एपीजे अब्दुल कलाम देश के पहले और अब तक के इकलौते गैर राजनीतिक राष्ट्रपति थे, यही उनकी कमजोरी भी थी और ताकत भी

मन का हो तो अच्छा, मन का ना हो तो ज्यादा अच्छा…हिंदी के मशहूर कवि हरिवंश राय बच्चन की यह पंक्तिया अगर वाकई में किसी के जीवन को चरितार्थ करती हैं, वो हैं भारत के 11 वें राष्ट्रपति डॉ एपीजे अब्दुल कलाम. कलाम साहब का ख्वाब भारतीय वायुसेना में फाइटर पायलट बनने का था. वायुसेना की परीक्षा में उन्हें मिलाकर कुल 25 उम्मीदवारों में से आठ का चयन होना था. वह उस परीक्षा में नौवीं पोजिशन पर रहे और उनका ख्वाब टूट गया.

किंतु नियति ने उनके लिए कुछ और निर्धारित कर रखा था. हो सकता है वह पायलट बनकर देश की अच्छी सेवा करते लेकिन पायलट ना बनकर उन्होंने जो किया उसके लिए इतिहास में उनका नाम हमेशा स्वर्ण अक्षरों में लिखा जाएगा.

15 अक्टूबर, 1931 को भारत के दक्षिणी राज्य तमिलनाडु के रामेश्वर में पैदा हुए एपीजे अब्दुल कलाम का पूरा नाम अवुल पाकिर जैनुलाब्दीन अब्दुल कलाम था. एक मछुआरे घर में जन्मे कलाम साहब का बचपन बेहद अभावों में बीता था. गणित और भौतिक विज्ञान उनके पसंदीदा विषय थे. शिक्षा से कलाम को इतना प्रेम था कि वह बस स्टैंड पर अखबार बेच कर अपनी पढ़ाई का खर्च निकाला करते थे.

भारत के मिसाइल कार्यक्रम के जनक

मद्रास इंजीनियरिंग कॉलेज से एयरनॉटिकल साइंस के छात्र रहे कलाम साहब ने भारतीय वायुसेना में नाकाम रहने के बाद 1962 में भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन यानी इसरो में नौकरी शुरू की. उनके निर्देशन में भारत ने पहला स्वदेशी उपग्रह प्रक्षेपण यान यानी पीएसएवी -3 बनाया और 1980 में पहला उपग्रह रोहिणी अंतरिक्ष में स्थापित किया गया.

यह वह दौर था जब पूरी दुनिया में युद्ध के आयाम और मायने बदल रहे थे. किसी भी देश के हथियारों के जखीरे में मिसाइलों का होना उस देश की ताकत और आत्मरक्षा का पर्याय माना जाने लगा था.

विश्व के ताकतवर देश अपनी मिसाइल टेक्नोलॉजी को भारत जैसे देश के साथ साझा नहीं कर रहे थे. भारत सरकार ने अपना स्वदेशी मिसाइल कार्यक्रम इंटीग्रेटेड मिसाइल डेवलपमेंट प्रोग्राम शुरू करने का फैसला किया और इसकी जिम्मेदारी कलाम साहब के कंधों पर सौंपी गई.

कलाम साहब के निर्देशन में भारत ने जमीन से जमीन पर मार करने वाली मध्यम दूरी की पृथ्वी मिसाइल, जमीन से हवा में काम करने वाली त्रिशूल मिसाइल, टैंक भेदी नाग जैसी मिसाइल बनाकर दुनिया में अपनी मौजूदगी दर्ज कराई. अपनी इन कामयाबियों के चलते वह ‘मिसाइल मैन’ के नाम मशहूर हो गए.

1992 से 1999 तक कलाम साहब रक्षा मंत्री के वैज्ञानिक सलाहकार भी रहे. इस दौरान भारत ने पोखरण में परमाणु परीक्षण भी किया जिसमें कलाम साहब की भूमिका बेहद खास थी. उनकी इन उपलब्धियों के चलते उन्हें 1997 तक भारत रत्न समेत सभी नागरिक सम्मान मिल चुके थे.

साल 2002 में उनके जीवन का ऐसा अध्याय शुरू हुआ जिसने भारत में सार्वजनिक जीवन जीने के नए प्रतिमान स्थापित कर दिए.

बेहद दिलचस्प है राष्ट्रपति बनने का किस्सा

साल 2002 में तत्कालीन राष्ट्रपति के. आर. नारायणन का कार्यकाल खत्म हो रहा था. उस वक्त की अटल बिहारी वाजपेयी सरकार के पास उतना बहुमत नहीं था कि वह अपनी पसंद का राष्ट्रपति बनवा सकें. राजनीतिक बिसात पर हर कोई अपने मोहरे सेट कर रहा था.

ऐसे में समाजवादी पार्टी के नेता मुलायम सिंह यादव ने कलाम साहब के नाम का प्रस्ताव रखा जिसे वाजपेयी सरकार ने हाथों हाथ लिया. कांग्रेस पार्टी एक मुस्लिम के राष्ट्रपति पद की दावेदारी को खारिज करने का जोखिम नहीं उठा सकती थी और वाम दलों के अलावा बाकी सभी दलों के समर्थन से कलाम साहब इस देश के 11वें राष्ट्रपति बन गए.

