मोदी मॉडल’ से लोकतांत्रिक प्रणाली खतरे में

ज़फ़र आग़ा

‘मोदी मॉडल’ से लोकतंत्र को खतरा

सीबीआई घमासान का मामला केवल सीबीआई में उत्पन्न किसी एक समस्या से जुड़ी बात नहीं हैं। समस्या जटिल भी है और अत्यंत गंभीर भी। इसका सीधा लेना देना प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की कार्यशैली, बीजेपी और आरएसएस की विचारधारा से है।

सीबीआई में घमासान मचा है। आलोक वर्मा और अस्थाना का बस चले तो एक दूसरे की गर्दन काट लें। अफसरों की पकड़ा-धकड़ी, कोर्ट-कचहरी, क्या कुछ नहीं हो रहा है। हद तो यह है कि अन्ततः मोदी सरकार ने सीबीआई के दोनों आला अफसरों को छुट्टी पर भेजा और नए डायरेक्टर्स राव की नियुक्ति कर दी। यूं तो सीबीआई पहले ही कुछ कम बदनाम नहीं थी। लेकिन सीबीआई की जो कुछ बची-खुची साख थी, मोदी सरकार ने उसका भी ज़नाजा निकाल दिया। अब यह स्पष्ट है कि सीबीआई मोदी सरकार का एक राजनैतिक तंत्र है जिसका मुख्य कार्य सरकार के राजनीतिक प्रतिद्वंद्वियों को ब्लैकमेल करना और उनको चुप करने के लिए उनको तरह-तरह से डराना है। परन्तु जब मोदी सरकार सीबीआई का उपयोग अपने हित में कर रही थी तो फिर संगठन में यह बवाल क्यों। स्पष्ट है कि अपनी उपयोगिता के लिए संगठन के नम्बर एक यानी आलोक वर्मा और नम्बर दो अस्थाना दोनों की सरकार के अत्यंत भरोसेमंद अफसर रहे होंगे। फिर यह दोनों आपस में क्यों लड़ पड़े। और लड़ाई भी ऐसी कि हद से गुजर गई। आखिर क्या रहस्य है इस बात का।समाचारों से जो कुछ छानकर अभी तक सामने आया है उससे मोटे तौर पर जो बात समझ में आती है उसके दो हिस्से हैं। एक तो यह है कि वर्मा और अस्थाना में आपस में ‘इगो-प्राॅब्लम’ थी। आलोक वर्मा ‘नम्बर वन’ तो थे लेकिन राजनैतिक तौर पर जितने भी संवेदनशील मामले थे वह सब अस्थाना के हाथों में थे। वह पी चिदम्बरम के बेटे कार्तिक चिदम्बरम का मामला हो या कोल घोटाला मामला, हर अहम मुद्दे की जांच अस्थाना ही कर रहे थे। जाहिर है कि राजनीतिक दौर पर पीएमओ के लिए अस्थाना का भाव वर्मा से कहीं अधिक था। अर्थात वर्मा कहने को शीर्ष तो थे लेकिन रौब-दबदबा और हक अस्थाना की कहीं अधिक थी। मनोवैज्ञानिक तौर पर वर्मा इन परिस्थितियों में अंदर ही अंदर घुट रहे होंगें।

इस परिपेक्ष्य में सीबीआई में एक राजनैतिक मोड़ उत्पन्न हुआ। बात यह हुई कि इस माह के प्रारंभ में बीजेपी बागी नेता यशवंत सिंहा, अरूण शौरी एवं प्रसिद्ध वकील प्रशांत भूषण रफैल मामले पर एक याचिका लेकर सीबीआई डायरेक्टर आलोक वर्मा के पास पहुंचे। उन्होंने सीबीआई डायरेक्टर को जो याचिका सौंपी उसमें उन्होंने इस मामले में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की जांच का भी आग्रह किया। इन लोगों से आलोक वर्मा ने 65 मिनट बात की। बस इसके बाद पीएमओ में खलबली मच गई। वर्मा का कार्यकाल दो माह बाद समाप्त होने वाला है। मोदी सहयोगियों में भय उत्पन्न हो गया कि वर्मा कहीं इस मामले की जांच के आदेश न दे दें। क्योंकि सीबीआई में राफेल मामले की याचिका दर्ज होेने के बाद भी आलोक वर्मा ने अस्थाना पर पंजा कसना शुरू कर दिया।

यह डर स्वभाविक था कि कहीं राफेल मामले में वर्मा के हाथ अन्ततः मोदी की गर्दन तक न पहुंच जाएं। भला 2019 चुनाव से चंद माह पूर्व बीजेपी इसको कैसे झेलती। पानी सर से ऊपर होने से पहले वर्मा औरअस्थाना दोनों को छुट्टी पर भेज दिया गया। आखिरकार मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा और कोर्ट ने नए सीबीआई मुखिया के पर कतर दिए।यह तो सीबीआई घमासान का मामला था परन्तु यह कोई केवल सीबीआई में उत्पन्न किसी एक समस्या से जुड़ी बात नहीं हैं। समस्या जटिल भी है और अत्यंत गंभीर भी। इसका सीधा लेना देना प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की कार्यशैली, बीजेपी और आरएसएस की विचारधारा से है। वह क्यों और कैसे।

