राफेल सौदा: बिना फैसला पढ़े ही उछलने लगी है मीडिया और सरकार, जेपीसी से क्यों कर रही इनकार !

कांग्रेस ने कहा है कि मीडिया और बीजेपी राफेल सौदे के फैसले को लेकर गलत सूचनाएं फैलाने से पहले अगर कोर्ट का फैसला पढ़ लें तो तस्वीर साफ हो जाएगी। कांग्रेस ने कहा है कि यह कोई आपराधिक मामला नहीं था जिसमें किसी को क्लीन चिट मिलती है।

सुप्रीम कोर्ट ने राफेल मामले में दाखिल सभी याचिकाओं को यह कहते हुए खारिज कर दिया कि इस सौदे की जांच करना उसके अधिकार क्षेत्र से बाहर है। अपेक्षित रूप से इस फैसले पर प्रतिक्रियाएं दो तरह की सामने आ रही हैं। सरकार और बीजेपी बल्लियों उछल रही है तो विपक्ष ने इसे सीमित निर्णय बताते हुए राफेल सौदे को पाक साफ मानने से इनकार कर दिया है और इसकी संयुक्त संसदीय समिति से जांच कराने की मांग की धार तेज़ कर दी है। सरकार और विपक्ष की प्रतिक्रियां तो अपेक्षित ही हैं, लेकिन आश्चर्य मीडिया की खुशी से है। स्थापित पत्रकारों से लेकर कुकुरमुत्तों की तरह उग आए और पनपे टीवी पत्रकारों की बांछे टीवी स्क्रीन से बाहर तक खिली नजर आ रही हैं।

चलिए सबसे पहले बताते हैं कि सुप्रीम कोर्ट ने याचिकाएं खारिज करते हुए क्या कहा है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि राफेल विमान हासिल करने की प्रक्रिया से वह संतुष्ट है कि इसमें नियमों का पालन हुआ है।

सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस रंजन गोगोई की अध्यक्षता वाली जिस बेंच ने यह फैसला सुनाया है उसमें जस्टिस गोगोई के अलावा जस्टिस संजय किशन कौल और जस्टिस के एम जोसेफ भी हैं।फैसला देते वक्त पीठ ने मौखिक रूप से कहा कि, ‘सुप्रीम कोर्ट 126 के बजाए 36 विमानों की खरीद के फैसले पर निर्णय को लंबे समय तक टाल नहीं सकता। यह सत्य है कि पहले 126 विमानों को खरीदने की बात की जा रही थी, जिसे बदलकर 36 विमानों की खरीद का सौदा किया गया, लेकिन इससे कोई फर्क नहीं पड़ता।’

राफेल विमानों की कीमत पर सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यह सुप्रीम कोर्ट का काम नहीं है कि वह किसी विमान की कीमत या वित्तीय मामलों की जांच करे। साथ ही कोर्ट ने यह भी कह दिया कि अनिल अंबानी को इस सौदे में ऑफसेट पार्टनर बनाना केंद्र का या विमान बनाने वाली कंपनी का अधिकार है, हम इसमें कुछ नहीं कह सकते।

तो क्या सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले और मौखिक टिप्पणियों को मोदी सरकार के लिए राफेल मामले में क्लीन चिट माना जा सकता है। वरिष्ठ वकील और राफेल मामले में याचिका दाखिल करने वालों में से एक प्रशांत भूषण ने इस फैसले को ‘पूरी तरह’ गलत करार दिया है। उन्होंने कहा कि, “यह एक सीमित क्लीन चिट है। अदालत उन काफी मामलों की समीक्षा की जो हमने उठाए थे। इस मामले में पुनरीक्षण याचिका की जरूरत है या नहीं इस पर फैसला बाद में लिया जाएगा।”

वहीं कांग्रेस ने कहा है कि सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर भक्तों का बल्लियों उछलना बेमानी है क्योंकि कोर्ट ने साफ कहा है कि राफेल सौदे की जांच करना उसके अधिकार क्षेत्र में नहीं है। कांग्रेस ने इसके साथ ही राफेल सौदे की संयुक्त संसदीय समिति से जांच कराने की मांग दोहराई है।

लेकिन सुप्रीम कोर्ट का फैसला आते ही पूरी मोदी सरकार और बीजेपी बल्लियों उछल रही है। आश्चर्य इस बात पर है कि बीजेपी और मोदी सरकार के मंत्री उसी सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर तालियां पीट रहे हैं, जिसे वह सबरीमाला मंदिर मुद्दे पर पानी-पी पी कर गालियां देते रहे हैं। कांग्रेस ने बीजेपी मंत्रियों और भक्तों के लिए सुप्रीम कोर्ट के फैसले की प्रति भी उपलब्ध कराई है। कांग्रेस ने कहा है कि मीडिया और बीजेपी राफेल सौदे के फैसले को लेकर गलत सूचनाएं फैलाने से पहले अगर कोर्ट का फैसला पढ़ लें तो तस्वीर सफ हो जाएगी। कांग्रेस ने कहा है कि यह कोई आपराधिक मामला नहीं था जिसमें किसी को क्लीन चिट मिलती है।

कांग्रेस प्रवक्ता रणदीप सुरजेवाला ने भी कहा कि सुप्रीम कोर्ट के निर्णय ने कांग्रेस के 15 नवंबर को दिए बयान पर मुहर लगाई कि राफ़ेल घोटाले में विमान की क़ीमत, खरीद की प्रक्रिया में गड़बड़ी और मापदंडों से छेड़छाड़ की जांच अदालत के दायरे में नहीं आती। उन्होंने कहा कि कांग्रेस पहले दिन से इस मामले में संयुक्त संसदीय समिति से जांच की मांग कर रही है। उन्होंने सवाल उठाया कि आखिर मोदी सरकार जांच से क्यों भाग रही है?

सुप्रीम कोर्ट का फैसला आने के बाद बीजेपी में गतिविधिया तेज़ हो गई है। न्यूज एजेंसी के मुताबिक रक्षा मंत्री निर्मला सीतारमण ने इस सिलसिले में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मुलाकात की। समझा जाता है कि सीतारमण राफेल मामले में प्रधानमंत्री को कोर्ट के फैसले की विस्तृत जानकारी देकर आगे की रणनीति पर चर्चा करेंगी।

लेकिन राफेल विमान खरीद जैसे तकनीकी मामलों पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले को लेकर तमाम तरह के सवाल उठने लगे हैं। रक्षा मामलों पर गहराई से विश्लेषण करने वाले पत्रकार अजय शुक्ला ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले को दोषपूर्ण करार दिया है।

तो क्या राफेल सौदे में कथित भ्रष्टाचार को सिर्फ राजनीतिक मामला माना जाएगा? क्या इस सौदे में कुछ भी गलत नहीं हुआ? क्या 126 के बजाए सिर्फ 36 विमान खरीदना देशहित में किया गया फैसला है? क्या विमानों की कीमत को कई गुना बढ़ा देना जायज़ माना जाएगा? यह वह सवाल हैं जो मीडिया और पत्रकारों को पूछना चाहिए। पूछे भी जा रहे हैं, लेकिन जिस तरह से पत्रकार बिरादरी की प्रतिक्रिया आ रही है, संदेह है कि तमाम ज्वलंत मुद्दों की तरह इस पर भी सवाल पूछे जाएंगे। नीचे दिए गए दो पत्रकारों की प्रतिक्रिया इसकी बानगी है।