यूपी: 55 स्कूलों को CBSE मान्यता दिलाने की समाज कल्याण विभाग की कवायद पर सवाल

उत्तर प्रदेश में समाज कल्याण विभाग द्वारा संचालित राजकीय आश्रम पद्धति के विद्यालयों को सीबीएसई बोर्ड से मान्यता दिलाने की कवायद पर सवाल खड़े हो रहे हैं। बताया जा रहा है कि 2008 से यूपी बोर्ड की मान्यता प्राप्त ऐसे 55 स्कूलों को समाज कल्याण विभाग सीबीएसई बोर्ड के तहत लाने की तैयारी में जुटा है। जहां एक ओर इस कदम से राज्य सरकार का करोड़ों का अपव्यय होने का अनुमान है, वहीं योगी सरकार द्वारा वर्ष 2017 में समान पाठ्यक्रम व्यवस्था लागू किए जाने के बाद विभाग की इस कोशिश पर सवाल उठ रहे हैं।
सीबीएसई बोर्ड से मान्यता पर समाज कल्याण विभाग का प्रति विद्यालय लगभग 3.50 लाख रुपये का अनुमानित खर्च है। विभाग द्वारा संचालित 93 आवासीय विद्यालयों (वर्ष 2008 से) में गरीबी रेखा से नीचे जीवन-यापन करने वाले अभिभावकों के बच्चे इंटरमीडिएट तक की पढ़ाई करते हैं। इनमें से 38 स्कूलों को वर्ष 2016 में सीबीएसई बोर्ड से मान्यता हासिल हुई। ये सभी स्कूल 2008 से यूपी बोर्ड की मान्यता पर चल रहे थे। इन विद्यालयों का यूपी बोर्ड से हाईस्कूल-इंटर का बोर्ड रिजल्ट औसतन 90 प्रतिशत से ऊपर रहा है। वर्ष 2018 से शेष बचे 55 आश्रम पद्धति विद्यालयों (कक्षा 6 से 12 तक संचालित) को सीबीएसई बोर्ड से मान्यता दिलाने के लिए विभाग प्रयासरत है।

1.92 करोड़ रुपये का अनुमानित अपव्यय
सीबीएसई बोर्ड की मान्यता के लिए आवेदन के साथ 40 हजार रुपये का ड्राफ्ट लगाना होता है। वहीं, एक स्कूल में बच्चों के लिए 1500 नई पुस्तकों का मूल्य तकरीबन 2 लाख रुपये तक बैठता है। इसके अलावा कक्षा 9, 10, 11 और 12 के छात्रों का पंजीकरण शुल्क प्रति छात्र 500 रुपये आता है। इस तरह एक विद्यालय की मान्यता पर कुल खर्च करीब 3 लाख 50 हजार आता है। 55 विद्यालयों पर यह खर्च 1 करोड़ 92 लाख 50 हजार बैठता है। ऐसे में अगर सीबीएसई बोर्ड से मान्यता पर मुहर लगती है, तो विभाग के रुपयों का अपव्यय होगा, जो कि किसी दूसरे मद में खर्च हो सकते हैं।

स्टाफ की कमी, संविदा शिक्षक बदहाल
इन विद्यालयों में 1900 एलटी प्रवक्ता शिक्षकों का पद सृजित है, जिनमें नियमित 170 शिक्षक कार्य कर रहे हैं। वर्ष 2008 से 2016 तक संविदा के 1205 शिक्षक इन विद्यालयों में कार्य कर रहे हैं। 736 संविदा शिक्षकों की नियुक्ति 2008 से 2013 के बीच की है। वहीं वर्ष 2016 में समाजवादी पार्टी के शासनकाल में 469 संविदा शिक्षक नियुक्त किए गए। ये संविदा शिक्षक जितना वेतन पा रहे हैं, अगर उन्हें नियमित कर दिया जाए तो विभाग पर अतिरिक्त व्ययभार नहीं आएगा। मिसाल के तौर पर राज्य सरकार के उच्च शिक्षा विभाग के संविदा शिक्षकों को नियमित किया जा चुका है।

इसके साथ ही 9 पुराने आश्रम पद्धति विद्यालयों (गोण्डा, वाराणसी, सारनाथ, रामपुर और गोरखपुर आदि) के पास स्कूल के नाम पर भूमि या तो नहीं है या फिर विद्यालयों के पास मानकों के मुताबिक क्षेत्रफल का प्रांगण नहीं है। इस दिशा में भी समाज कल्याण विभाग की ओर से कार्रवाई की दरकार है।