इलाहाबाद से प्रयागराज: प्रतीकों की राजनीति के स्याह पहलू

इलाहाबाद में तो कोई निराला अब बड़े बड़े गड्ढों वाली सड़कों पर ठेकेदार के लिए काम करती किसी युवती को देख कर कविता नहीं लिखेगा ! अब अगर वह दिखेंगी भी किसी निराला को तो इस नारकीय जीवन से तंग आ कर ‘प्रयागराज के किले’ के पास गहरी यमुना में कूद कर आत्महत्या करते हुए।

नहीं चाहिए ऐसा निराला जो किसी पत्थर तोड़ने वाली की बात करे, गुलाब को कैपीटलिस्ट कहे और एक बार फिर इलाहाबाद की याद दिलाए ! हमें तो ‘राम की शक्ति पूजा’ और ‘वीणा वादिनी से वर’ मांगने वाला निराला चाहिए। पूजा तो कहीं भी की जा सकती है और वर भी तो कहीं भी मांगा जा सकता है ! इलाहाबाद हो या प्रयागराज क्या फर्क पड़ता है ?

फर्क तो लेकिन पडता है दोस्त ! तभी न इसे बदला गया !! इलाहाबाद शब्द में वरना बुराई ही क्या थी ? यही न कि इसे वक्त के बादशाह अकबर ने रखा था ! होने को तो इसका मतलब भी ‘अल्लाह का घर’ होता है। लेकिन उससे क्या ? ‘ईश्वर एक है और विद्वानों ने उसे अनेक नाम दिए हैं ‘ की बात कहने वाले और उसे ‘नेति नेति’ कहने वाले स्वनामधन्य हिंदूधर्म के पैरोकारों को तो जैसे उसी ईश्वर के एक नाम अल्लाह की जात से बेशुमार नफरत है ! लेकिन इस तरह से अगर यह बात निकलेगी तो यकीन मानिए बहुत दूर तलक जाएगी ! बात सिर्फ मुगलों तक ही महदूद नहीं रहेगी, फिर तो वह 1500 BC तक भी जाएगी जब घुमंतु आर्यों के तीन कबीले दाखिल हुए थे हिंदोस्तान की सरहद में और यहां के शांत समृद्ध जीवन को अपनी शातिर चालों का शिकार बना कर नष्ट कर दिया था और उनकी जगह खुद मालिक बन बैठे थे ! आग लेने आई और घर की मालकिन बन बैठी अंग्रेजों की तरह !

खैर, हमें तो खुशी है, 1939 में जो काम मदनमोहन मालवीय ने गंगा सफाई अभियान के साथ शुरू किया था ( वैसे गंगा तो आज पहले से भी कहीं अधिक गंदी हो चुकी है और सौ दिनों से भी ज्यादा चले अनशन से दो संन्यासियों के जीवन की आहूति भी ले चुकी है), वह काम आखिरकार इस ‘हिंदू रक्षक’ सरकार ने पूरा कर ही दिया, भले ही एक तहज़ीब की बलि चढ़ा दी गई हो गाजे बाजे के साथ ! एक तहज़ीब जो महादेवी के विरह गान में धड़कती है, अकबर इलाहाबादी की ग़ज़लों में बयां होती है, धर्मवीर भारती के ‘सूरज का सांतवा घोड़ा’ की टापों में सुनाई और ‘अंधायुग’ में दिखाई देती है, यशपाल के कथा संसार से उछल उछल कर झांकती है, क्रांति की एक बुलंद आवाज हैं जो कंपनी बाग में चंद्रशेखर आजाद की गोलियों से निकलती है, चौंक में सामूहिक फांसी देख आम जन के गुस्से में बिफरती है।

यह वही पंडित मदनमोहन मालवीय थे जिनके चलते आजाद भारत के संविधान में देश की आम जन की भाषा हिंदोस्तानी कभी राजभाषा का सम्मान न पा सकी और नेहरू गांधी जी के प्रयासों के बावजूद केवल एक वोट से हार गई। परिणाम यह हुआ कि आज भी सरकारी कामकाज में शब्दकोश देख कर किए जाने वाले दुरूह, क्लिष्ट अनुवाद के चलते यह संस्कृतनिष्ठ हिंदी एक तरह का मजाक बन कर रह गई है हिंदी ! 69 बरस बाद भी सारा सरकारी कामकाज अंग्रेज़ी में होता है! इससे कोई परेशानी क्यों नहीं होती हिंदुत्व इन पैरोकारों को ? यूपी के 5000 सरकारी स्कूल एक ही झटके में अंग्रेज़ी मीडियम में बदल दिए जाते है इसी नामबदलू सरकार द्वारा फिर भी हिंदू संस्कृति के ठेकेदारों को कोई फर्क नहीं पड़ता ! क्यों ?

लेकिन इस शहर की तहज़ीब की बलि चढ़ा कर आखिर हासिल हुआ क्या? केवल मूंछ को ताव देने का एक अवसर ! मुसलमानों से एक काल्पनिक बदला ले लेने का संतोष !! या एक और विभाजन के बीज बोने के लिए जमीन तैयार करने वाले षडयंत्र की ओर एक कदम और बढ़ने की खुशी !!!

प्रतीकों की राजनीति करने वाले को पता है क्या कि लगभग 2300 करोड़ रुपया खर्च हुआ है हबीबगंज, मुगलसराय और इलाहाबाद का नाम बदलने पर ! ये सारा पैसा ईमानदारी से टैक्स चुकाने वाले लोगों ने दिया है। इनमें हिंदू, मुसलमान, सिख,ईसाई, जैन, बौद्ध, पारसी आदि सब शामिल हैं। कोई हिंदू चंदे से नहीं आया है यह पैसा ! विभाजन की यही धर्म आधीरित राजनीति आप ही के एक सहयोगी दल शिरोमणि अकाली दल ने भी की थी काट-पीट कर भारत के हिस्से में आए एक तिहाई पंजाब को भी तीन हिस्सों में बांट कर ताकि मुख्यमंत्री की दावेदारी हमेशा एक सिख की बनी रहे ! नशे में डूब चुकी है आज उसी कटेफटे पंजाब की नौजवान पीढ़ी ! दो एक परिवारों के ही हाथ में सिमट कर रह गई है पूरे प्रदेश की खुशहाली ! वही राजनीति अब आप कर रहे हैं। हैरानी नहीं होगी अगर भारत का हाल भी वैसा ही हो जाए ! वैसे अपने चहीते दोस्त उद्योगपतियों के हाथ में सब कुछ दिए तो जा ही रहे हैं आप !!

देश को अंधकार और अंधविश्वासों में धकेलना, हर मतभेद को द्वंद्वयुद्ध से तय करने वाले आदिम युग ले जाने को ही अगर आप बहादुरी मानते हैं तो यह बहादुरी आपको ही मुबारक ! इन बातों में उलझने के अलावा भी बहुत काम हैं हमारे पास !!
गुरचरण जी की fb वाल से साभार