बिहार: खतरे में मोदी सरकार के तीन मंत्रियों की सीट, एनडीए में जारी है रार, महागठबंधन में भी पेंच

जनसत्ता की खबर के मुताबिक बिहार में भले ही एनडीए के बीच सीटों का बंटवारा हो गया हो लेकिन अभी तक किस पार्टी के खाते में कौन सी संसदीय सीट जाएगी, इसका औपचारिक बंटवारा और एलान नहीं हुआ है लेकिन अंदरूनी खबर है कि एनडीए के तीनों घटक दल लगभग सीटों का बंटवारा कर चुके हैं। हालांकि, ऐसी कई सीटें हैं जिस पर गठबंधन सहयोगियों के बीच रार ठनी हुई है। इनमें केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार में तीन मौजूदा मंत्रियों की सीटों पर भी पेंच फंसा हुआ है। केंद्रीय राज्य मंत्री गिरिराज सिंह फिलहाल नवादा से सांसद हैं लेकिन समझौते के मुताबिक इस सीट पर अब रामविलास पासवान की पार्टी लोजपा दावा ठोक रही है। सूत्र बता रहे हैं कि मुंगेर की लोजपा सांसद वीणा देवी (सूरजभान सिंह की पत्नी) 2019 में नवादा से चुनाव लड़ेंगी क्योंकि मुंगेर सीट पर जेडीयू ने दावा ठोका है। ऐसे में भाजपा के गिरिराज सिंह या तो बेगूसराय या फिर मुजफ्फरपुर से ताल ठोक सकते हैं।

बेगूसराय के सांसद भोला सिंह का निधन हो चुका है। वैसे बेगूसराय सीट पर भी जेडीयू दावा ठोक रहा है क्योंकि 2004 और 2009 में यहां से जेडीयू के उम्मीदवार सांसद बने हैं। इस सूरत में सिंह मुजफ्फरपुर भी जा सकते हैं मगर जेडीयू वहां भी उनके लिए मुश्किलें खड़ी कर सकता है क्योंकि 1999, 2004 और 2009 में यहां से भी जेडीयू की जीत हुई थी। अगर नीतीश कुमार ने इन दोनों सीटों पर दावा ठोका तो गिरिराज सिंह के लिए फिर बड़ी मुश्किल हो सकती है। गिरिराज सिंह अक्सर अपने बयानों से चर्चा में बने रहे हैं और हिन्दुत्व का झंडा बुलंद किए रहे हैं।

अश्विनी चौबे: मोदी सरकार के दूसरे राज्यमंत्री अश्विनी चौबे हैं जो फिलहाल बक्सर से सांसद हैं। कहा जा रहा है कि बक्सर से भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष मंगल पांडेय ताल ठोक सकते हैं क्योंकि यह भाजपा के लिए सुरक्षित गढ़ रहा है। 2009 को छोड़ दें तो 1996 से लगातार भाजपा यहां से जीतती रही है। हिन्दुत्व राग अलापने वाले अश्विनी चौबे को ऐसे में भागलपुर जाना पड़ सकता है लेकिन वहां पूर्व सांसद शाहनवाज हुसैन उनके लिए कांटे बिछा सकते हैं। शाहनवाज 2014 में मोदी लहर के बावजूद हार गए थे। इससे पहले वो 2006 (उप चुनाव) और 2009 में यहां से सांसद रह चुके हैं।

आर के सिंह: मोदी सरकार के तीसरे राज्य मंत्री राजकुमार सिंह फिलहाल आरा से सांसद हैं। वो पहली बार चुनाव जीतकर संसद पहुंचे हैं और मंत्री बने हैं। इससे पहले वो आईएएस अधिकरी थे। आरा सीट पर भी जेडीयू ने दावेदारी जताई है। यहां से 2009 में जेडीयू के मीना सिंह सांसद चुनी गई थीं। हालांकि, अगर यह सीट जेडीयू खाते में जाती है तो पार्टी यहां से नया उम्मीदवार खड़ा कर सकती है। एनडीए में हाजीपुर सीट को लेकर भी रार है। लोजपा अध्यक्ष रामविलास पासवान ने चुनाव नहीं लड़ने का एलान किया है। ऐसे में उनके छोटे भाई पशुपति कुमार पारस यहां से उतरने की तैयारी में हैं लेकिन जेडीयू भी रह-रहकर वहां दावा जताता रहा है।

उधर, महागठबंधन में भी सीट बंटवारे पर पेंच फंसा हुआ है। गठबंधन में सबसे ज्यादा पेंच सीतामढ़ी संसदीय सीट को लेकर है। यहां से फिलहाल उपेंद्र कुशवाहा की पार्टी रालोसपा के राम कुमार शर्मा सांसद हैं। लिहाजा, कुशवाहा इस सीट पर दावा ठोक रहे हैं। संभवत: खुद कुशवाहा भी इस सीट से चुनाव लड़ने की चाहत रखते हैं क्योंकि यहां यादव और मुस्लिम वोटरों की अच्छी आबादी है जिसका पारंपरिक झुकाव महागठबंधन की तरफ है। महागठबंधन के सबसे बड़े दल राजद का इस सीट पर लंबे समय से कब्जा रहा है। इसलिए राजद भी इस सुरक्षित ठिकाने को गंवाना नहीं चाह रहा है। शरद यादव भी अपने चहेते अर्जुन राय के लिए सीतामढ़ी सीट चाहते हैं। अर्जुन राय 2009 में यहां से सांसद रहे हैं। यानी सीतामढ़ी के लिए महागठबंधन में तीन-तीन दल दावेदार हैं जबकि एनडीए की तरफ से सीतामढ़ी सीट जेडीयू खाते में गई है क्योंकि यहां से जेडीयू नेता नवल किशोर राय तीन बार सांसद रहे हैं। माना जा रहा है कि नीतीश कुमार महागठबंधन को पटखनी देने के इरादे से इस बार पूर्व सांसद नवल किशोर राय की पत्नी रामदुलारी देवी को यहां से उम्मीदवार बना सकते हैं।