बिहार में 20 वर्षो से कार्यरत मेडिकल स्टाफ की नियुक्ति फ़र्ज़ी: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने बिहार के प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों (पीएचसी) में नियुक्त किए गए सैकड़ों कर्मचारियों को राहत देने से इनकार करते हुए उनकी याचिका को खारिज कर दिया। कोर्ट ने पाया कि ये कर्मचारी फर्जी कागजातों के आधार पर बिना किसी कानूनी प्रक्रिया के भर्ती किए गए थे। जस्टिस मदन बी. लोकुर, दीपक गुप्ता और एस.ए. नजीर की पीठ ने शुक्रवार को यह फैसला देते हुए पटना हाईकोर्ट के आदेश के खिलाफ बिहार सरकार की याचिका स्वीकार कर ली। हाईकोर्ट ने कर्मचारियों की रिट याचिका पर 2009 में राज्य सरकार को आदेश दिया था कि हटाए गए सभी कर्मचारियों को बहाल किया जाए और उनके रुके हुए वेतन का भुगतान किया जाए। ये कर्मचारी 10 से लेकर 20 सालों से विभिन्न पीएचसी में काम कर रहे थे।

हाईकोर्ट ने कहा था कि सरकार ने उन्हें बिना नोटिस दिए हटाया है, जो नैसर्गिक न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन है। राज्य सरकार के वकील गोपाल सिंह और मनीष कुमार ने कोर्ट को बताया था सरकार ने समिति बनाकर इन कर्मचारियों के मामलों की जांच करवाई। जांच में पाया था कि इन पीएचसी के तृतीय और चतुर्थ श्रेणी में कर्मचारियों की भर्ती जिलों के सिविल सर्जन-सह-सीएमओ के आदेश पर बिना किसी प्रक्रिया का पालन किए हुई है। कर्मचारियों के प्रमाण-पत्र भी फर्जी हैं। समिति ने रिपोर्ट में बताया था कि उनका नियुक्ति शुरुआत से ही व्यर्थ है।पीठ ने इस समिति की रिपोर्ट का संज्ञान लिया और राज्य सरकार की जांच को सही पाते हुए उन्हें बहाल करने का हाईकोर्ट का आदेश निरस्त कर दिया।