क्या आपके अख़बार ने ये बताया: संस्कृत प्रेमी सरकार, मन की बात में संस्कृत और संस्कृत पढ़ाने वाले आत्मदाह को मजबूर

संजय कुमार सिंह

आज सुबह हिन्दुस्तान टाइम्स और दैनिक भास्कर पलटने के बाद इंटरनेट पर टेलीग्राफ को देखना शुरू किया तो पहले पन्ने पर एक खबर दिखी, संस्कृत रीयलिटी चेक फॉर मुंशी मोदी। संस्कृत और रीयलिटी चेक – कान खड़े हो गए। याद आया कि वीरवार को एनडीटीवी प्राइम टाइम पर खबर थी कि देश भर के संस्कृत शिक्षक दिल्ली में आंदोलन और हवन कर रहे हैं। अखबारों में तो कोई खबर नहीं ही दिखी, सोशल मीडिया भी संस्कृत शिक्षकों से दूर है। कोई चर्चा नहीं है। याद आया कि 15,000 संस्कृत छात्रों के लिए एक भी कंप्यूटर शिक्षक नहीं है। 450 शिक्षकों में 250 ठेके पर हैं। इसलिए आज की चर्चा संस्कृत शिक्षकों और उनके आंदोलन के संबंध में।

याद कीजिए आपके अखबार ने इस आंदोलन की कोई खबर दी क्या। अगर नहीं दी तो सोचिए कि क्यों नहीं दी होगी। क्या यह खबर नहीं है। क्या यह आपके जानने लायक नहीं है। क्या ऐक्सीडेंटल प्राइम मिनिस्टर नाम से एक फिल्म आने वाली है यह जानना ज्यादा महत्वपूर्ण है? आप यह सब ठीक के समझ सकें इसलिए पहले खबर बताता हूं। पूरी खबर इधर-उधर से ली हुई है। जहां सभंव है स्रोत का उल्लेख भी किया है। पर मुख्य मकसद आपको यह बताना है कि आपके अखबार कितनी खबरें छोड़ देते हैं।

मुख्य खबर तो यही है कि 1970 में स्थापित राष्ट्रीय संस्कृत संस्थान के देश भर के कैम्पस से आए शिक्षक दिल्ली में आंदोलन कर रहे हैं। दिल्ली की इस सर्दी में खुले में रहने को मजबूर हैं। हवन कर रहे हैं और उनकी सुनने वाला कोई नहीं है। एनडीटीवी ने गुरूवार को प्राइम टाइम में इसपर कार्यक्रम दिखाया था और इससे पता चला कि देश भर में संस्थान के कैम्पस अतिथि शिक्षकों के भरोसे हैं। भिन्न शहरों में इसके 12 कैम्पस हैं। इनमें शिक्षकों के कई पद खाली हैं और कुल 450 शिक्षकों में 250 ठेके पर हैं। दिल्ली में चल रहे आंदोलन का मकसद सरकार तक अपनी बात पहुंचाना है। उनकी ऐसी हालत तब है जब एनडीटीवी ने अपने यूनिवर्सिटी सीरिज के तहत 16 अक्तूबर 2017 को इसका हाल बताया था।

एनडीटीवी का स्क्रीन शॉट

दूसरी ओर, शिक्षकों का दावा है कि संस्कृत के शिक्षक पहली बार प्रदर्शन कर रहे हैं। उनका कहना है कि वे 15 साल से ठेके पर पढ़ा रहे हैं। सरकार राष्ट्रीय संस्कृत संस्थान की अनदेखी कर रही है। यह मानव संसाधन विकास विभाग के तहत है। ऐसा नहीं है कि संस्कृत को अपने हाल पर छोड़ दिया गया है। दो संस्कृत आयोग बने हैं और उनका कार्यकाल पूरा हो चुका है। 2002 में राष्ट्रीय संस्कृत संस्थान को डीम्ड यूनिवर्सिटी का दर्जा दिया गया था। 2012 में मनमोहन सिंह ने इसे अंतरराष्ट्रीय विश्वविद्यालय के स्तर का बनाने की बात की थी। फरवरी 2016 में एक विजन डक्यूमेंट भी बना था। पर सब ठंडे बस्ते में चला गया।

आप जानते हैं कि आजकल बिना कंप्यूटर के पढ़ाई का क्या मतलब है और संस्कृत के साथ यह समस्या भी बताई जाती है कि संस्कृत वालों को कंप्यूटर नहीं आता और कंप्यूटर वाले संस्कृत में काम नहीं करते। इसके बावजूद छात्रों को कंप्यूटर के सामान्य काम-काज सीखाने के लिए एक भी शिक्षक न होना राष्ट्रीय संस्कृत संस्थान और संस्कृत के प्रति सरकारी रवैए का बयान करने के लिए पर्याप्त हैं। मैं नहीं कहता कि संस्कृत बहुत जरूरी है और उसपर ध्यान दिया जाना चाहिए। यह बात प्रधानमंत्री ने कही है। मन की बात कार्यक्रम में जो मैं नहीं सुनता, फिर भी जानता हूं। क्योंकि कई अखबार पढ़ता हूं।

