भारत का सबसे लंबा रेलरोड ब्रिज: देवेगौड़ा ने शिलान्‍यास किया, वाजपेयी ने काम शुरू कराया, अब मोदी करेंगे उद्घाटन, 16 वर्षो में हुआ तैयार

इस पुल की खासियत यह है कि इसके निर्माण में 80 हजार टन स्टील प्लेट का इस्तेमाल क्या गया है। 10 हजार टन के हाईड्रॉलिक स्टैंड जैक लगाए गए हैं। इजीनियरों ने इसकी उम्र सीमा 120 साल जताई है।

जनसत्ता ऑनलाइन के अनुसार असम और अरुणाचल को जोड़ने वाला एशिया का दूसरा और भारत का सबसे लंबा रेलरोड ब्रिज है बोगीबील पुल.

पीएम नरेंद्र मोदी मंगलवार (25 दिसंबर, 2018) को देश के सबसे लंबे रेलरोड ब्रिज बोगीबील का उद्घाटन करेंगे। ब्रह्मपुत्र नदी पर बना यह पुल असम और अरुणाचल को जोड़ने का काम करेगा। इस रेलरोड ब्रिज की खासियत यह है कि इसके साथ-साथ थ्री-लेन सड़क भी है, जिस पर वाहनों का आवा-जाही चलती रहेगी। 16 साल बाद बनकर तैयार हो रहे इस पुल के उद्घाटन के अलावा पीएम मोदी तिनसुकिया-नाहरलगुन इंटरसिटी एक्सप्रेस को भी हरी झंडी दिखाकर रवाना करेंगे। यह ट्रेन बोगीबील पुल से सप्ताह में तीन दिन गुजरेगी। 14 कोच वाली यह चेयर कार ट्रेन तिनसुकिया से दोपहर में रवाना होगी और नाहरलगुन से सुबह लौटेगी।

5,920 करोड़ की अनुमानित लागत से बना 4.9 किलोमीटर लंबा यह पुलिस भारत की सामरिक दृष्टि से भी काफी अहमियत रखता है। क्योंकि, इसके जरिए अब चीन की सीमा तक जल्दी से पहुंचा जा सकता है। इस पुल की खासियत यह है कि इसके निर्माण में 80 हजार टन स्टील प्लेट का इस्तेमाल क्या गया है। 10 हजार टन के हाईड्रॉलिक स्टैंड जैक लगाए गए हैं। इजीनियरों ने इसकी उम्र सीमा 120 साल जताई है। सबसे अहम बात यह है कि इसके बनने से ब्रह्मपुत्र के दक्षिणी भाग से ईटानगर की सड़क दूरी तकरीबन 150 किलोमीटर कम हो जाएगी। वहीं, डिब्रूगढ़ और अरुणाचल के बीच 100 किलोमीटर की कमी आएगी। अरुणाचल के सीमावर्ती धेमाजी जिले से सिलापाथर को यह जोड़ने का काम करेगी।

इस ब्रिज का शिलान्यास 1997 में पूर्व प्रधानमंत्री एचडी देवगौड़ा ने किया था। बाद में 2002 में तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने बोगीबील पुल का निर्माण कार्य शुरू कराया। अब प्रधानमंत्री मोदी 25 तारीख को अटल बिहारी वाजपेयी के जन्मदिन के मौके पर इसका उद्घाटन करेंगे। इस पुल के निर्माण में इंजीनियरों के सामने काफी चुनौतियां रहीं। भारी बारिश और सिस्समिक जोन में होने के चलते इसके निर्माण में खास सावधानियां बरती गईं। निर्माण के लिए खास तौर पर स्वीडेन और डेनमार्क की तकनीक का इस्तेमाल किया गया। ब्रह्मपुत्र नदी के स्तर से 32 मीटर ऊंचा बना यह पुल अब एशिया का दूसरा सबसे लंबा पुल है।