राफेल डील: सरकार को क्लीन चिट नहीं देता है राफेल पर आया सुप्रीम कोर्ट का फैसला, कई तथ्यात्मक गल्तियां आईं सामने

राफेल पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला अंतरविरोधों का पिटारा हो गया है। कहीं तथ्यात्मक गल्ती है तो कहीं कोर्ट की सीमाएं और कहीं कुछ ऐसी गल्तियां की गयी हैं जिनका कोई आधार तलाश पाना भी किसी के लिए मुश्किल है। कोर्ट ने दो बातें मुख्य तौर पर कही हैं। पहला ये कि राफेल की खरीद में प्रक्रियागत नियमों का उल्लंघन नहीं हुआ है। साथ ही कीमतों के मामले में कोर्ट ने कहा है कि उसके डिटेल में जाना और उसका तुलनात्मक अध्ययन करना उसका काम नहीं है। ऐसे में एक बात बिल्कुल साफ हो गयी है कोर्ट ने सरकार को किसी तरह की क्लीन चिट नहीं दी है।

लेकिन कोर्ट के फैसले में जिस तरह की तथ्यात्मक गल्तियां सामने आयी हैं शायद ही इसकी कोई दूसरी मिसाल मिले। और सबसे खास बात ये है कि इन गल्तियों में दूसरी संवैधानिक संस्थाओं को भी शामिल कर लिया गया है।

याचिकाकर्ता प्रशांत भूषण, यशवंत सिन्हा और अरुण शौरी ने इन गल्तियों को सिलसिलेवार तरीके से पेश किया है।

कोर्ट ने अपने पैरा नंबर 25 में कहा है कि “हालांकि कीमतों का विवरण कंट्रोलर एंड ऑडिटर जनरल (इसके बाद इसे सीएजी कहा जाएगा) और सीएजी की रिपोर्ट की पब्लिक एकाउंट्स कमेटी (इसके बाद इसे पीएसी कहा जाएगा) द्वारा जांच की गयी थी। और रिपोर्ट के एक हिस्से को संसद के सामने पेश किया गया था और वो सार्वजनिक रूप से मौजूद है।”

जबकि सच्चाई ये है कि अभी तक सीएजी की इस पर कोई रिपोर्ट नहीं है। और अगर रिपोर्ट ही नहीं है तो पीएसी में उसे पेश किए जाने का सवाल ही कहां उठता है। प्रशांत भूषण ने अपने वक्तव्य में कहा है कि ऊपर जो तथ्य दिए गए हैं वो न तो रिकार्ड में हैं और न ही तथ्यात्मक तौर पर सही हैं। सीएजी रिपोर्ट पीएसी में नहीं पेश की गयी है। और सीएजी रिपोर्ट का भी कोई हिस्सा संसद में नहीं पेश किया गया है। और न ही सार्वजनिक तौर पर कुछ ऐसा मौजूद है।

निश्चित तौर पर ये तथ्यात्मक रुप से गलत बयान है जो सरकार द्वारा कोर्ट को दी गयी किसी सूचना (जो रिकार्ड में नहीं है और न ही याचिकाकर्ताओं को दी गयी है) पर आधारित है। कोर्ट ने ऐसी सूचना पर विश्वास किया जो तथ्यात्मक रूप से सही नहीं है। ये इस बात को दिखाता है कि सीलबंद लिफाफे में सरकार द्वारा कोर्ट को दी गयी सूचना और उसके आधार पर सुनाया गया फैसला कितना खतरनाक हो सकता है। खास बात ये है कि आज ही पीएसी के चेयरमैन और लोकसभा में कांग्रेस संसदीय दल के नेता मल्लिकार्जुन खड़गे ने भी इस बात को साफ कर दिया है कि ऐसी कोई रिपोर्ट पीएसी के सामने नहीं आयी है।

कोर्ट ने इसी पैरा में आगे इस बात का जिक्र किया है कि एयरफोर्स के चीफ ने कीमतों के विवरण का खुलासा करने के मामले में अपनी असमर्थता जाहिर की थी उनका कहना था कि इससे राष्ट्रीय सुरक्षा पर विपरीत असर पड़ेगा। प्रशांत भूषण का कहना है कि ये कथित तथ्य भी रिकार्ड में दर्ज नहीं है। और ये नहीं समझा जा सका कि कोर्ट ने ये कैसे और कहां से हासिल किया। कोर्ट का कहना है कि उसने खरीद की प्रक्रिया और कीमतों के बारे में एयरफोर्स के अधिकारियों से पूछताछ की थी।

