एक्सक्लूसिव: राफेल फाइल के लिए रक्षा सचिव को चिट्ठी लिख चुके थे वर्मा, सरकार चाहती थी इस चिट्ठी की वापसी

उमाकांत लखेड़ा

सीबीआई प्रमुख आलोक वर्मा राफेल सौदे की फाइल मंगाने के लिए रक्षा सचिव संजय मित्रा को चिट्ठी लिख चुके थे। सरकार चाहती थी वर्मा यह चिट्ठी वापस ले लें। जब उन्होंने इनकार कर दिया तो आधी रात तानाबाना बुनकर उन्हें हटा दिया गया। इसके अलावा आलोक वर्मा ने अस्थाना की गिरफ्तारी के लिए सीबीआई टीम भी भेज दी थी।

आखिर क्यों हटाया गया आलोक वर्मा को?राफेल सौदे की फाइल मंगाने के लिए रक्षा सचिव संजय मित्रा को चिट्ठी लिख चुके थे आलोक वर्माइस अति गोपनीय पत्र में रक्षा सचिव से मांगी थी बेहद संवेदनशील राफेल सौदे की फाइलइस पत्राचार की सारी जानकारी दर्ज की थी सरकारी डाक रजिस्टर मेंसरकार चाहती थी आलोक वर्मा वापस ले लें यह चिट्ठीराष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार ने कहा था चिट्ठी वापस लेने कोआलोक वर्मा ने कर दिया था चिट्ठी लेने से इनकारराकेश अस्थाना की गिरफ्तारी की भी हो गई थी तैयारीअस्थाना की गिरफ्तारी के लिए उनके घर पहुंची थी सीबीआई टीमअस्थाना घर पर नहीं थे और गिरफ्तारी पर रोक के लिए कोर्ट पहुंच चुके थे

केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) प्रमुख आलोक वर्मा को आधी रात उनके पद से हटाए जाने के कारणों की गुत्थी पर भले ही फिलहाल सरकार की तरफ से और सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान भी चुप्पी रखी गई हो, लेकिन सच्चाई यह है कि उन्हें सीधे रक्षा सचिव से राफेल सौदे के भ्रष्टाचार से जुड़ी फाइल तलब कराने का पत्र वापस न लेने की जिद पर अड़े रहने के कारण हटाया गया। आलोक वर्मा जानते थे कि उनकी यह चिट्ठी मोदी सरकार को हिलाकर रख सकती है, इसलिए उन्होंने बाकायदा सरकारी डाक में विधिवत रिकॉर्ड-रजिस्टर में दर्ज अति गोपनीय पत्र में रक्षा सचिव को यह बेहद संवेदनशील फाईल सौंपने को कहा था।

सीबीआई के आंतरिक सूत्र बताते हैं कि आलोक वर्मा करीब 60 हजार करोड़ रुपए के राफेल सौदे की आरंभिक जांच का आदेश देने के पहले इस लड़ाकू विमान सौदे की पूरी पृष्ठभूमि से गहराई से खुद को आवश्वस्त कर देना चाहते थे। सीबीआई को सीवीसी की तरफ से भी कांग्रेस समेत कई दूसरों स्रोतों से शिकायतें मिल चुकी थीं कि जो सीवीसी ने रुटीन प्रक्रिया के तहत सीबीआई को रेफर कर दी थीं।सीबीआई में आलोक वर्मा के करीबी सूत्र बताते हैं कि मुमकिन है कि पद से हटाने के कारणों की असलियत उजागर करने के लिए वे आने वाले चंद दिनों में वह पत्र जनहित में सार्वजनिक कर दें, जो उन्होंने हाल में राफेल सौदे के बाबत रक्षा सचिव को भेजा था। इस बात की भी अटकलें हैं कि वर्मा प्रेस कांफ्रेस करके सारी अटकलों से पर्दा उठा सकते हैं।

सीबीआई प्रमुख के इस पत्र से प्रधानमंत्री कार्यालय में हड़कंप मचने के बाद ही आलोक वर्मा को प्रधानमंत्री मोदी ने तलब किया और उन्हें राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोवाल की तरफ से साफ शब्दों में रक्षा सचिव को लिखी चिट्ठी को वापस लेने को कहा गया। सूत्र बताते हैं कि जब आलोक वर्मा ने अपने पत्र को वापस लेने से इनकार कर दिया, तो उसके बाद कुछ ही घंटो के भीतर वर्मा को प्रधानमंत्री ने कुर्सी से हटाने का हड़बड़ी भरा कदम उठाया।

