देश में बैलेट पेपर से ही चुनाव क्यों कराना चाहिए, 10 बड़ी वजह

दिलीप सी मंडल

इस लेख के शुरू में एक स्पष्टीकरण. यह लेख 2 जून 2017 से 1 सितंबर 2017 के बीच नहीं लिखा जा सकता था, क्योंकि उत्तराखंड हाइकोर्ट ने जून, 2017 के आदेश में यह कहा कि कोई भी मान्यता प्राप्त राष्ट्रीय दल, मान्यता प्राप्त राज्य स्तरीय दल, संस्था, एनजीओ या व्यक्ति इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन की सोशल मीडिया, अखबार, टीवी समेट कहीं भी आलोचना नहीं कर सकता.

लेकिन सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा, जस्टिस एएम खानविलकर और जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ की बेंच ने 1 सितंबर, 2017 को उत्तराखंड हाईकोर्ट के इस फैसले पर रोक लगा दी. इस वजह से अब इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन की आलोचना संभव है.

सुप्रीम कोर्ट का फैसला इसलिए जरूरी था, क्योंकि खुद सुप्रीम कोर्ट ने बीजेपी नेता सुब्रह्मण्‍यम स्वामी की याचिका पर ईवीएम को पारदर्शी चुनाव के लिए अपर्याप्त माना था और इसके साथ कागज की पर्ची निकालने वाली मशीन वीवीपैट अनिवार्य रूप से लगाने का आदेश दिया था. कोर्ट ने अपने आदेश में कहा:
कागज की पर्ची निकलने की सूरत में ही मतदाताओं का भरोसा ईवीएम पर कायम हो सकता है.
भारतीय लोकतंत्र पहले पेपर बैलेट से होने वाले चुनाव से चलता था. फिर 1982 में पहली बार इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन आई, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि कानून में इसका प्रावधान नहीं है. इस वजह से जनप्रतिनिधित्व कानून में संशोधन करके ईवीएम के जरिए भी चुनाव कराने की बात जोड़ी गई.

2004 से पहले तक दोनों पद्धतियां यानी पेपर बैलेट और ईवीएम दोनों के जरिए चुनाव हुए. 2004 का लोकसभा चुनाव पूरी तरह ईवीएम के जरिए हुआ. अब पूरे देश में ईवीएम के जरिए लोकसभा और विधानसभा चुनाव हो रहे हैं. 2019 का लोकसभा चुनाव पहला ऐसा चुनाव होगा, जिसमें हर ईवीएम के साथ वीवीपैट मशीन लगाई जाएगी.

ये एक तरह से चुनाव में कागज की वापसी ही है
देश में चुनाव कैसे हों, यह जनप्रतिनिधित्व कानून से तय होता है और चुनाव आयोग का काम सिर्फ इस कानून के दायरे में चुनाव कराना है. आज चुनाव आयोग ईवीएम के पक्ष में बोल रहा है, क्योंकि कानून में मशीन से चुनाव कराने की बात है. इसके लिए जनप्रतिनिधित्व कानून में संशोधन करके एक धारा 61 (ए) जोड़ी गई है. लेकिन जनप्रतिनिधित्व कानून में अगर दोबारा संशोधन हुआ और पेपर बैलेट से ही मतदान कराने की बात इसमें जोड़ी गई, तो यही चुनाव आयोग पेपर बैलेट के पक्ष में बोलेगा.
इस बात को स्पष्ट रूप से समझने की जरूरत है कि ईवीएम के खिलाफ तर्कों को सुप्रीम कोर्ट ने भी सुना है, इसलिए ईवीएम के खिलाफ बोलना न तो लोकतंत्र के खिलाफ है और न ही संविधान के.
इस आलेख में ईवीएम से चुनाव न कराने के लिए जो तर्क दिए जा रहे हैं उनमें से कुछ बीजेपी, कांग्रेस और अन्य दलों के नेताओं तथा सामाजिक संगठनों की ओर से उठाए जा चुके हैं.
1. EVM पारदर्शी नहीं है
पेपर बैलेट में वोट डालने वाले को नजर आता है कि उसने किस निशान पर मुहर लगाई. मुहर लगाने के बाद वह बैलेट पेपर को मोड़कर सभी उम्मीदवारों के प्रतिनिधि के सामने उसे बैलेट बॉक्स में डालता है.

ईवीएम में मतदाता को यह पता नहीं चल पाता कि उसने जिस निशान पर बटन दबाया है, वोट उसे ही गया है. इस कमी को पूरा करने के लिए सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर ईवीएम के साथ वीवीपैट मशीन लगाई गई है, जिससे कागज की एक पर्ची निकलती है, जिसे मतदाता देख सकता है. ये पर्चियां जमा होती हैं. हालांकि कागज की पर्ची और मशीन में दर्ज वोट समान है, इसकी कोई गारंटी नहीं हो पाती है. इसलिए विवाद की स्थिति में इन पर्चियों को गिनने का प्रावधान है. अभी तक का अनुभव है कि कागज की पर्चियों की गिनती आम तौर पर नहीं होती है.

