CBI को क्यों करनी पड़ रही है यूपी में 68,500 शिक्षकों की भर्ती की जांच?

अविनाश

हाई कोर्ट ने उत्तर प्रदेश में हुई 68,500 शिक्षकों की भर्ती की सीबीआई जांच के आदेश दे दिए हैं.

उत्तर प्रदेश में जब बीजेपी विधानसभा चुनाव के लिए प्रचार कर रही थी, तो उसने अपना एक संकल्प पत्र जारी किया था. इसके संकल्प पत्र के पेज नंबर सात पर बीजेपी ने एक वादा किया था. हर युवा को मिलेगा रोजगार शीर्षक वाले इस पेज पर लिखा था-

‘सपा के शासनकाल में उत्तर प्रदेश पब्लिक सर्विस कमीशन के पक्षपात पर स्वयं उच्च न्यायालय ने संज्ञान लेकर चेयरमैन को पद से हटाया. प्रदेश सरकार की हर भर्ती एक घोटाला बनकर सामने आई. भारतीय जनता पार्टी भर्ती प्रक्रिया की पारदर्शिता को सख्ती से लागू करेगी.’

बीजेपी का 2017 का यूपी चुनाव का संकल्प पत्र.
बीजेपी इस वादे के साथ सत्ता में तो आ गई. लेकिन वो अपने वादे पर कायम नहीं रह पाई. सत्ता में आने के साथ ही बीजेपी की योगी सरकार ने शिक्षकों की भर्ती के लिए परीक्षा करवाई. परीक्षा इसलिए थी ताकि प्राथमिक स्कूलों में शिक्षकों की कमी दूर की जा सके. कुल 68,500 पदों के लिए भर्ती निकाली गई. इसके लिए एक लाख 25 हजार 746 लोगों ने अप्लाई किया. 27 मई को परीक्षा हुई और फिर 13 अगस्त को रिजल्ट आ गया. रिजल्ट आने के साथ ही इस भर्ती पर भी वही आरोप लगने लगे, जो आरोप सपा सरकार की भर्तियों पर लगते थे. भ्रष्टाचार के आरोप, गड़बड़ियों के आरोप और नकल के आरोप, जिसके बाद शासन ने सख्ती करते हुए कई अधिकारियों को सस्पेंड कर दिया. और फिर ये भर्ती भी सपा सरकार की भर्तियों की तरह हाई कोर्ट में पहुंच गई.

अभ्यर्थियों ने प्रदर्शन भी किया था, जिसके बाद पुलिस ने लाठीचार्ज कर दिया था.

कुल 41,500 अभ्यर्थियों ने 41 याचिकाओं के जरिए हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया. कोर्ट में सुनवाई हुई. 1 नवंबर 2018 को फैसला आया. और इस फैसले के तहत इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ बेंच के जस्टिस इरशाद अली ने इस पूरी भर्ती प्रक्रिया को रद करते हुए सीबीआई जांच के आदेश दे दिए. कोर्ट ने कहा-

‘सरकार से स्वतंत्र और निष्पक्ष चयन की उम्मीद की जाती है. लेकिन गलत इरादे से और कुछ राजनीतिक उद्देश्यों को पूरा करने के लिए बड़े पैमाने पर गैरकानूनी चयन किए गए. प्रथम दृष्टया अधिकारियों ने अपने अभ्यर्थियों को फायदा पहुंचाने के लिए अधिकारों का दुरुपयोग किया. जिन अभ्यर्थियों को लिखित परीक्षा में कम नंबर मिले, उनके नंबर बढ़ा दिए गए. कुछ अभ्यर्थियों को फेल दिखाने के लिए कॉपी फाड़ दी गई और कइयों के पन्ने बदल दिए गए. जब बारकोडिंग करने वाली एजेंसी ने खुद ही स्वीकार किया है कि तकरीबन दर्जन भर अभ्यर्थियों की कॉपियां बदली गई हैं, इसके बावजूद उनके खिलाफ ऐक्शन नहीं लिया गया.’

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने इस भर्ती की सीबीआई जांच के आदेश दिए हैं.
इसके अलावा हाई कोर्ट ने सरकार पर भी तंज कसा. कहा-

‘पिछले 20 साल से राज्य सरकार, चयन बोर्ड या कमिशन की लगभग हर भर्ती में गड़बड़ी देखने को मिल रही है. लेकिन दोषी अफसरों के खिलाफ कार्रवाई के बजाय जांच कमिटियां बनती रहीं, जिन्होंने कुछ नहीं किया.’

इस टिप्पणी के साथ ही कोर्ट ने इस भर्ती की सीबीआई जांच के आदेश दे दिए और कहा-

‘जांच कमिटी सिर्फ भ्रष्टाचार में शामिल अफसरों को बचाने के लिए बनाई गई थी. इसलिए पूरे मामले की निष्पक्ष जांच ज़रूरी है. सरकार सीबीआई जांच के लिए तैयार नहीं है, इसलिए हमें आदेश देना पड़ रहा है. सीबीआई 6 महीने में इसकी जांच करे और इससे पहले 26 नवंबर को ये बताए कि अब तक उसने इस मामले में क्या किया है.’

क्या हुई थीं गड़बड़ियां, जिनको लेकर कोर्ट ने सीबीआई जांच के आदेश दिए हैं-

1. भर्ती परीक्षा के ठीक एक हफ्ता पहले 21 मई को लिखित परीक्षा का कटऑफ बदल दिया गया था. विवाद इसी पर शुरू हो गया था. हालांकि फिर हाईकोर्ट ने इसे खारिज कर दिया और पुराने कटऑफ पर रिजल्ट जारी करने को कहा.