आलोक वर्मा को हटाकर जबरन छुट्टी पर भेजने की कहानी बनाने के लिए उनके और स्पेशल डायरेक्टर राकेश अस्थाना के बीच चल रहे झगड़े को बहाना बनाना तय किया गया ताकि बाहरी दुनिया और मीडिया को यही संदेश जाए कि दो बड़े अधिकारियों द्वारा एक दूसरे पर लगाए गए भ्रष्टाचार के आरोपों के कारण सरकार के लिए सीबीआई की साख को बचाना जरूरी हो गया था। सूत्रों का कहना है कि जब वर्मा को सीबीआई मुखिया की कुर्सी से हटाया गया तो उसी क्षण उन्होंने अपने कुछ करीबी मित्रों से यह बात साझा की थी कि उन्हें अस्थाना के खिलाफ एफआईआर दर्ज करवाने के कारण नहीं, बल्कि दूसरे खास मकसद से रास्ते से जबरन छुट्टी पर जाने के लिए कहा गया।

अस्थाना भी होने वाले थे गिरफ्तार, बस बाल-बाल बचे
गौरतलब है कि सीबीआई डीएसपी देवेंद्र सिंह का इस्तेमाल राकेश अस्थाना ने अपने बॉस आलोक वर्मा की कानपुर के बड़े मीट कारोबारी मोईन कुरैशी के गुर्गों से मिलीभगत से भ्रष्टाचार करने का मामला बनाने की कहानी गढ़ने के लिए किया था। यहां ध्यान रहे कि हैदराबाद के एक व्यापारी सतीश बाबू सना के जरिए रिश्वत लेने के मजिस्ट्रेट के सामने दिए गए बयान में अस्थाना भी आरोपी बनाए गए हैं।

सूत्र बताते हैं कि आलोक वर्मा ने अपने डीएसपी देवेंद्र सिंह के साथ ही अस्थाना को भी जबरन वसूली और भ्रष्टाचार के आरोपों में लगे हाथ गिरफ्तार करवाने के लिए सीबीआई टीम उनके घर पर भेज दी थी, लेकिन वे बाल-बाल बच गए। अस्थाना कुछ देर पहले ही दिल्ली हाईकोर्ट में अपनी जमानत करवाने के लिए निकल चुके थे।

सुप्रीम कोर्ट द्वारा केंद्रीय जांच ब्यूरो यानी सीबीआई प्रमुख आलोक वर्मा के खिलाफ लगे आरोपों की केंद्रीय सतर्कता आयोग सीवीसी से दो सप्ताह में जांच करने की पूरी प्रक्रिया में राफेल सौदा एक अहम कड़ी बनकर उभर रहा है। हालांकि राफेल मामला सुप्रीम कोर्ट की जांच के दायरे में फिलहाल नहीं है।

सीवीसी के पास 60,000 करोड़ के राफेल लड़ाकू विमानों की जांच पहले से लंबित पड़ी थी। इनमें से कांग्रेस, आम आदमी पार्टी और कुछ स्वतंत्र शिकायतें शामिल हैं। सुप्रीम कोर्ट खुद अपनी निगरानी में सीवीसी जांच की प्रक्रिया आरंभ कर चुका है, तो राफेल सौदे में भ्रष्टचार का जिन्न भी पूरी जांच प्रक्रिया का केंद्रीय बिंदु बन गया है।सीवीसी स्वीकार कर चुका है कि उसने अपने पास जांच के लिए आई शिकायतों को सीबीआई को जांच के लिए भेज दिया है, इसलिए अब इस सच्चाई से इनकार करने का जोखिम नहीं उठा सकता। इस मामले में सबसे पहले आम आदमी पार्टी ने मार्च में ही सीवीसी से राफेल सौदे की जांच की मांग कर दी थी। दिल्ली से आप के राज्यसभा सांसद संजय सिंह इस बात का पहले ही खुलासा कर चुके हैं कि उनकी शिकायत सीबीआई को पहले से ही रेफर है। दूसरी शिकायत पूर्व केंद्रीय मंत्री यशवंत सिन्हा, अरुण शौरी और वकील प्रशांत भूषण की ओर से सीवीसी के सुपुर्द पहले से है।मालूम हो कि पिछले महीने 24 सितंबर को कांग्रेस पार्टी के एक उच्च स्तरीय प्रतिनिधिमंडल ने भी राफेल सौदे में हुए घोटाले में एफआईआर दर्ज करने की मांग को लेकर सीवीसी और इससे पहले लेखा महानियंत्रक यानी सीएजी प्रमुख को ज्ञापन सौंपा था। साभार: नवजीवन