2. EVM में दोबारा मतगणना संभव नहीं
ईवीएम में डाला गया वोट डिजिटल फॉर्म में मशीन में जाकर एक संख्या या नंबर में तब्दील हो जाता है. इसलिए पेपर बैलेट की तरह हर वोट को दोबारा नहीं गिना जा सकता. दोबारा गिनने के नाम पर तमाम ईवीएम में दर्ज कुल संख्या को ही जोड़ा जा सकता है.

3. आधुनिक लोकतंत्र EVM से राष्ट्रीय स्तर का मतदान नहीं कराते
ईवीएम से मतदान की टेक्नोलॉजी काफी समय से उपलब्ध है. लेकिन अमेरिका से लेकर ब्रिटेन और फ्रांस से लेकर ऑस्ट्रेलिया और जापान तक किसी भी देश में नेशनल इलेक्शन ईवीएम से नहीं होता. कुछ देशों ने प्रयोग करने के बाद ईवीएम का इस्तेमाल बंद कर दिया है. मिसाल के तौर पर, जर्मनी ने ईवीएम से चुनाव कराने की पहल की, लेकिन वहां सुप्रीम कोर्ट ने ईवीएम से चुनाव न कराने के पक्ष में फैसला दिया. अब जर्मनी भी पेपर बैलेट से ही चुनाव कराता है.

नीदरलैंड में जनता के विरोध के बाद 2007 से वहां चुनाव पेपर बैलेट पर होते हैं. आयरलैंड और इटली ने इसका प्रयोग करने के बाद इन पर रोक लगा दी है. ज्यादातर देशों ने इनका कभी इस्तेमाल ही नहीं किया. ईवीएम से राष्ट्रीय स्तर का मतदान भारत के अलावा सिर्फ ब्राजील,

4. जिन देशों से ये टेक्नोलॉजी आई, वे भी पेपर बैलेट पर भरोसा करते हैं
माइक्रोचिप की टेक्नोलॉजी जिन देशों में विकसित हुई और जिन देशों में इनका निर्माण होता है, वे देश पेपर बैलेट से ही मतदान करके राष्ट्रीय सरकार चुनते हैं. इसलिए इस तर्क का कोई आधार नहीं है कि पेपर बैलेट की तुलना में ईवीएम ज्यादा विकसित टेक्नोलॉजी है और पेपर बैलेट पर लौटने का मतलब पुरानी टेक्नोलॉजी को फिर से अपनाना होगा.

5. जो मशीन ठीक की जा सकती है, उसे खराब भी किया जा सकता है
मतदान के लिए भेजी गई कोई ईवीएम खराब हो जाती है, तो उसे टेक्नीशियन ठीक करता है. लेकिन इसका मतलब यह भी है कि किसी मशीन को खराब भी किया जा सकता है. मुमकिन है कि ऐसा न होता हो, लेकिन इसकी आशंका को पूरी तरह खारिज नहीं किया जा सकता.
ऐसे भी इन मशीनों में लगातार सुधार हो रहा है. 2006 से पहले भारत में एम1 मशीनें इस्तेमाल होती थीं. अब एम3 मशीनों का इस्तेमाल होता है. इसलिए ये कहना कि मशीन में कोई कमी नहीं है, अपने आप में अवैज्ञानिक तर्क है.
6. लगभग सभी प्रमुख दल कभी न कभी EVM को अविश्वसनीय बता चुके हैं
ईवीएम पर पहला एतराज बीजेपी ने जताया था. 2009 का लोकसभा चुनाव हारने के बाद बीजेपी ने इसके खिलाफ अभियान चलाया. बीजेपी से जुड़े और अब राज्यसभा सांसद जीवीएल नरसिंह राव ने बाकायदा ईवीएम के खिलाफ एक किताब – ‘डेमोक्रेसी एट रिस्क: कैन वी ट्रस्ट आवर इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन’ लिखी और बताया कि किस तरह ईवीएम के कारण लोकतंत्र खतरे में है.

उसी समय सुब्रह्मण्यम भारती ने ईवीएम के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में मुकदमा किया. मौजूदा दौर में कांग्रेस, एसपी, बीएसपी, आरजेडी, तृणमूल कांग्रेस और वामपंथी दलों समेत 17 विपक्षी दलों ने चुनाव आयोग को लिखकर दिया है कि ईवीएम की जगह पेपर बैलेट से मतदान कराए जाएं. यानी भारतीय राजनीति में सक्रिय लगभग हर दल ने कभी न कभी ईवीएम पर सवाल उठाए हैं.

