सरकारी जासूसी: विपक्ष ने किया हंगामा तो आई सरकार की सफाई- नहीं जारी किया कोई नया ऑर्डर

कांग्रेस सांसद आनंद शर्मा ने कहा, “बेडरुम में घुसकर लिंचिंग कराना चाहती है बीजेपी।” गृह मंत्रालय के नए ऑर्डर से विपक्षी नेता विफर पड़े हैं।

देश की 10 इन्वेस्टिगेटिव एजेंसियां कभी भी, कहीं भी आपके मोबाइल फोन, लैपटॉप, टैबलेट, कम्प्यूटर या अन्य इलेक्ट्रॉनिक डिवाइस को खंगाल सकती है और उसे इंटरसेप्ट कर सकती है।

केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार ने एक नया ऑर्डर जारी किया है, जिसके तहत देश की 10 इन्वेस्टिगेटिव एजेंसियां कभी भी, कहीं भी आपके मोबाइल फोन, लैपटॉप, टैबलेट, कम्प्यूटर या अन्य इलेक्ट्रॉनिक डिवाइस को खंगाल सकती है और आपके कॉल या डेटा को इंटरसेप्ट कर सकती है। एजेंसियां चाहे तो उनकी निगरानी या जासूसी भी करवा सकती है। 20 दिसंबर को गजट में गृह मंत्रालय की तरफ से इससे संबंधित नोटिफिकेशन प्रकाशित किया गया है। नोटिफिकेशन के मुताबिक गृह मंत्रालय के साइबर सुरक्षा एवं सूचना विभाग ने इन्फॉर्मेशन टेक्नॉलजी ऐक्ट के सेक्शन 69 (1) के तहत 10 एजेंसियों को यह अधिकारी दिया है। मंत्रालय की ओर से जारी किए गए नोटिफिकेशन में उन 10 एजेंसियों की सूची भी जारी की गई है, जिन्हें जासूसी करने का अधिकार दिया गया है।

इस बीच केंद्रीय गृह मंत्रालय ने स्पष्ट किया है कि गुरुवार (20 दिसंबर) को राजपत्र में प्रकाशित आदेश में सुरक्षा या कानून प्रवर्तन एजेंसियों को कोई नया ऑर्डर जारी नहीं किया गया है। मंत्रालय ने स्पष्ट किया है कि इंटसेप्ट, मॉनिटरिंग और डिक्रिप्शन के प्रत्येक मामले को सक्षम प्राधिकारी यानी केंद्रीय गृह सचिव द्वारा अनुमोदित किया जाएगा, तभी एजेंसियां जांच कर पाएंगी। इससे पहले यह कहा जा रहा था कि मामला सामने आते ही एजेंसियां सीधे जांच करेंगी।

बेडरुम में घुसकर लिंचिंग कराना चाहती है बीजेपी: केंद्र सरकार के इस आदेश के खिलाफ विपक्ष विफर पड़ा है। शुक्रवार (21 दिसंबर) को विपक्षी नेताओं ने संसद भवन के बाहर एक मीटिंग की और सरकार के इस फैसले की आलोचना की। कांग्रेस के आनंद शर्मा ने कहा कि यह गंभीर मुद्दा है। इस आदेश के जरिए भाजपा देश को सर्विलांस स्टेट बनाना चाहती है। शर्मा ने कहा, “सरकार ने इसे चोरी-चुपके किया है। हम सामूहिक रूप से इसका विरोध करते हैं। निजता का अधिकार एक मौलिक अधिकार है। इस आदेश से मौलिक अधिकार पर सीधे हमला किया गया है

आप, सपा, राजद, टीएमसी का भी साथ: कांग्रेस को इस मुद्दे पर विपक्षी दलों आम आदमी पार्टी, समाजवादी पार्टी, राष्ट्रीय जनता दल, टीएमसी समेत कई दलों का साथ हासिल है। ये सभी दल गृह मंत्रालय के इस आदेश का विरोध कर रहे हैं। आनंद शर्मा ने भाजपा पर हमला बोलते हुए कहा, “यह साधारण शासनादेश नहीं है, यह अलोकतांत्रिक आदेश है जो निजता के अधिकार पर हमला करता है। वे लोग निगरानी के बहाने हमारे बेडरुम तक घुसना चाहते हैं और लिंचिंग कराना चाहते हैं।”

