हाजी अली में महिलाओं की एंट्री पर झूमने वाले सबरीमाला पर हंगामा क्यों कर रहे हैं?

शादाब मोइज़ी

एक तरफ हाजी अली तो दूसरी ओर सबरीमाला. दो जगह, दो अदालतें, दो आदेश, एक नीयत. महिलाओं को बराबरी का हक. लेकिन, हक के नाम पर हंगामा बरपा जाता है.

महिलाएं सबरीमाला में घुसने की कोशिश करती हैं तो उन्हें खदेड़ दिया जाता है, हजारों की भीड़ उग्र हो जाती है. महिलाएं पुलिस सुरक्षा में घुसने की कोशिश करती हैं तो भी उन्हें पांव पीछे खींचने पड़ते हैं. ये सब तब जब आदेश सीधे सुप्रीम कोर्ट से आया है.
सरकार वही है, सुप्रीम कोर्ट भी वही है, फैसला भी वैसा ही ऐतिहासिक है तो हाजी अली पर कोर्ट के फैसले पर झूमने वाले सबरीमाला पर महिलाओं की एंट्री के डर से विलाप क्यों कर रहे हैं. आस्था की दुहाई देकर छाती क्यों पीट रहे हैं.

बीजेपी और आरएसएस के दोहरा नजरिया

जिस बीजेपी और आरएसएस को हाजी अली के फैसले पर अदालतें चांद का टुकड़ा लगती हैं, उसी चांद की रोशनी जब सबरीमाला पर बरसती है तो उसमें दाग नजर आने लगता है. जब बॉम्बे हाई कोर्ट हाजी अली दरगाह के अंदर औरतों को जाने की इजाजत देता है तो फैसला ऐतिहासिक बन जाता है, लेकिन बात सबरीमाला की हो तो वो इतिहास,मान्यताओं और परंपराओं पर हमला.

संविधान की सुनेगें नहीं तो किसकी सुनेंगे?
संविधान में औरतों और मर्दों की बराबरी वाली लाइन को आस् मिटाने की कोशिश हो रही है. जब सुप्रीम कोर्ट ने 10 साल से 50 साल की महिलाओं को सबरीमाला मंदिर में जाने की इजाजत दे दी तो फिर अब उसी सुप्रीम कोर्ट के फैसले को मानने में तकलीफ क्यों?

तीन तलाक पर फैसला महिलाओं के हित वाला, एक कुप्रथा का अंत. लेकिन मुंह का स्वाद सबरीमला के नाम पर अचानक बदल क्यों जाता है? हाजी अली दरगाह पर महिलाओं की एंट्री की इजाजत पर लड्डू से लेकर बताशा खाने वालों के मुंह में अचानक दही कैसे जम गया?

तीन तलाक पर शोर, सबरीमाला पर चुप्पी

तीन तलाक पर 15 अगस्त को लाल किले की प्राचीर से पीएम मोदी की जुबां से महिलाओं को इंसाफ दिलाने की बात तो याद होगी, नहीं, तो सुनिए.

पीएम मोदी ने कहा था, “मेरी मुस्लिम महिलाएं-बहनें, मैं उनको आज लाल किले से यकीन दिलाना चाहता हूं कि तीन तलाक की कुरीतियों ने हमारे देश की मुस्लिम बहनों की जिंदगी को तबाह किया है. लेकिन मैं मुस्लिम बेटियों को विश्वास दिलाता हूं. कि मैं आपको न्याय दिलाकर रहूंगा.”

अब जरा सबरीमाला पर भी उनका बयान चेक कीजिए. कोई बयान नहीं दिखेगा, क्योंकि जब बयान होगा तब दिखेगा न.
एक धर्म के मामले में अदालत का दखल 100 टका सही, लेकिन दूसरे में नामंजूर, यह दोहरा रवैया बहुत कुछ कहता है. प्रधानमंत्री जब कुछ नहीं बोलते तो संदेश नीचे तक जाता है. नीचे तक बोले तो मंत्रियों तक. स्मृति ईरानी महिला हैं तो लगा कि महिलाओं के हक-हुकूक की बात समझती होंगी पर नहीं.

स्मृति ईरानी ने कहा,

मैं सुप्रीम कोर्ट के आदेश के खिलाफ बोलने वाली कोई नहीं हूंक्योंकि मैं एक कैबिनेट मंत्री हूं लेकिन यह साधारण-सी बात है क्या कि आप माहवारी के खून से सना नैपकिन लेकर चलेंगे और किसी दोस्त के घर में जाएंगे? आप ऐसा नहीं करेंगे. क्या आपको लगता है कि भगवान के घर ऐसे जाना सम्मानजनक है? यही फर्क है. मुझे पूजा करने का अधिकार है लेकिन अपवित्र करने का अधिकार नहीं है. यही फर्क है कि हमें इसे पहचानने और सम्मान करने की जरूरत है.

सबरीमाला पर कोर्ट के फैसले खिलाफ RSS चीफ
क्या प्रधानमंत्री, क्या सरकार के मंत्री और क्या संघ के मुखिया…सबरीमाला पर सब जैसे एक जुबां, एक मंच पर खड़े हों. एक ऐसा मंच जहां से दूसरे मजहब की बुराइयां आसानी से नजर आ जाती हैं और बाकी जगहों पर परंपराएं याद आती हैं.

आरएसएस चीफ मोहन बागवत कहते हैं, “स्त्री पुरुष समानता अच्छी बात है, लेकिन सालों से चली आ रही परंपरा का सम्मान नहीं किया गया. ये परंपरा है, उसके पीछे कई कारण होते हैं.”

चलिए मान लिया कि सबरीमाला मामले में कोर्ट का आदेश धार्मिक मान्यताओं, परंपराओं में दखल है तो उसके लिए भी उपाय हैं. सुप्रीम कोर्ट में पुनर्विचार याचिका दायर की गई है, अगर वहां भी बात न मानी जाए तो एक और रास्ता है.. सरकार कानून बनाकर सुप्रीम कोर्ट का फैसला पलट सकती है, जैसा कि एससी, एसटी कानून के मामले में किया गया. लेकिन, कानून और संविधान की बड़ी-बड़ी बातें करने वाले सभ्य समाज में इसकी इजाजत नहीं दी जा सकती कि लोग देश की सबसे बड़े अदालत के आदेश की धज्जियां उड़ाएं और सरकार देखती रहे.

जब अदालती आदेशों से महाराष्ट्र के शनि शिंगणापुर मंदिर से लेकर मुंबई की हाजी अली दरगाह में महिलाओं की एंट्री की इजाजत मिल चुकी है, फिर सबरीमाला मंदिर के मामले में कोर्ट के आदेश को आस्था की जंजीरों में क्यों जकड़ा जाए.
साभार: द क्विंट