सरकार को चुनाव खर्च के लिए आरबीआई से चाहिए एक लाख करोड़: पूर्व वित्त मंत्री पी चिदंबरम का सनसनीखेज़ आरोप

तथागत भट्टाचार्य

पूर्व वित्त मंत्री पी चिदंबरम का कहना है कि सरकार को चुनावी खर्च के लिए एक लाख करोड़ रुपए चाहिए, और उसकी नजर आरबीआई के खजाने पर है। नेशनल हेरल्ड के साथ एक संक्षिप्त इंटरव्यू में उन्होंने कहा कि इसमें से कुछ पैसा सरकार वित्तीय घाटे की भरपाई के लिए भी करेगी।

आखिर आरबीआई और सरकार के रिश्तों में खटास क्यों आई? असली झगड़ा है क्या?

असली झगड़ा यह है कि सरकार आरबीआई पर नियंत्रण करना चाहतीहै। सरकार आरबीआई को बोर्ड द्वारा नियंत्रित संस्था बनाना चाहती है। इस सबकीशुरुआत उस वक्त हुई थी जब नचिकेत मोर को उनका कार्यकाल पूरा होने से पहले ही हटायागया और और सरकार ने तीन अपने लोगों को डायरेक्टर बना दिया। यह लोग सरकारीडायरेक्टर यानी सचिवों से अलग नहीं थे। सरकार को लगा था कि इन निदेशकों के जरिए वहबोर्ड की बैठकों को प्रभावित कर आरबीआई पर अपने फैसले थोप सकेगी। लेकिन इस सब मेंसरकार यह भूल गई कि आरबीआई गवर्नर का पद बहुत खास है। वह सिर्फ एक ऐसा सीईओ नहींहै जो बोर्ड के आदेशों को मानेगा। आरबीआई बोर्ड में अपने लोगों को बिठाना आरबीआईपर कब्जे की कोशिश के अलावा कुछ नहीं था।

सरकार दरअसल आरबीआई से चाहती क्या है? और अगली बोर्ड मीटिंग मेंक्या हो सकता है?

सरकार चाहती है कि आरबीआई प्रॉम्पट करेक्टिव एक्शन मेंनर्मी करे। जबकि आरबीआई का यह नियम काफी कड़ा है। इसके अलावा बैंकों को पैसे के लेनदेन में खुली छूट भीसरकार चाहती है, साथ ही वह गैर बैंकिंग वित्तीय कंपनियों और एमएसएमई यानी छोटे औरमझोले उद्योगो के लिए स्पेशल विंडो बनाना चाहती है। लेकिन इस सबसे ऊपर जो बात है,वह यह है कि सरकार की नजर आरबीआई के खज़ाने पर है और उसे कम से कम एक लाख करोड़रुपए चाहिए जिसे वह अगले लोकसभा चुनाव में खर्च करना चाहती है। हां कुछ पैसा वहलगातार बढ़ते वित्तीय घाटे के लक्ष्य को पाटने में भी खर्च करना चाहती है।

इससे आम लोगों, बैंकों और जमाकर्ताओं पर क्या असर पड़ेगा?

आरबीआई और सरकार के झगड़े का सीधा असर आम लोगों पर नहीं पड़ेगा।लेकिन अगर सरकार और आरबीआई अलग-अलग रास्ते पर चलेंगे तो इससे अस्थिरता और अनिश्तताका माहौल बनेगा और निवेशकों में भय पैदा होगा। नतीतन, निवेश और विकास, दोनों पर विपरीतप्रभाव होगा।

भारत को अभी भी दुनिया की सबसे तेज़ी से उभरती अर्थव्यवस्थाकहा जा रहा है। ऐसे में सरकार क्यों आरबीआई से मदद मांग रही है?
तेज़ी से उभरती अर्थव्यवस्था का तमगा दरअसल एक मुखौटा है। नएतौर-तरीकों अपनाने के बाद निश्चित रूप से सामने आता है कि जीडीपी के आंकड़ों कोबढ़ा-चढ़ाकर सामने रखा जा रहा है। लेकिन इस विकास दर में कई बुनियादी कमियां छिपीहुई हैं। अब चूंकि सरकार के पास विकल्प नहीं बचे हैं जिनसे वह निवेश और विकास मेंतेज़ी ला सके, उसकी निर्भरता कमजोर और नर्म मुद्रा नीति पर बढ़ गई है, क्योंकिउससे ही निवेश और विकास की रफ्तार कुछ हद तक बढ़ सकती है।
आपने अपने एक ट्वीट मे कहा था कि अभी और भी बुरी खबरें आनेवाली हैं। आपको किस बात की आशंका है?सरकार ने आरबीआई एक्ट की धारा 7 के तहत सलाह-मशविरा शुरु करदिया है। यह कोई आम या सामान्य बात नहीं है। इससे एक विशेष संकेत मिलता है। सरकारअगर इस पर अड़ी रही और इस धारा के तहत निर्देश जारी कर दिए, तो मुझे विश्वास है किगवर्नर इस्तीफा दे देंगे। और यही सबसे बुरी खबर होगी।