सीबीआई की कानूनी वैधता पर अब भी सवाल खड़े हैं, गुवाहाटी हाईकोर्ट कह चुका है सीबीआई कोअसंवैधानिक

देश की प्रीमियम जांच एजेंसी केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआई) की कानूनी वैधता पर पहली बार सवाल नहीं उठे हैं। उच्चपदस्थ सरकारी सूत्रों ने अमर उजाला को बताया कि डीएसपीई के तहत सीबीआई के गठन और कामकाज पर पहले भी कई बार केंद्र सरकार को बचाव करना पड़ चुका है। गुवाहाटी हाईकोर्ट तो 7 नवंबर 2013 को अपने एक फैसले में सीबीआई के गठन और इसके कामकाज को ही असंवैधानिक करार दे चुका है।

हालांकि सीबीआई का कहना है कि इस मामले का आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू के उस फैसले से कोई संबंध नहीं है, जिसमें एजेंसी को आंध्र प्रदेश में बिना अनुमति के कोई कामकाज करने से रोका गया है। हालांकि नायडू ने भी दिल्ली स्पेशल पुलिस एस्टैबलिस्मेंट एक्ट (डीएसपीई) के प्रावधानों के तहत ही यह अधिसूचना जारी की है, जिसके तहत सीबीआई का गठन हुआ था।

यह कहा था गुवाहाटी हाईकोर्ट ने

हाई कोर्ट ने सीबीआई कोअसंवैधानिक कहा

गुवाहाटी हाई कोर्ट ने अपने एक अहम फैसले में कहा है कि केंद्रीय जांच एजेंसी (सीबीआई) पुलिस फोर्स नहीं है, इसलिए वह न तो अपराधों की जांच कर सकती है और न ही चार्जशीट दायर कर सकती है। कोर्ट के इस फैसले के बाद कई अहम मामलों को लेकर जारी जांच सवालों के घेरे में आ गए थे।

असम में बीएसएनएल के कमर्चारी नवेंद्र कुमार के खिलाफ 2001 में सीबीआई ने आपराधिक षड्यंत्र रचने और धोखाधड़ी का मामला दर्ज किया था, जिसके बाद उन्होंने संविधान के तहत सीबीआई के गठन को चुनौती देते हुए अपने खिलाफ दायर एफआईआर को खारिज करने की मांग की थी। हाईकोर्ट की सिंगल जज बेंच ने उनकी याचिका खारिज कर दी। इसके बाद उन्होंने डिविजन बेच में याचिका दायर की।

जस्टिस इकबाल अहमद अंसारी और जस्टिस इंदिरा शाह की बेंच सीबीआई के गठन को असंवैधानिक करार दिया और नवेंद्र के खिलाफ सीबीआई की चार्जशीट को खारिज कर दिया। अदालत ने अपने फैसले में कहा कि सीबीआई का गठन निश्चित जरूरत को पूरा करने के लिए ‘कुछ समय’ के लिए ही गृह मंत्रालय के संकल्प के जरिए किया गया था। वह प्रस्ताव न तो केंद्रीय कैबिनेट का फैसला था और न ही उसके साथ राष्ट्रपति की स्वीकृति का कोई आदेश था। लिहाजा, विवादित संकल्प विभागीय आदेश के अलावा कुछ भी नहीं है।

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बेंच ने कहा कि एक अप्रैल 1963 को सीबीआई गठन के नियमों के अनुसार यह न तो दिल्ली स्पेशल पुलिस इस्टैबलिशमेंट (डीएसपीई) का अंग है और न ही हिस्सा। इसके अलावा डीएसपीई ऐक्ट 1946 के तहत सीबीआई पुलिस फोर्स की तरह व्यवहार नहीं कर सकती है। इन परिस्थितियों में सीबीआई द्वारा किसी युवक के खिलाफ मामला दर्ज करना और उसे गिरफ्तार करना अपराध है।

बेंच ने कहा कि एक अप्रैल 1963 को सीबीआई गठन के नियमों के अनुसार यह न तो दिल्ली स्पेशल पुलिस इस्टैबलिशमेंट (डीएसपीई) का अंग है और न ही हिस्सा। इसके अलावा डीएसपीई ऐक्ट 1946 के तहत सीबीआई पुलिस फोर्स की तरह व्यवहार नहीं कर सकती है। इन परिस्थितियों में सीबीआई द्वारा किसी युवक के खिलाफ मामला दर्ज करना और उसे गिरफ्तार करना अपराध है।

सुप्रीम कोर्ट से डिसमिस हो चुकी है केंद्र की अपील

गुवाहाटी हाईकोर्ट के सनसनीखेज फैसले के खिलाफ दो दिन बाद केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट से गुहार लगाई थी। केंद्र की अपील पर तत्कालीन चीफ जस्टिस ने अपने निवास पर ही सुनवाई की थी और हाईकोर्ट के फैसले पर रोक लगा दी थी। पिछले पांच साल से यह मामला सुप्रीम कोर्ट में लंबित था 2016 में इन अपीलों को कोर्ट ने डिसमिस कर दिया था कुछ अन्य याचिकाओं पर अप्रैल 2018 में सुनवाई हुई थी। किसी भी याचिका के पैरवीकार ने इस मामले कोई पैरवी नहीं कि जिसके चलते केस रजिस्ट्रार कोर्ट में लंबित हैं। कुल मिलाके ये कहा जा सकता है कि गुवाहाटी हाइकोर्ट का फैसला अभी भी जस का तस बना हुआ है।