मोदी जी का लक्ष्य सिर्फ 2019 का चुनाव जीतना है, पहले सपने बेचे थे, अब धर्म बेचेंगे

ज़फ़र आग़ा

मोदी जी का लक्ष्य सिर्फ 2019 का चुनाव जीतना है
देश 2019 के लोकसभा चुनाव की कगार पर खड़ा है। मोदीराज को लगभग पांच साल पूरे होने वाले हैं। भारत, चीन जैसा तो नहीं, हां किसी अफ्रीकी देश से मिलता-जुलता अधिक लग रहा है। पिछले दो हफ्ते के अखबार उठा लीजिये, आपको खुद आभास हो जाएगा कि देश का कितना बुरा हाल है।

आपको साल 2014 के नरेंद्र मोदी याद हैं। उस समय देश का जो वातावरण था, उससे ऐसा प्रतीत होता था मानो देश को एक क्रांतिकारी नेता मिल गया हो। बच्चे-बच्चे के मुंह पर सिर्फ एक नारा था, अबकी बार मोदी सरकार। मानो देश की आशाएं पूरी होने का समय आ गया हो। भला हर किसी के मन में यह आशा क्यों न जागती? कभी चाय पर चर्चा, तो कभी चुनावी भाषणों के बीच मोदी जी मसीहा के समान देश के हर वर्ग की समस्याओं के निराकरण का रास्ता बता रहे थे। हर वर्ष युवाओं को दो करोड़ रोजगार, किसानों को फसल के बदले सोने के दाम, व्यापारियों को सस्ती दरों पर कर्ज, मध्य वर्ग के लिए बैंक में काले धन को वापस लाकर 15 लाख रुपये, और देश की तो कायापलट करने वाले थे मोदी जी। दुबई जैसा जगमग-जगमग करता ‘समार्ट सिटीज’ से सजा-संवरा ‘स्वच्छ भारत’, जिस पर भारतवासी गर्व करेंगे और विदेशी जिस भारत की प्रगति और उन्नति को देखकर चकाचौंध रह जाएंगे।साल 2014 के नरेंद्र मोदी के मुंह से निकला हर शब्द भारतवासियों के लिए सच्चे मोती जैसा एक सत्य था। तब ही तो जब 2014 के लोकसभा चुनाव के बाद वोटों की गिनती हुई तो मोदी जी ने देश ही नहीं अपितु स्वयं अपनी पार्टी को चकित कर दिया। वह देश जो लगभग तीन दशकों से केंद्र में मिलीजुली सरकार का आदी हो चुका था, उसी देश ने बीजेपी को लगभग पूर्ण बहुमत दे दिया। देश मोदीमय हो उठा। मानो, सबको मांगी मुराद मिल गई। क्योंकि जो चुनावी नतीजे थे, उसके बाद मोदी की राह में कोई रोड़ा ही नहीं था। अब उनको सपाट मैदान मिला था, बस वह शपथ लें और वादे पूरे करें और देश को चीन से आगे ले जाकर भारतवासियों की कामनाएं पूरी करें।

सत्ताग्रहण के पश्चात भी देशवासी मोदी प्रेम में ऐसे विलीन रहे कि 8 नवंबर 2016 की रात मोदी ने जब नोटबंदी की घोषणा की तो देशवासियों को लगा कि मोदी जी कोई नया चमत्कार करने जा रहे हैं। लगभग हर भारतीय ने उनके शब्दों पर भरोसा किया और नोटबंदी की कठिनाइयों को झेलने की प्रतिज्ञा कर ली। स्वयं अपने पैसों के लिए घंटों लाइन में खड़ा रहना स्वीकार किया। हद तो यह है कि दो सौ से अधिक भारतीय, बैंकों के बाहर लगी लंबी कतारों में खड़े-खड़े मृत्यु को प्राप्त हो गए। फिर भी लोगों को भरोसा था कि मोदी जी नोटबंदी के जरिये कालेधन का पाप काटेंगे, देश से आतंकवाद मिटा देंगे और देश का हर व्यक्ति ‘कैशलेस’ मुद्रा प्रणाली से जुड़ जाएगा।लेकिन अब देश 2019 के लोकसभा चुनाव की कगार पर खड़ा है।