7. पेपर बैलेट की किसी भी कमी का जवाब नहीं हैं EVM
मतदाता को लालच देने या धमकाने का मामला हो या उसे बूथ तक न जाने देने की शिकायत या किसी और मतदाता का वोट डाल देना यानी बोगस मतदान या जबरन किसी बूथ पर कब्जा करके एक पार्टी के पक्ष में वोट डाल देना, या चुनावी हिंसा… इनमें से किसी भी समस्या का समाधान ईवीएम में नहीं है. ये सभी चुनावी कदाचार जैसे पेपर बैलेट के समय होते थे, वे ईवीएम के समय में भी होते हैं या हो सकते हैं.
8. EVM से चुनाव का समय नहीं बचता
इसका सबसे बड़ा उदाहरण पांच राज्यों के मौजूदा विधानसभा चुनाव हैं. इन चुनावों की घोषणा से लेकर चुनाव नतीजों के बीच 30 दिन का समय लग रहा है, जबकि 1984 का लोकसभा चुनाव पेपर बैलेट पर हुआ और पूरे देश का चुनाव 24 दिसंबर से 27 दिसंबर के बीच चार दिन में निबट गए और देश में नई सरकार बन गई.

1989 का लोकसभा चुनाव भी बैलेट पेपर से हुए और मतदान 22 से 26 नवंबर के बीच पांच दिन में हो गए. वह भी तब जबकि सड़कें पहले ज्यादा खराब थीं और कई इलाकों में जहां अब सड़कें हैं, पहले सड़कें नहीं थीं.
ईवीएम से गिनती का समय जरूर बचता है. लेकिन पांच साल में होने वाले चुनाव में गिनती के एक या दो ज्यादा दिन लगने का खास मतलब नहीं है.
9. यह कहना अवैज्ञानिक है कि EVM में छेड़छाड़ असंभव है
ईवीएम के बारे में ये दावा है कि इसे किसी भी बाहरी मशीन से जोड़ा नहीं जा सकता. लेकिन इस दावे का कोई वैज्ञानिक आधार नहीं है. हो सकता है कि कोई भी आदमी ऐसा न कर पाया हो, लेकिन ऐसा हो ही नहीं सकता, यह कहना विज्ञान की भाषा नहीं है.

चुनाव आयोग कहता है कि बिना मशीन खोले इसमें छेड़खानी करके दिखाएं. वैसे भी इस मशीन में लगी माइक्रोचिप की प्रोग्रामिंग में इंसानी दखल होती है. कोई आदमी ही मशीन में ये जानकारी डालता है कि किसी चुनाव क्षेत्र में कितने उम्मीदवार हैं और किसका चुनाव चिह्न क्या है. हो सकता है कि इसमें कोई गड़बड़ी नहीं होती हो, लेकिन इस आधार पर ये नहीं कहा जा सकता कि उसमें कोई गड़बड़ी कर ही नहीं सकता.

10. लोकतंत्र में भरोसा कायम रखने के लिए जरूरी है बैलेट पेपर
लगभग सभी राजनीतिक दल ईवीएम को किसी न किसी दौर में अविश्वसनीय बता चुके हैं. सुप्रीम कोर्ट ने भी मतदाताओं का विश्वास बनाए रखने के लिए वीवीपैट जोड़ने की बात आई. ईवीएम के खिलाफ राजनीति दल बयान दे रहे हैं और ये सभी हारे हुए दल नहीं है. ममता बनर्जी की पार्टी तृणमूल कांग्रेस लगातार चुनाव जीत रही हैं और ईवीएम के खिलाफ हैं.

लालू प्रसाद यादव की पार्टी आरजेडी बिहार विधान सभा में सबसे बड़ी पार्टी है और ईवीएम के खिलाफ है. केजरीवाल की पार्टी आप ने दिल्ली का चुनाव जीता है, लेकिन वे चाहते हैं कि चुनाव पेपर बैलेट से हों. ऐसे और भी दल हैं. इस तमाम वजह से लोगों के मन में ईवीएम को लेकर खटका हो गया है.
अगर एक भी मतदाता को शक हो गया है कि वह जिस निशान पर बटन दबा रहा है, वहां उसका वोट शायद नहीं जा रहा है, तो ये पर्याप्त कारण है, जिसके लिए देश को पेपर बैलेट से मतदान कराने पर लौट जाना चाहिए. इसे लेकर जिद नहीं करनी चाहिए.
पेपर बैलेट से मतदान कराने में किसी की हार नहीं है. इसमें लोकतंत्र की जीत है. भारतीय लोकतंत्र पर नागरिकों का विश्वास बनाए रखने के लिए ये जरूरी है. संसद को इस दिशा में पहल करनी चाहिए. चुनाव आयोग को इस बहस से दूर रहना चाहिए और जनप्रतिनिधित्व कानून के तहत मतदान कराने का अपना संवैधानिक दायित्व पूरा करना चाहिए.

(दिलीप मंडल सीनियर जर्नलिस्‍ट हैं. इस आर्टिकल में छपे विचार उनके अपने हैं. इसमें क्‍व‍िंट की सहमति होना जरूरी नहीं है. आर्टिकल की कुछ सूचनाएं लेखक के अपने ब्लॉग पर छपी हैं.)