राफेल डील में भ्रष्टाचार हुआ या नहीं? सुप्रीम कोर्ट ने नहीं कही कोई बात, पढ़ें- फैसले की अहम बातें

राफेल डील में कोर्ट ने सिर्फ तीन पहलुओं पर सुनवाई की और मामले से जुड़ी सभी याचिकाओं को एकसाथ खारिज कर दिया। राफेल डील में कोर्ट ने सिर्फ तीन पहलुओं पर सुनवाई की और मामले से जुड़ी सभी याचिकाओं को एकसाथ खारिज कर दिया।

सुप्रीम कोर्ट ने राफेल डील विवाद में किसी तरह की जांच का आदेश देने से इनकार किया है। इसके साथ ही कोर्ट ने इस डील के तहत अपनाई गई खरीद प्रक्रिया, कीमत निर्धारण और ऑफसेट पार्टनर बनाने के मामले में भी दखल देने से इनकार किया है। हालांकि, कोर्ट ने मामले में भ्रष्टाचार पर कोई टिप्पणी नहीं की है कि इस डील में करप्शन हुआ है या नहीं। कोर्ट ने सिर्फ तीन पहलुओं पर सुनवाई की और मामले से जुड़ी सभी याचिकाओं को एकसाथ खारिज कर दिया। मुख्य न्यायाधीश जस्टिस रंजन गोगोई, जस्टिस संजय किशन कौल और जस्टिस के एम जोसेफ की खंडपीठ ने शुक्रवार (14 दिसंबर) को फैसला सुनाते हुए कहा, “सभी तीन पहलुओं को ध्यान में रखते हुए और मामले को विस्तार से सुनते हुए हम इस निष्कर्ष पर पहुंचे हैं कि भारत सरकार द्वारा 36 राफेल डील से जुड़ी संवेदनशील रक्षा खरीद में अदालत द्वारा हस्तक्षेप करने का कोई कारण नहीं दिखता है। कुछ लोगों की व्यक्तिगत धारणा कोर्ट द्वारा जांच कराए जाने का आधार नहीं हो सकता, खासकर, ऐसे विशेष मामलों में।”

कोर्ट ने अपने फैसले में यह भी टिप्पणी की कि यह न तो उचित होगा और न ही कोर्ट के कार्यक्षेत्र में होगा कि वो डील के तकनीकि पहलुओं में दखल दे। कोर्ट ने कहा, “रक्षा खरीद प्रक्रिया (डीपीपी) 2013 के तहत वास्तविक उपकरण निर्माता (ओईएम) को यह अधिकार है कि वो किसे ऑफसेट पार्टनर नियुक्त करे। इस खरीद प्रक्रिया में सरकार की भूमिका पर कोई विचार नहीं किया गया है, इसलिए, केवल प्रेस साक्षात्कार या सुझाव के आधार पर अदालत द्वारा न्यायिक समीक्षा नहीं की जा सकती है। खासकर तब, जब दोनों ही पक्षों द्वारा प्रेस में दिए गए बयान से इनकार किया गया हो।”

सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा, “मामले की विस्तृत सुनवाई के बाद हमें रिकॉर्ड में ऐसी कोई महत्वपूर्ण सामग्री नहीं मिली, जिससे यह साबित हो कि यह भारत सरकार द्वारा किसी भी पार्टी के हित को साधने वाला कारोबारी पक्षपात का मामला है क्योंकि भारत सरकार के पास इंडियन ऑफसेट पार्टनर चुनने का कोई विकल्प नहीं था।” 36 राफेल डील की कीमतों पर कोर्ट ने कहा, “यह अदालत का काम नहीं है कि इस तरह के मामले में कीमतों की तुलना वर्तमान परिदृश्य में करे।” हालांकि, कोर्ट ने कहा कि राफेल डील की कीमतों को गोपनीय रखने का भी कोई आधार नहीं दिखता है।

कोर्ट ने रक्षा खरीद प्रक्रिया पर कहा, “36 राफेल लड़ाकू विमान की खरीद प्रक्रिया 23 सितंबर, 2016 को पूरी हो गई थी। तब किसी भी पक्ष ने उस पर कोई सवाल खड़े नहीं किए। जब फ्रांस के पूर्व राष्ट्रपति फ्रांस्वा ओलांद का साक्षात्कार छपा तब इस मामले में याचिकाएं डाली गईं। यह ओलांद के बयान पर फायदा लेने की कोशिश है। ओलांद के बयान के बाद न सिर्फ ऑफसेट पार्टनर चुनने बल्कि डील की कीमतों और पूरी खरीद प्रक्रिया पर भी सवाल उठाए गए।” कोर्ट ने कहा, “इस मुद्दे को आगे बढ़ाना और क्लाउज बाय क्लाउज सभी जरूरी प्रक्रिया का अनुपालन करना हमें जरूरी नहीं लगता है।”

बता दें कि इस मामले में एडवोकेट एम एल शर्मा, विनीत ढांडा ने याचिका दायर की थी। इसके बाद आप सांसद संजय सिंह ने भी याचिका दायर की थी। तीन याचिका के बाद पूर्व केंद्रीय मंत्री यशवंत सिन्हा, अरुण शौरी और वरिष्ठ वकील प्रशांत भूषण ने भी पिटीशन दायर किया था। इनकी याचिका में कहा गया था कि सुप्रीम कोर्ट मामले की जांच कोर्ट की निगरानी में सीबीआई से कराने का निर्देश दे। इन याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए खंडपीठ ने 14 नवंबर को फैसला सुरक्षित रख लिया था।