नोटबंदी के 2 साल: जानिए कारोबारियों ने क्या खोया क्या पाया?

नोटबंदी के दो साल पूरे होने के बावजूद कारोबारियों के दिलो-दिमाग पर इसका दर्द हावी है

Pratima Sharma

नोटबंदी के दो साल हो गए हैं लेकिन कारोबारियों की सिरदर्दी अभी भी खत्म नहीं हो पाई है. राजधानी दिल्ली के कारोबारियों की बात करें तो बड़े और छोटे बिजनेसमैन काफी हद तक इस दर्द से उबर चुके हैं लेकिन मझोले कारोबारियों की मुश्किलें खत्म नहीं हुई हैं.

सदर बाजार मार्केट एसोसिएशन के अध्यक्ष ताराचंद गुप्ता का कहना है, ‘सरकार ने जिस वजह से नोटबंदी का फैसला लिया था उसका असर तो कहीं नजर नहीं आ रहा है. उल्टे इसकी मार मझोले कारोबारियों पर सबसे ज्यादा पड़ी है.’ उन्होंने कहा कि सदर बजार एशिया के सबसे बड़े बाजारों में शुमार है. गुप्ता के मुताबिक, नोटबंदी की वजह से मझोले कारोबारियों का तकरीबन 80 फीसदी बिजनेस खत्म हो गया है.

बड़े और मझोले कारोबारियों में फर्क पर बात करते हुए गुप्ता ने कहा, ‘बड़े कारोबारियों के पास फाइनेंसर हैं जिससे उन्हें अब कैश की दिक्कत नहीं है. लेकिन मझोले दुकानदार जिनके पास फाइनेंसर का बैकअप नहीं है उनकी मुश्किलें कम होने का नाम नहीं ले रही हैं.’ गुप्ता का कहना है कि मझोले कारोबारियों पर दोतरफा दबाव हैं. एक तरफ नोटबंदी की वजह से धंधा पुराने रंग में नहीं लौट पाया है. दूसरी तरफ उन्हें दुकान का किराया और कर्मचारियों को वेतन भी देना पड़ता है. ऐसे कई कारोबारी हैं जो ये खर्चा भी बमुश्किल से उठा रहे हैं.

गुप्ता के मुताबिक, सदर बाजार में 40,000 रजिस्टर्ड बिजनेसमैन हैं. वहीं 40,000 कारोबारी रेहड़ी पटरी पर अपनी दुकान लगाते हैं. गुप्ता ने बेहद नाराजगी से कहा कि सदर बाजार ‘नो वेंडर ज़ोन’ है. इसके बावजूद वहां हजारों रेहड़ी पटरी वाले हैं. नतीजा यह है कि कई बार मझोले कारोबारियों का बिजनेस रेहड़ी पटरी वाले खा जाते हैं.

सदर बाजार मार्केट एसोसिएशन के अध्यक्ष का कहना है कि MCD में बीजेपी है. MCD के अधिकारी पैसे लेकर रेहड़ी पटरी वाले को सदर बाजार में दुकान लगाने की इजाजत देते हैं. उन्होंने यह भी कहा कि रेहड़ी पटरी वाले MCD के अधिकारी को ‘सुविधा शुल्क’ के नाम पर कुछ पैसे देते हैं. इन्हीं पैसों के बदले ‘नो वेंडर ज़ोन’ में भी रेहड़ी पटरी लगाने की इजाजत मिल जाती है. गुप्ता ने इसके खिलाफ पीएम नरेंद्र मोदी को पत्र भी लिखा है लेकिन अभी तक उस पर कोई सुनवाई नहीं हुई है.

राजनीति भी गरम रही

8 नवंबर 2016 को जब नरेंद्र मोदी ने 500 और 1000 रुपए के नोट पर बैन लगाया था तो लोगों में यह भरोसा जगाया गया कि इससे काले धन पर रोक लगेगी. हालांकि वक्त बीतने के साथ नोटबंदी का मकसद ब्लैकमनी से बदलकर कैशलेस पर आ गया. इस पर जमकर राजनीति भी हुई लेकिन नुकसान कारोबारियों का हुआ.

जब से नोटबंदी का ऐलान हुआ है तब से इस पर राजनीति गरमाई है. नोटबंदी के दिनों में कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी फटी जेब लेकर ATM की लाइन में लगे थे. दो साल बाद भी इस पर राजनीति बदस्तूर जारी है. कुछ दिनों पहले ही राहुल गांधी ने पीएम पर यह आरोप लगाया था कि नोटबंदी का इस्तेमाल कुछ रईसों के काले धन को सफेद बनाने के लिए किया गया था और ऐसा करने वाले ‘जादूगर’ नरेंद्र मोदी थे. राहुल गांधी ने मध्यप्रदेश विधानसभा चुनावों के प्रचार के दौरान ये बाते कहीं. उन्होंने ब्लैकमनी में एमपी के सीएम शिवराज सिंह को भी निशाना बनाया. राहुल गांधी ने कहा कि ‘मामाजी’ के बेटे का नाम भी पनामा पेपर में था लेकिन उस पर कोई कार्रवाई नहीं हुई.

नोटबंदी पर लगातार हो रही राजनीति पर चावड़ी बाजार के एक कारोबारी सुरेंद्र यादव ने कहा, ‘सब अपना मतलब निकालते हैं. आम आदमी से किसी को कोई फर्क नहीं पड़ता.’ यादव ने कहा कि बाजार से नकदी खत्म होने के बाद हमारा धंधा चौपट हो गया था. अब बड़ी मुश्किल से हमारी जिंदगी पटरी पर लौट रही है. सरकार ने जब 2000 रुपए का नोट जारी किया था तब यह अफवाह जोरों पर थी कि कुछ समय बाद 2000 रुपए का नोट भी बंद हो सकता है. यह डर अब भी यादव के दिलो-दिमाग पर हावी है. वह कहते हैं ..अब नोटबंदी हुई तो सब तबाह हो जाएगा..

साभार: सीनियर न्यूज एडिटर, फ़र्स्टपोस्ट हिंदी