ये दस एजेंसियां करेंगी जासूसी:
1. इंटेलिजेंस ब्यूरो
2. नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो
3. प्रवर्तन निदेशालय
4. सेंट्रल बोर्ड ऑफ डायरेक्ट टैक्सेज
5. डायरेक्टोरेट ऑफ रेवेन्यू इंटेलिजेंस
6. सीबीआई
7. एनआईए (नेशनल इन्वेस्टिगेटिव एजेन्सी)
8. कैबिनेट सचिवालय (रॉ)
9. डायरेक्टोरेट ऑफ सिग्नल इंटेलिजेंस
10. दिल्ली पुलिस कमिश्नर

आनंद शर्मा ने कहा, “वे भारत को ऑरवेलियन स्टेट बनाना चाहते हैं। यह मीडिया के लिए भी एक खतरा है। मैं ढाई लोगों के सिंडिकेट को बताना चाहता हूं कि आप आप डिपार्चर लाउंज में बैठे हैं और इस तरह का फैसला कर रहे हैं जो जनविरोधी है।”

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक सवाल है कि अगले साल होने वाले लोकसभा चुनाव से ऐन पहले ऐसे आदेश, वह भी जल्दबाज़ी में जारी करने की सरकार को क्या जरूरत थी? इस आदेश के जारी होने के समय को लेकर ही सबसे बड़ा सवाल है। पूर्वोत्तर और जम्मू-कश्मीर को छोड़ दें, मोटे तौर पर पूरे देश में शांति कायम है, हां बीच-बीच में सांप्रदायिक झड़पों और किसानों के आंदोलन की खबरें सामने आती रही हैं। तो फिर आखिर ऐसा क्या हुआ कि मोदी सरकार ने लगभग हर एजेंसी को ऐसे कड़े अधिकार दे दिए?

इसकी तीन वजहें हो सकती हैं। हो सकता है कि सरकार को ऐसी खुफिया रिपोर्ट मिली हो कि देश में बड़े पैमाने पर कोई गड़बड़ी फैलाने की साजिश की जा रही है और सरकार ने इसे रोकने के लिए यह कदम उठाया है। यह भी संभव है कि सरकार अपने राजनीतिक विरोधियों के खिलाफ धरपकड़ या क्रैकडाउन की तैयारी कर रही है। या फिर सरकार को ऐसा लगने लगा है कि एजंसियों द्वारा पहले से की जा रही निगरानी और जासूसी नाकाफी है और इसे और बढ़ाने की जरूरत है।

बहरहाल निगरानी और जासूसी को औपचारिक जामा पहनाने के पीछे मंशा यह भी हो सकती है कि सरकार ने पूर्व में जो भी ऑपरेशन किए हैं उन्हें कानूनी दायरे में ले आया जाए और एजंसियों के लिए एक सुरक्षा कवच भी बन जाए। ऐसा संभवता इसलिए भी किया गया है कि सरकार बदलने पर एजेंसियों को खुद को बचाने में मदद मिले।

यहां यह भी महत्वपूर्ण है कि राज्यों और केंद्र दोनों के सचिवों को ऐसे आदेश देने का अधिकार है कि वे खास मामलों में या जिनमें जरूरत समझी जाए, उसमें निगरानी, जासूसी या डाटा आदि निकालने की इजाजत दे दें। लेकिन 20 दिसंबर को जारी गृह मंत्रालय के इस आदेश के बाद तो राज्य सरकारों के भी हौसले बढ़ेंगे और वे अपने राज्यों की पुलिस को भी ऐसे अधिकार दे सकती हैं। तो क्या पुलिस राज्य की सत्तारूढ़ दल के राजनीतिक विरोधियों के खिलाफ न अधिकारों का दुरुपयोग नहीं करेगी?

सरकार के इस आदेश को लेकर प्रतिक्रियाएं आने लगी हैं। इंटरनेट फ्रीडम फाउंडेशन ने शुक्रवार को ही इस आदेश को लेकर संशय जताया और सरकार से अपने फैसले पर फिर से विचार करने की अपील की। फाउंडेशन ने कहा कि अच्छा होता कि सरकार इस बारे में आम लोगों से चर्चा करती और पारदर्शी तरीके से निगरानी सुधार और डाटा सुरक्षा पर फैसला करती। फाउंडेशन ने कहा है कि अगर सरकार इस अपील पर ध्यान नहीं देती है तो वह अदालत का रुख करेगी।

फाउंडेशन ने कहा यह भी कहा है कि, “गृह मंत्रालय का आदेश टेलीफोन टैपिंग से कहीं आगे जाता दिखता है। इस आदेश में जो कुछ कहा गया है वह कहीं ज्यादा निजता का उल्लंघन है।”