वक्तव्य में कहा गया है कि ये भी तथ्यात्मक रूप से सही नहीं है। क्योंकि एयरफोर्स के अधिकारियों से कोर्ट ने केवल राफेल एयरक्राफ्ट के तीसरे, चौथे और पांचवें जनरेशन के बारे में पूछा था और आखिरी खरीद कब हुई थी इसकी जानकाली ली थी। न तो उनसे खरीद की प्रक्रिया और कीमतों के बारे में सवाल किया गया था और न ही उन्होंने इस पर कुछ बोला था। कम से कम सुनवाई के दौरान इस तरह का कुछ नहीं हुआ था।

कीमतों के बारे में कोर्ट ने फैसले में कहा है कि “हमने नजदीक से कीमतों के विवरण का परीक्षण किया है……..जहां तक कीमतों के विवरण की बात है जवाब देने वाले अधिकारियों का दावा है कि 36 राफेल एयरक्राफ्ट की खरीद में एक व्यवसायिक लाभ है। सरकारी अधिकारियों का दावा है कि आईजीए (इंटर गवर्नमेंटल एग्रीमेंट) के तहत रखरखाव और हथियारों के पैकेज में कुछ बेहतर शर्तें हैं। निश्चित तौर पर ये कोर्ट का काम नहीं है कि वो मौजूदा मामले में कीमतों के विवरण की तुलना में जाए। इस पर हम कुछ और ज्यादा नहीं कहना चाहते हैं क्योंकि मामले को एक गोपनीय दायरे में रखा जाना है।”

प्रशांत भूषण समेत बाकी दोनों याचिकाकर्ताओं द्वारा जारी बयान में इस पर कहा गया है कि कोर्ट ने हम लोगों द्वारा मुहैया कराए गए इस तथ्य पर भी गौर करना जरूरी नहीं समझा जिसमें हम लोगों ने बताया था कि बेंचमार्क कीमत को अचानक 5.2 बिलियन यूरो से बढ़ाकर 8.2 बिलियन यूरो कर दिया गया था। जबकि कीमतों पर विचार करने वाली कमेटी में बैठे तीन विशेषज्ञ अफसरों ने उसका विरोध किया था। जिसके बाद उनका तबादला कर दिया गया था। दिलचस्प बात ये है कि इस मसले पर कोर्ट ने सीएजी की रिपोर्ट का जिक्र किया है। जो कभी आयी ही नहीं और कहीं मौजूद तक नहीं है।

तथ्यात्मक गल्तियों का सिलसिला यहीं नहीं खत्म हुआ। आफसेट मामले को कोर्ट के फैसले में इस तरह से पेश किया गया है जिसको देखकर कोई भी दांतों तले अंगुली दबा लेगा। आफसेट मामले में अंबानी की कंपनी के बारे में कोर्ट का कहना है कि इसे डसाल्ट द्वारा तय किया जाना था जो रिलायंस कंपनी के साथ 2012 से ही बातचीत कर रही है। जबकि सच्चाई ये है कि डसाल्ट जिस रिलायंस कंपनी के साथ बातचीत कर रही थी वो मुकेश अंबानी की कंपनी है न कि अनिल अंबानी की जिसके साथ डसाल्ट का आफसेट समझौता हुआ है। अनिल अंबानी ने अपनी नई कंपनी को 2015 में हुई डील से कुछ ही दिनों पहले बनाया था। साथ ही प्रशांत भूषण के बयान में कहा गया है कि कोर्ट ने आफसेट मामले में भी इस बात को दरकिनार कर दिया कि प्रत्येक आफसेट को आखिरी तौर पर रक्षामंत्री द्वारा पास किया जाएगा।

इस तरह से सुप्रीम कोर्ट का फैसला किसी भी रूप में सरकार को किसी तरह का क्लीन चिट नहीं है। क्योंकि कोर्ट उसकी डिटेल में गया ही नहीं। उसने केवल प्रक्रियागत मुद्दों की छानबीन की। हालांकि उसमें भी जिस तरह की तथ्यात्मक गल्तियां सामने आ रही हैं उससे भी वो सवालों के घेरे में आ जाता है। और कीमतों के बारे में उसका कहना है कि उसके डिटेल में जाने की उसकी सीमाएं हैं। साथ ही संवेदनशील क्षेत्र और रक्षा जरूरतों का हवाला देकर उसके द्वारा पूरे मामले से अपना हाथ खींच लिया है। साभार: जनचौक