राष्ट्रपति पद को दी नई गरिमा और पहचान

एपीजे अब्दुल कलाम देश के पहले और अब तक के इकलौते गैर राजनीतिक राष्ट्रपति थे. यही उनकी कमजोरी भी थी और ताकत भी. राष्ट्रपति कलाम को देश की अवाम का इतना समर्थन मिला कि उन्हें जनता का राष्ट्रपति कहा जाने लगा.

अपने पांच साल के कार्यकाल के दौरान एक ‘रबर स्टांप’ कहे जाने वाले पद को कलाम साहब ने एक ऐसी पहचान दे दी कि लोग उन्हें पहले राष्ट्रपति डॉ राजेंद्र प्रसाद के बाद दूसरा सबसे लोकप्रिय राष्ट्रपति मानने लगे.

बतौर राष्ट्रपति उन्होंने लीक से हटकर काम किया. आलीशान और वैभवशाली राष्ट्रपति भवन में एक बार जब उनके रिश्तेदार उनसे मिलने आए तो उनके रहने का किराया उन्होंने अपनी जेब से भरा.

राष्ट्रपति बनने के पहले ही साल रमजान के पाक महीने में होने वाली इफ्तार की दावत को उन्होंने बंद दिया और इसके लिए तय बजट की रकम को अनाथ बच्चों की चैरिटी में लगा दिया.

एक बार 6000 किसानों को उन्होंने राष्ट्रपति भवन में आमंत्रित किया तो एक बार 250 पुलिस वाले उनके मेहमान बने. कलाम साहब पहले ऐसे राष्ट्रपति थे जो लैपटॉप का इस्तेमाल करते थे. इस दौरान उन्होंने देश को 2020 विजन भी दिया. वह देश के पहले ऐसे सार्वजनिक जीवन के व्यक्ति थे जिनकी ईमेल आईडी पूरे देश को पता था और ईमेल का जवाब भी दिया जाता था.

राजनीति को ना समझना पड़ा भारी

गैर राजनीतिक राष्ट्रपति होना कलाम साहब के लिए एक मुसीबत भी लेकर आया. साल 2005 में मनमोहन सिंह की सरकार ने बिहार की नीतीश कुमार सरकार को बर्खास्त किया तो उस वक्त कलाम साहब रूस यात्रा पर थे. आधी रात को कलाम साहब ने सरकार के इस फैसले को मंजूरी दे दी. बाद में जब सुप्रीम कोर्ट ने इस फैसले को गलत ठहराया तो कलाम साहब की इमेज को भी धक्का लगा. हालांकि उसके बाद ऑफिस ऑफ प्रॉफिट के विधेयक को वापस लौटाकर उन्होंने सरकार को उसमें संशोधन करने के लिए भी मजबूर कर दिया.

कलाम साहब का फाइटर पायलट बनने का ख्वाब तो पूरा नहीं हुआ लेकिन साल 2006 में एक ऐसा मौका भी आया जब उन्होंने देश के सबसे एडवांस फाइटर प्लेन सुखोई-30 में बतौर को-पायलट 30 मिनट की उड़ान भरी. फाइटर प्लेन में बैठने वाले कलाम साहब देश के पहले राष्ट्रपति बने.

साल 2007 में अपना पांच साल का कार्यकाल पूरा करने का बाद कलाम साहब ने पद छोड़ दिया. हालंकि उनको दूसरी बार भी राष्ट्रपति बनाए जाने की मांग की जा रही थी, लेकिन कांग्रेस के नेतृत्व में चल रही यूपीए सरकार को इसमें दिलचस्पी नहीं थी. कांग्रेस का मन भांप कर कलाम साहब ने दूसरी बार राष्ट्रपति पद का प्रत्याशी बनने से इनकार कर दिया.

राष्ट्रपति पद छोड़ने के बाद भी कलाम साहब की लोकप्रियता में कोई गिरावट नहीं आई. छात्रों को पढ़ाना उनका सबसे प्रिय काम था. वह शिक्षा के महत्व को समझते थे और उन्हें पक्का विश्वास था कि अगर हमारे देश में शिक्षा की उचित व्यवस्था हो तो हमें विकसित देश बनने से कोई नहीं रोक सकता.

अपने इसी ख्वाब को पूरा करते हुए 27 जुलाई 2015 को शिलांग में छात्रों को संबोधित करने के दौरान ही दिल का दौरा पड़ने के कारण उनका निधन हो गया. 83 साल के अपने जीवन में कलाम साहब ने कई भूमिकाएं निभाईं और हर भूमिका में नए प्रतिमान स्थापित किए.

छात्रों और शिक्षा के प्रति उनके जूनून और योगदान को देखते हुए ही आज का दिन पूरी दुनिया में विश्व ‘छात्र दिवस’ के तौर पर मनाया जाता है. जनता के राष्ट्रपति के लिए शायद यह सबसे बड़ी श्रद्धांजलि है.