राजस्थान में 15 फीसदी मतदाताओं के नाम सूची से गायब, नदारद नामों में मुसलमानों की बड़ी संख्या, पूरे देश में यही हाल

भाषा सिंह

राजस्थान में 15 फीसदी मतदाताओं के नाम सूची से गायब
मतदाता सूची में नदारद नामों में बड़ी संख्या मुसलमानों की है, तकरीबन तीन करोड़। इससे साफ है कि करीब 25 फीसदी मुसलमानों के नाम वोटर लिस्ट से गायब हैं। मुसलमानों की कुल आबादी 19.4 करोड़ है। इनमें करीब 12 करोड़ आबादी 18 साल या उससे अधिक की है।
रहीसा की उम्र 33 साल है। राजस्थान के जयपुर के हवामहल विधानसभा क्षेत्र के नहारी का नाका की बाधा बस्ती में छोटा-सा मकान उनकी रिहाइश है। पति का नाम है बाबू। वे दिहाड़ी मजदूरी पर गुजारा करते हैं। उनके पास मतदाता पहचान-पत्र है। लेकिन वोटर लिस्ट से उनका नाम नदारद है। रहीसा, ए रईस, मो आरिफ, लियाकत अली, रईसा बानो… वोटर लिस्ट से गायब लोगों की लिस्ट लंबी है। यही हाल जयपुर के बजरंग नगर, न्यू संजयनगर, भट्टा ग्राम और कच्ची बस्ती मदरसा ग्राम का है।

ये वे लोग हैं जिनके पास वोटर कार्ड हैं लेकिन वे मतदाता सूची से बाहर हैं। ऐसे मामले सिर्फ राजस्थान के एक विधानसभा क्षेत्र में नहीं हैं। इस तरह के मामले देश भर में फैले हुए हैं। सेंटर फॉर रिसर्च एंड डिबेट्स इन डेवलपमेंट पॉलिसी (सीआरडीडीपी) कई संगठनों के साथ मिलकर 2019 के लोकसभा चुनावों से पहले देश भर में सर्वे कर रही है और उस सर्वे से यह खुलासा हो रहा है। इस सर्वे की शुरुआत अबु सालेह शरीफ ने की। वह सच्चर कमेटी के सदस्य थे जिसने मुसलमानों की स्थिति पर रिपोर्ट तैयार की थी। शरीफ का मानना है कि देश भर में करीब 9 करोड़ गायब मतदाता हैं जिन्हें मतदाता सूची में शामिल करना जरूरी है। इनमें बड़ी संख्या मुसलमानों की है, तकरीबन तीन करोड़।

इससे साफ है कि करीब 25 फीसदी मुसलमानों के नाम वोटर लिस्ट से गायब हैं। मुसलमानों की कुल आबादी 19.4 करोड़ है। इनमें करीब 12 करोड़ आबादी 18 साल या उससे अधिक की है।सीआरडीडीपी के सर्वे-अध्ययन के मुताबिक, गायब मतदाताओं की कुल संख्या 12.7 करोड़ है। यानी वोटर लिस्ट से गायब कुल वोटरों का प्रतिशत 15 फीसदी है। जनसंख्या में होने वाली औसत वृद्धि को ध्यान में रखें तो 1 जनवरी, 2019 को देश की कुल आबादी 137.3 करोड़ होगी। इसमें 62 फीसदी आबादी 18 साल या उससे अधिक की होगी यानी 85.12 करोड़। कर्नाटक, तेलंगाना, गुजरात में फील्ड सर्वे हो चुका है। इन दिनों राजस्थान में फील्ड सर्वे चल रहा है। वहां के शुरुआती आंकड़े इस तथ्य को उजागर कर रहे हैं कि मतदाता सूची से गायब मतदाताओं की फेहरिस्त अच्छी-खासी है। कई लोगों को संदेह है कि पिछले कुछ सालों में मुसलमानों का नाम जानबूझकर हटाया जा रहा है।

जयपुर में सीआरडीडीपी यह सर्वे पीपुल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज (पीयूसीएल) के साथ मिलकर कर रहा है। पीयूसीएल नेता कविता श्रीवास्तव ने बताया, “एक ही घर के लोगों के नाम अलग-अलग बूथ पर डाल दिए गए हैं। सामान्य तौर पर एक परिवार के सभी सदस्य एक साथ ही वोटिंग के लिए जाते हैं। वहां दो-तीन लोगों के नाम नहीं मिलते तो वे दो-तीन किलोमीटर दूर दूसरे बूथ पर जाने से कतराते हैं।” जयपुर में सर्वे में शामिल नूरुल अबसार ने बताया कि जिस तरह से उदाहरण सामने आ रहे हैं, उनसे साफ है कि राजस्थान में भी कम से कम 15 फीसदी गायब मतदाता हैं। इनमें सभी वर्गों के लोग शामिल हैं, हालांकि इनमें मुसलमानों की संख्या ज्यादा है। राजस्थान में 19 नवंबर तक सूची में नाम जुड़वाए जा सकते हैं।

इस सर्वे का तकनीकी पक्ष तैयार करने वाले खालिद सैफुल्ला ने बताया, “कर्नाटक में हमने सभी विधानसभा सीटों की सूची का विश्लेषण किया था। लेकिन राजस्थान में अभी हमने 30 सीटों का डाटा निकाला है। हम राज्य आयोग की मतदाता सूची के डाटा को निकालते हैं। उसकी तुलना जनगणना के आंकड़ों, हाउसहोल्ड्स के ब्यौरों से करते हैं। यह पता लगाते हैं कि जितने वयस्क हैं, वे सूची में हैं या नहीं। यह हम हर बूथ के मुताबिक करते हैं। हमने ‘मिसिंग वोटर’ नाम से एक मोबाइल एप्लिकेशन भी डेवलप किया है। इसमें हम फील्ड सर्वे के दौरान गायब मतदाताओं के नाम डालते जाते हैं।”

लोगों में आक्रोश है। जयपुर के किसनपोल में रहने वाले 28 वर्षीय रईस जवाहरात बनाने का काम करते हैं। उन्होंने बताया कि पिछले सात सालों से उनका मतदाता पहचान-पत्र है लेकिन इस बार उनका नाम वोटर लिस्ट में नहीं है। उनकी पत्नी रेशमा का भी नाम नहीं है।इन आंकड़ों को देखते हुए सवाल यह उठता है कि ये नाम अकारण ही गायब हुए हैं या सोचे-समझे ढंग से गायब किए गए हैं। इस बारे में पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त वाईएस कुरैशी ने बताया, “सच है कि अल्पसंख्यकों में असुरक्षा का माहौल बहुत बढ़ा है। यह भी सही है कि मुसलमानों सहित कई समुदायों के लोगों के नाम मतदाता सूची में नहीं होने की खबरें लगातार आ रही हैं। ऐसे में सतर्क निगाह जरूरी है ताकि नाम लिस्ट में आ जाएं।”बहरहाल, देश भर में अगर 9 करोड़ लोग सूची से बाहर हैं और इनमें तीन करोड़ मुसलमान हैं, तो यह हमारे लोकतंत्र के लिए खतरे की घंटी है। 2019 में आम चुनाव से पहले देश के नागरिक होने के चलते इतने करोड़ों लोगों का वाजिब हक उन्हें मिलना जरूरी है।

स्रोत: नवजीवन इंडिया