झारखंड: आदिम जनजातियों की संख्या में 10 वर्षों में बड़ी गिरावट, 95 हजार घटी आबादी

विनोद श्रीवास्तव, रांची। देश में आदिवासियों की आबादी क्रमिक रूप से घटती जा रही है। आजाद भारत के सात दशकों की बात करें तो उनकी आबादी में तकरीबन दस फीसद की गिरावट आई है। आदिवासी बहुल झारखंड में जनजातीय परामर्शदात्री परिषद इसके कारणों की पड़ताल करने में जुट गई है। विस्थपान, कुपोषण, स्वास्थ सुविधाओं की कमी आदि मुख्य कारक माने जा रहे हैं। यहां 1951 में इनकी आबादी 35.80 फीसद थी, जो 1991 में घटकर 27.66 फीसद रह गई। यानी इस अवधि में 8.14 फीसद आबादी घट गई। वहीं, 2001 में यह आबादी 26.30, जबकि 2011 में 26.11 फीसद पर आ पहुंची। यानी 9.69 फीसद घट गई। इससे भी अधिक चौंकाने वाली रिपोर्ट राज्य की विलुप्तप्राय जनजातियों (आदिम जनजाति) की है।

कल्याण विभाग की हालिया रिपोर्ट की बात करें तो 2001 से 2011 की दस वर्ष की अवधि में इनकी आबादी 95 हजार (3.87 लाख से 2.92 लाख) घट गई। इनकी घटती आबादी ने सरकार की बेचैनी बढ़ा दी है। आदिवासियों की मिनी एसेंबली कही जानेवाली जनजातीय परामर्शदातृ परिषद (टीएसी) ने इस घटती आबादी की पड़ताल के लिए अलग से उपसमिति गठित कर दी है। राज्य के ग्रामीण विकासमंत्री नीलकंठ सिंहमुंडा की अध्यक्षता वाली उप समिति विभिन्न जिलों से संबंधित तथ्य इकट्ठा कर रही है। बुद्धिजीवियों, आदिवासी संगठनों और आदिवासी मामलों के जानकार से राय मशविरा कर रही है।

यूं ही नहीं घट रहे आदिवासी

आजादी के वर्षों बाद अगर आदिवासियों की आबादी में गिरावट आई है तो उसके अनेक कारण हैं। एक सर्वेक्षण के अनुसार राज्य में नेशनल पार्कों के निर्माण की कड़ी में भूमि के अधिग्रहण होने से 549918, लोकउपक्रमों एवं उद्योगों की स्थापना से 259551,सिंचाई परियोजनाओं की वजह से 197947, जबकि राष्ट्रीय सुरक्षा परियोजनाओं के कारण 51399 लोगों का विस्थापन हुआ। इनमें से 65 से 70 फीसद आबादी आदिवासियों की थी। नौकरी की तलाश में अन्य प्रदेशों के लिए पलायन भी इनकी आबादी घटने के विभिन्न कारणों में से एक है। स्वास्थ्य सेवाओं की अंतिम व्यक्ति तक पहुंच नहीं होना तथा राज्य में कुपोषण की भयावहता (लगभग 70 फीसद महिलाएं एनीमिया से पीड़ित और 48 फीसद बच्चों में कुपोषण), नशे का प्रचलन आदि भी असमय उनकी जिंदगियां लील रही हैं।

बड़ा सवाल
राज्य के 57 लाख परिवार खाद्य सुरक्षा के दायरे में हैं, जिसकी परिधि में आदिवासियों की भी 80 फीसद आबादी आती है। मुख्यमंत्री डाकिया योजना के तहत हर आदिम जनजाति परिवार को 35 किलो अनाज देने का प्रावधान है। कल्याण विभाग के आवासीय विद्यालय में आदिवासियों के बच्चों के नि:शुल्क पठन-पाठन, भोजन और आवास, मैट्रिक पास को सीधी सरकारी नौकरी, मुफ्त आवास, स्वावलंबन को पूंजी,वृद्धा पेंशन, चिकित्सा अनुदान और भी बहुत सारी योजनाएं संचालित हैं। इसके बावजूद अगर वे हाशिये पर हैं तो यह सिस्टम पर बड़ा सवाल खड़ा करता है।

उप समिति इन बिंदुओं पर कर रही पड़ताल
रोजी-रोजगार की तलाश में बाहर जाने वाले आदिवासी वापस अपने घर लौटे हैं या नहीं।
अनुसूचित जनजातियों में जन्म और मृत्युदर की मौजूदा स्थिति।
खेती-बाड़ी के बाद बहुत से आदिवासी परिवार रोजी-रोजगार की तलाश में बाहर चले जाते हैं। सामान्य तौर पर उनकी अनुपस्थिति में जनगणना होती है। आबादी के आंकड़े में कहीं इसका प्रभाव तो नहीं पड़ रहा।
किन-किन जिलों के किन-किन क्षेत्रों में आबादी में अधिक गिरावट दर्ज की गई। उनका रहन-सहन, भौगोलिक परिस्थिति, स्वास्थ्य सेवाओं का हाल आदि क्या है?
आदिम जनजातियों को मुख्यधारा से जोड़ने के लिए उनके रहन- सहन, उनके व्यवहार, उनकी जरूरत, परंपरा, संस्कृति, प्रबंधकीय प्रणाली आदि का अध्ययन जरूरी है। कहने को बिरहोर जैसी आदिम जनजातियों में से कुछ को जंगलों, पहाड़ों, नदी, कंदराओं आदि से बाहर तो निकाल लिया गया, परंतु उनकी जीवनशैली का खयाल नहीं रखा गया। उन्हें पत्थर के मकान उपलब्ध करा दिए गए, जो गर्मी में अत्यधिक गरम व शीत ऋतु में अत्यधिक ठंडा रहता है, जो उनकी जीवनशैली से मेल नहीं खाता। नतीजतन कुछ बीमारियों की भेंट चढ़ गए और कुछ पुन जंगलों में लौट गए।
[डॉ. करमा उरांव, पूर्व प्राध्यापक, मानव

विज्ञान विभाग, रांची विश्वविद्यालय]
सोर्स: जागरण डॉट कॉम