आइये पहले प्रधानमंत्री की कार्यशैली को समझें। हम सबने पिछले दस-पंद्रह वर्ष में ‘गुजरात माॅडल’ का बहुत शोर सुना है। यूं तो ‘गुजरात माॅडल’ के अर्थ आर्थिक विकास से जुड़े बताए और समझाए जाते हैं, परन्तु ‘गुजरात माॅडल’ के दो या तीन महत्वपूर्ण भाग हैं जिनका सीधा अर्थ मोदी की कार्यशैली से है। नम्बर एक, मोदी की कार्यशैली में सत्ता का केवल एक केंद्र होता है जो स्वयं मोदी है। इसका स्पष्ट अर्थ यह है कि वह चाहे विधानसभा या संसद कुछ भी हो, या नौकरशाही हो अथवा न्यायपालिका हो, सत्ता के सभी तंत्र सीधे मोदी के आधीन हों। यही कारण है कि इसी गुजरात माॅडल के तहत न तो अब देश में केंद्रीय मंत्रियों की कोई हैसियत बची है और न ही नौकरशाही स्वतंत्र है। न्यायपालिका पर पंजा कसने की कोशिश में स्वयं सुप्रीम कोर्ट में बवाल हो चुका है जिससे सब अवगत हैं। यही कारण है कि सीबीआई को भी पूरी तरह पीएमओ के अधीन करने की चेष्टा हुई जिसमें मामला हाथ से निकल गया। यह तो रही मोदी के ‘गुजरात माॅडल’ की झलक जो अब ‘दिल्ली माॅडल’ बन चुका है और देश की लोकतांत्रिक प्रणाली के लिए खतरा बन रहा है। लोकतंत्र का आधार सत्ता विभाजन होता है न कि सत्ता का केंद्रीयकरण।

परन्तु समस्या केवल नरेन्द्र मोदी ही नहीं, समस्या की जड़ संघ है। संघ की विचारधारा में लोकतंत्र सत्ता पर कब्जा करने का एक तंत्र है। जब सत्ता अपने हाथ में पूरी तरह आ जाए तो उसका उपयोग संविधान की सुरक्षा के लिए नहीं बल्कि उसका उपयोग संघ के हिंदुराष्ट्र एजेंडा को लागू करने के लिए किया जाए। मोदी स्वयं सत्ता के मोह में डूबे ही हुए हैं। दूसरी और वह संघ के प्रचारक भी रहे हैं और वह संघ विचाराधारा के परम भक्त भी हैं। ऐसी अवस्था में पिछले चार वर्षों में देश में जो कुछ हुआ वह अब सामने आ रहा है। आज देश में सत्ता के केवल एक केंद्र नरेन्द्र मोदी हैं। अमित शाह उनके इशारे पर पार्टी चलाते हैं। और अजीत डोभाल के पास सेना, रिजर्व बैंक, नीति आयोग समेत संपूर्ण नौकरशाही की कमान है। न्यायपालिका में घुसपैठ की चर्चा भी अब आम है। साथ ही संघ की विचारधारा का पालन हेतु हर मंत्री के साथ कम से कम एक और हर मंत्रालय में संघ के अहम लोग बैठा दिए गए हैं। शिक्षा और कल्चर जैसे विभागों का कार्यकाल तो अब संपूर्ण संघ के अधीन है। विश्वविद्यालयों से लेकर नर्सरी स्कूलों तक संघ की निगाह है। सारांश यह है कि सत्ता का उपयोग संवैधानिक तौर पर नहीं बल्कि संविधान को तोड़ मरोड़ कर हिंदुत्व एजेंडा लागू होने के लिए हो रहा है।यह केवल एक गंभीर समस्या नहीं हैं। नरेन्द्र मोदी एंव संघ का गुजरात माॅडल अब लोकतंत्र प्रणाली के लिए खतरा बन चुका है।

सीबीआई में छिड़ा युद्ध देश की लोकतांत्रिक प्रणाली की गिरती साख की केवल एक झलक है। इससे पूर्व सुप्रीम कोर्ट में भी इसी कार्यप्रणाली से समस्या उत्पन्न हो चुकी है। इस संदर्भ में साल 2019 का लोकचुनाव देश की लोकतांत्रिक प्रणाली को बचाने का एक अवसर है। केवल विपक्ष एकता ही इसके निर्वाण का एक अकेला उपाय नजर आता है। क्योंकि 2019 में यही मोदी राज वापस हो गया तो भारतीय लोकतंत्र को जो कीमत चुकानी पड़ेगी उसका अंदाज अभी नहीं लगाया जा सकता है।

स्रोत: साभार नवजीवन इंडिया