मोदीराज को लगभग पांच साल पूरे होने वाले हैं। भारतवर्ष चीन जैसा तो नहीं, हां किसी अफ्रीकी देश से मिलता-जुलता सा अधिक लग रहा है। पिछले दो सप्ताह के समाचार पत्र उठा लीजिये, आपको स्वयं आभास हो जाएगा कि देश का कितना बुरा हाल है। पिछले सप्ताह देश की सर्वोच्च जांच एजेंसी यानी सीबीआई के शीर्ष अफसरों के बीच तलवारें खींची थीं। आलोक वर्मा और राकेश अस्थाना आपस में कुत्ते-बिल्ली की तरह लड़ रहे थे। अंततः सरकार को दोनों को छुट्टी पर भेजना पड़ा। अब मामला सुप्रीम कोर्ट के अधीन है। इस उठापटक में सीबीआई की साख चौपट हुई और देश की एक शिखर संस्था समस्याग्रस्त हो गई। यह कहानी अभी पुरानी भी नहीं हुई थी कि वित्त मंत्रालय और रिजर्व बैंक का झगड़ा उठ खड़ा हुआ। वित्त मंत्री अरुण जेटली और रिजर्व बैंक के गवर्नर उर्जित पटेल आपस में आंखें तरेरे हुए हैं। यह वही उर्जित पटेल हैं जो कभी मोदी जी की आंखों के तारे थे। रघुराम राजन की छुट्टी कर सरकार ने रिजर्व बैंक की चाबी उर्जित पटेल के हाथों में दी थी। अब जेटली जी कहते हैं कि पटेल साहब मध्यम और छोटे व्यापारियों को कर्ज बांटिये तो पटेल जी कहते हैं ठेंगा! वित्त मंत्रालय पूछता है क्यों, तो पटेल जी कहते हैं कि बैंक ही कर्जों से डूबे हैं, पैसे आएं तो आएं कहां से। अगर अब कर्ज बांटा तो अर्थव्यवस्था ही चरमरा जाएगी। सच यह है कि नोटबंदी ने तो अर्थव्यवस्था पहले ही चरमरा दी है। कारोबार किसी तरह से रो-धोकर चल रहे हैं। दिवाली सर पर है, फिर भी बाजारों की रौनक गायब है। हर धंधे में मंदी है। सिर्फ इतना ही नहीं पिछले चार-पांच सप्ताह में शेयर बाजार में शेयर कारोबार से जुड़े मध्यवर्ग का लाखों करोड़ रुपया डूब चुका है।जी हां, सीबीआई की साख गई। रिजर्व बैंक आजादी से काम नहीं कर सकता। अर्थव्यवस्था चरमरा रही है।

सुप्रीम कोर्ट में पिछले साल बड़ा बवंडर हो चुका है। देश के उच्चतम न्यायालय पर उंगलियां उठ चुकी हैं। टीवी के सरकारीकरण ने मीडिया को ‘गोदी मीडिया’ बना दिया। पार्लियामेंट जिस प्रकार चलती है वह किसी से छुपा नहीं है। विपक्ष नहीं अब तो सरकार स्वयं पार्लियामेंट को ठप करने के बहाने ढूंढती है। अर्थात लोकतंत्र के मंदिर पर भी बादल छाए हैं। तो फिर बताइए अब मोदी जी के मिटाने को देश में बचा ही क्या है? अब सवाल बड़ा है और वह यह कि क्या देशवासी मूर्ख हैं? अर्थात देश की जो दुर्दशा है क्या वह आम आदमी को नहीं दिखाई पड़ रही है। अरे आम आदमी तो देश की हर समस्या सबसे पहले झेलता है, तो फिर भला उसको यह क्यों नहीं समझ में आएगा कि मोदी सरकार पूर्णतः विफल हो चुकी है। भगत कोई गुणगान करें, सच तो यही है कि साल 2014 का जगमग मोदी अब समाप्त हुआ। अब देश के सामने एक ऐसा मोदी है जिसने दुनिया भर के वादे कर आम आदमी को छला और अब वही मोदी जो देश को सुधारना तो क्या संभाल भी नहीं पा रहे हैं। परंतु मोदी जी तो 2024 तक प्रधानमंत्री पद से न हटने की प्रतिज्ञा कर चुके हैं। अब क्या करें 2019 का चुनाव कैसे जीता जाए। यह समस्या केवल नरेंद्र मोदी जी की ही नहीं बल्कि पूरे संघ परिवार की भी है। क्योंकि मोदी जी को दूसरी बार प्रधानमंत्री बनना है, तो मोहन भागवत जी को भारत को हिंदूराष्ट्र बनाना है और यह काम 2019-24 के बीच ही होना है। इसलिए 2019 के धूमिल छवि वाले मोदी की पुनः कैसे ‘मार्केटिंग’ हो।

देश की स्थिति तो यह साफ बताती है कि बीजेपी राजनीतिक युद्ध हार चुकी है और 2019 की विजय इसकी पकड़ से लगभग बाहर है। अब केवल एक ही रास्ता बचा है। राजनीतिक युद्ध को किसी प्रकार धर्मयुद्ध में बदल दें, तो कदापि 2019 में नैया पार लग जाए। यही कारण है कि अब संपूर्ण संघ परिवार को भगवान राम का अयोध्या मंदिर याद आ रहा है। संघ में भागवत जी से लेकर बीजेपी में अमित शाह तक, हर किसी के स्वर यही बोल रहे हैं कि धर्म का मामला कोर्ट-कचहरी में नहीं तय हो सकता। आए दिन यह स्वर तेज और तीखे होते जा रहे हैं। अब स्पष्ट है कि संघ परिवार ने यह तय कर लिया है कि 2019 के चुनाव धर्मयुद्ध के आधार पर होंगे। इस काम के लिए मोदी जी को ‘हिंदू हृदय सम्राट’ की छवि ओढ़नी पड़ेगी। संसद का शीतकालीन सत्र प्रारंभ होने तक मोदी जी धर्म की राजनीति में वैसे ही डूब जाएंगे जैसे वह 2002 के दंगों के बाद गुजरात में डूबे थे। ऐसी दशा में देश कहां जाए, इसकी चिंता न 2014 में थी और न ही 2019 में ही होगी। लक्ष्य चुनाव जीतना है, पहले सपने बेचे थे, अबकी बार धर्म बेचेंगे। साभार: नवजीवन