स्मृति शेष: ‘मैं इस सियाह चादर का क्या करूंगी’

(28 जुलाई 1946- 21 नवंम्बर 2018)

नाज़ ख़ान

इस्मत चुगताई और रशीद जहां जैसी विद्रोही लेखिकाओं के दौर में फहमीदा रियाज एक ऐसी शायरा का नाम है, जिन्हें उनकी बेबाकी के लिये याद किया जाता है। उस दौर में भी जब महिलाओं के लिये पर्दा लाजिमी था, उनकी कलम बेबाकी से चली और उन्होंने पर्दे के विरोध में लिखा, ‘हुजूर मैं इस सियाह चादर का क्या करूंगी, यह क्यों आप मुझको बख्शते हैं, बसद इनायत मैं सोग में हूं कि इसको ओढूं, रबू अलम खल्क को दिखाऊं, दरोग हूं मैं कि इसकी तारीकियों में खिफ्फ्त से डूब जाऊं। न मैं गुनहगार हूं न मुजरिम कि इस सियाही कि मुहर अपनी जबीं पर हर हाल में लगाऊ…’

उन्होंने न सिर्फ पाकिस्तान में मानवाधिकारों की अनदेखी कर रहे शासन के विरोध में कलम उठाई, बल्कि हिन्दुस्तान, पाकिस्तान के बीच सुलग रहे कश्मीर मुद्दे को भी सियासत के तौर पर तहरीर करते हुए नज्म लिखी ‘अमन की आशा।’ एक बार उन्होंने इसको लिखने का कारण कुछ इस तरह बताया था, ‘इस नज्म को मैं हिन्दुस्तान में ही पढ़ना पसंद करती हूं, वहां पर लुत्फ ज्यादा आता है। वहां पर लोग इसे सुनने के बाद पत्थर मारते हैं।’ उन्होंने हंस कर कहा था। वह कहती थीं, ‘हम भी चाहते हैं कि कश्मीर हमको मिल जाये। कोई तो वजह है कि हमको कश्मीर नहीं मिल पाया। इसे सिर्फ अल्लाह की मर्जी तो नहीं कह सकते। कोई तो वजह है कि इस समस्या का हल नहीं निकल पाया। फिर भी दोनों देशों की सरकारों को ख्याल आता है कि इस समस्या का हल निकलना चाहिए, क्योंकि यह मसला सांप के मुंह में छछूंदर है, जिसे न उगल पा रहे हैं न निगल पा रहे हैं। इसी मसले पर एक कार्यक्रम में अमन पर बात हो रही थी। सब तकरीर कर रहे थे कि अमन लायी जाये। मैं बैठी सोच रही थी कि ये क्या बात कर रहे हैं। मेरी नज्म ‘अमन की आशा’ मैंने वहीं लिखना शुरू की।’

‘क्यों लायें, किसलिए लायें अमन, किसलिए खत्म कर दें यह जो अरबों-खरबों का कारोबार कायम है,
जंग की बदौलत जो हम नियाजमंदों का रोजगार कायम है।’

उन्होंने ज्यादा नज्में नहीं लिखीं। नस्र यानी गद्य में अधिक लिखा। शायरी में उनका उपनाम फहमीदा ही रहा। उनकी नज्मों का पहला संग्रह ‘पत्थर की जबान 1947 में महज 21 वर्ष की उम्र में आया। इसमें उनकी कॉलेज के जमाने की नज्में हैं। इसके अलावा उनकी कुछ नयी, पुरानी नज्मों का संग्रह ‘तुम कबीर’ नाम से प्रकाशित हुआ। इसमें कुछ
नज्में उन्होंने भारत में रहने के दौरान लिखीं। तुम कबीर के बारे में उन्होंने कहा था, ‘इसे ‘तुम कबीर’ नाम बाद में दिया। पहले मैं इस संग्रह का नाम ‘मौसमों के दायरे में’ रखना चाहती थी। दरअसल, कबीर मेरे बेटे का नाम है, जो एक हादसे में मुझे छोड़ कर चला गया। मैं सोचती थी मैं कबीर की कोई यादगार कायम करूं। वह सब यादगार तो मैं कायम नहीं कर सकी, क्योंकि न मुझमें इतनी हिम्मत बची थी, न इतनी ताकत ही रह गयी थी। जो कर सकती थी वह यह किया कि अपनी किताब का नाम ‘तुम कबीर’ रख दिया। अब जब भी फहमीदा रियाज कि किताबों का जिक्र आयेगा, ‘तुम कबीर’ का भी आयेगा। बस यही कर सकती थी।’

अपनी बेबाकी के लिये मशहूर फहमीदा का उनकी किताब ‘बदन दरीदा’ को लेकर भी बहुत विरोध हुआ था। इस पर वह कहती थीं, ‘जिस तरह से उस किताब को गलत समझा गया था, वह अब नहीं रहा है। माहौल बदला है। वरना पहले तो लिखने पर बहुत बंदिशें थीं। कोई मुझसे कह रहा था कि आप बहुत बहादुर हैं तो इसकी वजह यही है कि जो मेरे दिल में आता है मैं लिख देती हूं। इसके बाद जब उस पर बहुत शोर-शराबा होता है तो मैं बहुत रोती हूं। दुखी होती हूं इसलिए नहीं कि मैंने क्या लिख दिया इसलिए कि लोग विरोध क्यों कर रहे हैं। फिर मैं गालिब का कहा याद करती हूं कि ‘होती आयी है कि अच्छों को बुरा कहते हैं।’ शायरी के अलावा उन्होंने अपनी तहरीरों के जरिये भी तत्कालीन सत्ता की नीतियों के विरुद्ध आवाज बुलंद की और इसका माध्यम बनाया उन्होंने अपनी पत्रिका ‘आवाज’ को। नतीजे में पाकिस्तान की जियाउल हक हुकूमत में न सिर्फ उनकी कलम को बैन किया गया, बल्कि उन पर बगावत जैसे आरोप में 14 मुकदमें भी दर्ज हुए। ऐसे में कुछ समय वह भारत में रहीं। पाकिस्तान में फैली दहशतगर्दी से वह आहत थीं और कहती थीं, ‘यह खतरनाक सोच आयी कहां से, पहले तो नहीं थी।’
उनका जन्म उत्तर प्रदेश के मेरठ में हुआ था। भारत के बारे में उन्होंने कहा था, ‘हिन्दुस्तान सिर्फ इतना नहीं है कि मैं यहां पैदा हुई, बल्कि यहां बचपन से मैंने जो साहित्य पढ़ा, हिन्दुस्तान उसमें हमेशा मौजूद था।’ दोनों देशों को एक-दूसरे का अक्स समझने वाली फहमीदा कहती रहीं कि ‘एक चराग से दूसरा चराग जलता है।’ यानी संस्कृतियां एक-दसरे का असर लेती रहती हैं।

अपनी बेबाकी को अपनी पहचान बनाने वाली फहमीदा रियाज अपने जीवन के अंतिम वर्षों में कैंसर से जूझ रही थीं। जहां उनकी पहचान एक शायरा के तौर है, वहीं उनकी ‘हल्का मेरी जंजीर का’, ‘हम रकाब’, ‘अधूरा आदमी’, ‘अपना जुर्म साबित है’, ‘मैं मिट्टी की मूरत हूं’ और ‘धूप’ जैसी किताबें भी उनकी शख्सियत के अन्य पहलुओं को भी उजागर करती हैं।

साभार: वरिष्ठ पत्रकार नाज़ खान का आलेख