यूपी में खामोश आत्महत्याएं और बर्बर लाठीचार्ज, मांगा “रोजगार”, मिली “लाठियां, मुकदमे” और “राम!

मुहमद फैसल

तकरीबन 1 लाख 37 हज़ार नियमित शिक्षकों को यू पी की योगी सरकार द्वारा सर्वोच्च न्यायालय की आड़ में पदों से हटा दिया गया था। उन्हें फिर से शिक्षा मित्र के रूप में न्यूनतम मानदेय पर पुरानी स्थिति में बहाल कर दिया गया

इसके विरोध में शिक्षकों ने आंदोलन किया। शिक्षकों की यूनियन के बंटे होने, कमजोर होने व संकीर्ण हितों के चलते आंदोलन आगे नहीं बढ़ सका। इसकी एक वजह यह भी थी इन बाहर निकाले गए शिक्षकों में कोई टेट पास था कोई बी एड या बी टी सी तो कोई स्नातक या बिना स्नातक के भी। इसलिए इनके बीच में एकजुट होकर आंदोलन लड़ने का आधार ही बेहद कमजोर था। दमन व गुमराह करने के जरिये आंदोलन को पीछे धकेलने में योगी सरकार कामयाब रही थी। यह मामला फिर कोर्ट की गलियारों के चक्कर में फंस गया। इसके बाद भी आंदोलन कमजोर स्थिति में कभी इधर तो कभी उधर चला। यह संकीर्ण निम्नपूंजीवादी सोच से चलता रहा। पिछले 17 वर्षों से बेसिक शिक्षा को अपनी ऊर्जा से चलाने वाले इन शिक्षकों को जिन्हें शिक्षामित्र कहा जाता है उनके साथ किसी बंधुआ मजदूर से बदतर व्यवहार किया गया। इन शिक्षकों का कोई दोष न होते हुए भी इनके पूरे परिवार को अंधे कुएं में धकेल दिया गया।

सरकार द्वारा इस प्रकार नौकरी से हटाए जाने से ढेरों शिक्षक सदमे में आ गए। तकरीबन 700 शिक्षकों द्वारा आत्महत्याएं करने का मामला यूनियन द्वारा उजागर किया गया। इन आत्महत्याओं से न तो कोर्ट को मतलब न “राष्ट्रवादी सरकार” को !!

अंततः योगी सरकार द्वारा 65,800 शिक्षकों की भर्ती करने की घोषणा की गई। ये भर्तियां परीक्षा के माध्यम से की जानी थी। इसके लिए 1 लाख 25 हजार 746 लोगों ने अप्लाई किया. 27 मई को परीक्षा हुई । योगी सरकार ने 21 मई को लिखित परीक्षा का कटऑफ बदल दिया।

हाईकोर्ट के हस्तक्षेप के बाद पुरानी कटऑफ पर रिजल्ट जारी करने को कहा । 13 अगस्त को रिजल्ट आ गया । 68,500 की जगह केवल 41,556 अभ्यर्थी ही सेलेक्ट हुए । 31 अगस्त को चयनित अभ्यर्थियों की सूची जारी हुई. पता चला कि सेलेक्ट हुए 41,556 अभ्यर्थियों में से 6127 को बाहर कर दिया गया है । अभ्यर्थियों के बवाल के बाद इन 6127 लोगों को भी इसमें शामिल कर लिया गया।
इस बीच तमाम अभ्यर्थियों इन नियुक्तियों में बड़े स्तर पर भ्रष्टाचार, गलत लोगो क नियुक्तियां करने के आरोप लगाते हुए कोर्ट में 41 याचिकाएं लगा दी । “सोनिका सिंह नाम की एक अभ्यर्थी ने याचिका में आरोप लगाया गया कि उसकी कॉपी ही बदल गई है. इसके बाद कई और ऐसे मामले आए जिनमें अभ्यर्थी के नंबर रिजल्ट में कम थे, मगर जब उन्होंने अपनी स्कैन कॉपी निकलवाई तो उनके नंबर ज्यादा निकले. जैसे अजयवीर सिंह के 52 नंबर थे, मगर जब उनकी स्कैन कॉपी निकली तो उसमें 81 नंबर थे. ऐसे ही रिजवाना परवीन को 60 नंबर मिले थे, मगर स्कैन कॉपी में उनके 87 नंबर थे. ऐसे ही मनोज को 19 नंबर मिले थे, जबकि कॉपी में उनके 98 अंक निकले. ऊपर से इन स्कैन कॉपी को पाने के लिए अभ्यर्थियों से 2000 रुपये भी वसूले जा रहे हैं। इसके अलावा मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने इस परीक्षा में पास हुए कुछ अभ्यर्थियों को 4 सितंबर को खुद भी नियुक्ति पत्र सौंपे थे. मगर इसके बाद पता चला कि इसमें से 23 अभ्यर्थी ऐसे हैं जो लिखित परीक्षा में पास नहीं हुए थे मगर उन्हें जिले आवंटित कर दिए गए. तुरंत इनकी भर्ती रोकने के आदेश जारी किए गए. ये भी पता चला कि परीक्षा नियामक प्राधिकारी कार्यालय ने दो ऐसे अभ्यर्थियों को भी पास कर दिया है जो परीक्षा में शामिल ही नहीं हुए थे.

इन याचिकाओं पर 1 नवंबर 2018 को फैसला हो गया । इलाहाबाद हाई कोर्ट ने इस पूरी भर्ती प्रक्रिया के भ्रष्टाचार को देखते हुए सीबीआई जांच के आदेश दे दिए । योगी सरकार इसके खिलाफ डबल बेंच में अपील करने की बात कह रही है।

कोर्ट के फैसला आने के बाद जब लखनऊ में ट्रेनी शिक्षकों द्वारा बड़े पैमाने पर प्रदर्शन किया गया। ये बी टी सी प्रशिक्षित हैं। इनकी मांग थी कि न्यूनतम कट ऑफ मेरिट 30 – 33 % किया जाय जबकि सरकार ने 40 से 45 % को कट ऑफ मेरिट कर दी जिसके चलते लगभग 28 हज़ार पोस्ट खाली रह गयी। एक ओर घोषित 68500 नियुक्तियो के बजाय केवल तकरीबन 35 हज़ार को ही नियुक्ति पत्र जारी किए गए और इसमें भी बड़े स्तर पर सांठ गांठ , मिलीभगत व भ्रष्टाचार भी हुआ है।

ट्रेनी शिक्षकों के इस प्रदर्शन पर उनकी मांगों पर गौर करने के बजाय जमकर लाठीचार्ज किया। लाठीचार्ज के चलते कइयों को गंभीर चोटें आयी। यही नहीं इसके बाद कइयों पर मुकदमा भी दर्ज कर दिया गया। एक “राष्ट्रवादी व उग्र हिंदुत्वादी” सरकार ने इस प्रकार “रोजगार” की मांग का जवाब “राम” और “लाठी-मुक़दमों” से दिया है।

साभार: क्रालोस