो रही है। यह आम धारणा बन गई है कि चुनाव आयोग सरकार के दूसरे विभागों की तरह एक विभाग हो गया है, जो सरकार के हिसाब से काम कर रहा है।

हालांकि इसी चुनाव आयोग ने पिछले साल गुजरात में राज्यसभा चुनाव के समय भाजपा की आपत्तियों को दरकिनार कर दो वोट खारिज किए थे, जिससे कांग्रेस के अहमद पटेल चुनाव जीत पाए थे। पर ऐसे कुछ अपवादों के बावजूद आयोग सवालों के घेरे में है। इलेक्ट्रोनिक वोटिंग मशीन यानी ईवीएम पर उठ रहे सवालों और उसका जी जान से बचाव करने की वजह से भी आयोग घिरा है। आयोग ने ईवीएम को प्रतिष्ठा का सवाल बनाया है। वह लोगों की आपत्तियों को दूर कम कर रही है और संदेह ज्यादा बढ़ा रही है। इसके अलावा और भी कई ऐसी घटनाएं हुई हैं, जिनसे आयोग की साख पर सवाल उठे हैं।

आयोग की साख पर उठ रहे सवालों को सबसे ताजा मामले से समझा जा सकता है। चुनाव आयोग ने शनिवार की सुबह नौ बजे के करीब पत्रकारों को मैसेज किया कि साढ़े 12 बजे प्रेस कांफ्रेंस होगी। इसमें पांच राज्यों के चुनावों की तारीखों की घोषणा होने वाली थी। पर दस बजे से पहले ही उसने समय बदल दिया और बताया गया कि आयोग की प्रेस कांफ्रेंस तीन बजे होगी। कांग्रेस ने और कई पत्रकारों ने तुरंत इस पर सवाल उठाए और कहा कि एक बजे राजस्थान के अमजेर में होने वाली प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की रैली की वजह से समय बदला गया है।

आयोग को अपनी प्रेस कांफ्रेंस शुरू करते समय ही इस पर सफाई देनी पड़ी। आयोग ने पांच राज्यों के चुनाव को चार चरण में और करीब दो महीने में कराने का क्यों फैसला किया, यह भी समझ से परे है। इसे लेकर भी सवाल उठे हैं। तीसरा मामला लोकसभा की तीन सीटों के उपचुनाव का है। कर्नाटक में लोकसभा की तीन सीटों के उपचुनाव तीन नवंबर को हो रहे हैं।

इसके नतीजे 11 दिसंबर को आएंगे, जिसके बाद लोकसभा का कार्यकाल छह महीने से कम बचा होगा। चुनाव आयोग कर्नाटक में भाजपा की जीती दो और जेडीएस की जीती एक सीट पर उपचुनाव तो करा रहा है पर आंध्र प्रदेश में वाईएसआर की पांच, जम्मू कश्मीर में पीडीपी की एक और ओड़िशा में बीजू जनता दल की जीती एक सीट पर उपचुनाव नहीं करा रहा है।

यह पहला मौका नहीं है, जब चुनाव की घोषणा के लिए बुलाई गई प्रेस कांफ्रेंस विवादों में घिरे। इस साल मार्च में हुए कर्नाटक के चुनाव और पिछले साल गुजरात के चुनावों की घोषणा के समय भी विवाद हुए थे। गुजरात में चुनावों के लिए उन्हीं तारीखों की घोषणा की गई, जिनका जिक्र भाजपा के नेता पहले से कर रहे थे। यहां तक कि भाजपा की आईटी सेल के प्रमुख ने तो आय़ोग की घोषणा से पहले ही ट्विट करके तारीखें बता दीं। बाद में आयोग ने इसकी कथित तौर पर जांच कराई और भाजपा नेता को क्लीन चिट दे दी।

यह भी पहली बार हो रहा है कि चुनाव आयोग किसी राजनीतिक दल के साथ जुबानी लड़ाई में उलझी है। कांग्रेस पार्टी ने राजस्थान और मध्य प्रदेश के वोटर लिस्ट में गड़बड़ी का मुद्दा उठाया है। इसकी वस्तुनिष्ठ जांच की बजाय आयोग कांग्रेस को यह बताने में लगी है और वह एक संवैधानिक संस्था है और कांग्रेस उस पर सवाल न उठाए। सवाल है कि जब देश की सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी मतदाता सूची पर सवाल उठा रही है और स्वतंत्र रूप से भी वोटर लिस्ट की गड़बड़ियां सामने आ रही हैं तो आयोग को उसे ठीक करना चाहिए या उसके साथ बयानबाजी में उलझना चाहिए?

भारत में या दुनिया के किसी भी देश में मतदान के दो ही तरीके हैं। एक तरीका बैलेट का है और दूसरा ईवीएम का है। इन दोनों तरीकों में मतदाता सूची जरूरी है। भारत में पहले से ईवीएम को लेकर सवाल उठ रहे थे और अब मतदाता सूची की गड़बड़ियां सामने आने लगी हैं। आयोग की कथित तौर पर तमाम सावधानियों के बावजूद कई राज्यों की मतदाता सूची में अनेक किस्म की गड़बड़ियां देखने को मिली हैं। ईवीएम की गड़बड़ी और मतदाता सूची की गड़बड़ी की शिकायतें राजनीतिक दल कर रहे हैं। पर इससे अलग और भी कई शिकायतें हैं, जो स्वतंत्र रूप से आ रही हैं।

जैसे आयोग चुनाव में काले धन के इस्तेमाल को नहीं रोक पाया है। पार्टियां और खास कर केंद्र या राज्य में सत्तारूढ़ पार्टियां अंधाधुंध खर्च करती हैं। खर्च की सीमा होने के बावजूद एक अनुमान के मुताबिक इस साल मार्च में हुए कर्नाटक चुनाव में दस हजार करोड़ रुपए खर्च हुए। यानी एक सीट पर औसतन 50 करोड़ रुपए के खर्च का अनुमान है। यह सामान्य औसत खर्च से कम से कम दस गुना ज्यादा है। आपराधिक छवि के लोगों को चुनाव लड़ने से रोकने का काम भी आयोग नहीं कर पाया है। भड़काऊ भाषण या किसी और तरीके से आचार संहिता के उल्लंघन के हजारों मामले आते हैं पर आयोग उन पर कुछ नहीं कर पाता है।