2. 8 अगस्त को कट ऑफ बदली गई. फिर भर्ती परीक्षा का रिजल्ट आया 13 अगस्त को. इसमें 68,500 के मुकाबले मात्र 41,556 अभ्यर्थी ही सेलेक्ट हुए. फिर हाई कोर्ट से एक खबर आई. पता चला कि सोनिका सिंह नाम की एक अभ्यर्थी ने वहां याचिका लगाई है. आरोप लगाया गया है कि उसकी कॉपी ही बदल गई है. इसके बाद कई और ऐसे मामले आए जिनमें अभ्यर्थी के नंबर रिजल्ट में कम थे, मगर जब उन्होंने अपनी स्कैन कॉपी निकलवाई तो उनके नंबर ज्यादा निकले. जैसे अजयवीर सिंह के 52 नंबर थे, मगर जब उनकी स्कैन कॉपी निकली तो उसमें 81 नंबर थे. ऐसे ही रिजवाना परवीन को 60 नंबर मिले थे, मगर स्कैन कॉपी में उनके 87 नंबर थे. ऐसे ही मनोज को 19 नंबर मिले थे, जबकि कॉपी में उनके 98 अंक निकले. ऊपर से इन स्कैन कॉपी को पाने के लिए अभ्यर्थियों से 2000 रुपये भी वसूले जा रहे हैं. इस पर भी खूब बवाल हुआ.

शिक्षक भर्ती अभ्यर्थियों ने निशातगंज एससीईआरटी कार्यालय का घेराव किया था.
3. 31 अगस्त को चयनित अभ्यर्थियों की सूची जारी हुई. पता चला कि सेलेक्ट हुए 41,556 अभ्यर्थियों में से 6127 को बाहर कर दिया गया है. ऐसा पासिंग मार्क्स में बदलाव के कारण हुआ. हालांकि अभ्यर्थियों के बवाल के बाद इन 6127 लोगों को भी इसमें शामिल कर लिया गया.

4. मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने इस परीक्षा में पास हुए कुछ अभ्यर्थियों को 4 सितंबर को खुद भी नियुक्ति पत्र सौंपे थे. मगर इसके बाद पता चला कि इसमें से 23 अभ्यर्थी ऐसे हैं जो लिखित परीक्षा में पास नहीं हुए थे मगर उन्हें जिले आवंटित कर दिए गए. तुरंत इनकी भर्ती रोकने के आदेश जारी किए गए. ये भी पता चला कि परीक्षा नियामक प्राधिकारी कार्यालय ने दो ऐसे अभ्यर्थियों को भी पास कर दिया है जो परीक्षा में शामिल ही नहीं हुए थे.

योगी आदित्यनाथ सरकार की पहली भर्ती पर ही विवाद हो गया है.
5. विवाद बढ़ा तो भर्ती की जांच के लिए कमेटी बनाई गई. इस कमेटी पर भी सवाल खड़े हो गए. वो इसलिए क्योंकि इस कमेटी में उन्हीं लोगों को शामिल कर लिया गया जिन पर गड़बड़ियों के आरोप थे. सबसे ज्यादा विवाद परीक्षा नियामक प्राधिकारी की सचिव सुक्ता सिंह को इसमें शामिल करने पर हुआ. क्योंकि उन्हीं की जिम्मेदारी थी कि ऐसी कोई गड़बड़ियां न हों.

6. इस बीच सोशल मीडिया पर एक वीडियो वायरल हो गया, जिसमें कुछ कागज जलते दिख रहे हैं. दावा किया गया कि ये परीक्षा से जुड़ी कॉपियां और अन्य दस्तावेज हैं. जगह इलाहाबाद का परीक्षा नियामक कार्यालय है. जली कॉपियों के बीच सोनिका देवी की जली ओएमआर सीट भी मिली. वही सोनिका जिन्होंने हाई कोर्ट में कॉपी बदले जाने का आरोप लगाया था. इसके बाद मुख्यमंत्री ने ऐक्शन लेते हुए प्रथम दृष्टया दोषी पाई गईं सचिव परीक्षा नियामक प्राधिकारी सुत्ता सिंह को 8 सितंबर को सस्पेंड कर दिया. बेसिक शिक्षा परिषद के सचिव संजय सिन्हा को भी पद से हटा दिया गया. दो और सस्पेंशन हुए और फिर 5 अक्टूबर को जांच के लिए एक कमिटी बना दी गई.

शिक्षक भर्ती में गड़बड़ी को लेकर कई जगहों पर हंगामा हुआ था.
अब आगे क्या?

इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ बेंच ने इस मामले की सीबीआई जांच के आदेश दिए हैं. ये फैसला सिंगल बेंच का है. अब प्रदेश सरकार इस फैसले के खिलाफ डबल बेंच में अपील करेगी. सरकार का मानना है कि जांच कमिटी की रिपोर्ट में साफ हो चुका है कि जो भी गड़बड़ियां हुई थीं, वो सिर्फ लापरवाही थी और इसका कोई आपराधिक आशय नहीं था. जिन लोगों के साथ अन्याय हुआ था, उनको भी नौकरी देने की प्रक्रिया शुरू हो चुकी है. ऐसे में यूपी सरकार का मानना है कि इस मामले में सीबीआई जांच के लिए कोई ठोस आधार नहीं है.

साभार: ललनटोप डॉट कॉम