प्रदर्शनकारियों में एक का कहना था कि सरकार भारतीय संस्कृति की बात करती है लेकिन संस्कृत का ख्याल नहीं रखती है। एनडीटीवी के कार्यक्रम से याद आया कि 2014 में जब केंद्र में भाजपा की सरकार बनी थी तो प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने भले हिन्दी में शपथ ली थी पर सुषमा स्वराज, उमाभारती, डॉ. हर्षवर्धन ने संस्कृत में शपथ ली थी। यही नहीं, सांसद महेश गिरि, परवेज साहिब सिंह वर्मा, शांता कुमार, योगी आदित्य नाथ, महेश शर्मा और राजेन्द्र अग्रवाल ने लोकसभा में संस्कृत में शपथ ली थी। 2017 में स्मृति ईरानी राज्य सभा की सदस्य बनीं तो शपथ ग्रहण संस्कृत में ही किया। कहने की जरूरत नहीं है कि इससे संदेश यही गया कि संस्कृत के लिए कुछ होगा। लेकिन कुछ हुआ नहीं और अखबारों को इस खबर में टीआरपी नहीं मिल रही है।

एनडीटीवी प्राइम टाइम ने अपने यूनिवर्सिटी सीरिज में संस्कृत शिक्षा का हाल बताया था। उसमें इन शिक्षकों की समस्या भी बताई गई थी। तब आश्वासन मिला था पर कुछ हुआ नहीं। नवोदय टाइम्स की एक खबर के अनुसार 25 मार्च 2018 को 42 वें मन की बात कार्यक्रम में प्रधानमंत्री ने कोमल ठक्कर नाम के व्यक्ति की तरफ से आए संस्कृत के ऑन लाइन कोर्स शुरू करने पर अपनी राय रखी। पीएम मोदी ने कहा, “कोमल जी संस्कृत के प्रति आपका प्रेम देखकर बहुत अच्छा लगा। मैंने सम्बंधित विभाग से इस ओर हो रहे प्रयासों की जानकारी आप तक पहुंचाने के लिए कहा है। ‘मन की बात’ के श्रोता जो संस्कृत को लेकर कार्यरत रहते हैं, वो भी विचार करें कि कोमल जी के सुझाव को कैसे आगे बढ़ाया जाए।”

द टेलीग्राफ की आज क खबर। अंग्रेजी अखबार में संस्कृत की चिन्ता।

आज टेलीग्राफ में प्रकाशित बसंत कुमार मोहंती की एक खबर के अनुसार प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने संस्कृत के अपने ज्ञान के बारे में देश को किसी शक में नहीं रखा है। 26 अगस्त को अपने इस कार्यक्रम में उन्होंने कहा था, “आप सबको यह जानकर आश्चर्य होगा कि संस्कृत एक ऐसी भाषा है जिसमें अनंत शब्दों की निर्मिति संभव है। 2000 धातु , 200 प्रत्यय, 22 उपसर्ग और समास से अनगिनत शब्दों की रचना संभव है।” अखबार ने नहीं लिखा है पर इस कार्यक्रम में प्रधानमंत्री ने आगे कहा था, “वेदकाल से वर्तमान तक संस्कृत भाषा ने भी ज्ञान के प्रचार प्रसार में बड़ी भूमिका निभाई है। कहते हैं, ग्लोबल वार्मिंग की चुनौतियों से निपटने के मंत्र का हमारे वेदों में विस्तार से उल्लेख है। आपको यह जानकर हर्ष होगा कि कर्नाटक राज्य के मंटूर गांव के निवासी आज भी संस्कृत भाषा का ही प्रयोग करते हैं।”

पिछले हफ्ते उत्तर प्रदेश से भास्कर में एक छोटी सी खबर थी

संघ के प्रदेश अध्यक्ष देवेंद्र नाथ पांडेय ने बताया कि प्रदेश में करीब 250 संस्कृत स्कूल ऐसे हैं जो अनुदान सूची पर लेने से वंचित रह गए हैं। उन्हें अनुदान पर लिए जाने की मांग काफी समय से की जा रही है। लेकिन प्रक्रिया अधर में लटकी है। उन्होंने चेतावनी देते हुए कहा कि 31 दिसंबर तक मांग पूरी नहीं हुई तो एक जनवरी को तीन संस्कृत शिक्षक राजधानी में आत्मदाह करेंगे।

इसके बावजूद संस्कृत शिक्षक आंदोलन पर हैं। टेलीग्राफ ने राष्ट्रीय संस्कृत संस्थान के वाइस चांसलर पीएन शास्त्री के हवाले से लिखा है, नए पदों का सृजन सरकार करती है। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के नियमों के अनुसार इसके बाद इन पदों (रिक्तियों) के लिए विज्ञापन निकाला जाएगा और चुनाव की एक प्रक्रिया के जरिए इन्हें भरा जाएगा। मुझे उनका ज्ञापन मिल गया है और इसकी जांच के लिए मैंने एक समिति बना दी है। हम अपने बोर्ड में इसपर चर्चा करेंगे और सरकार को नए पद सृजित करने के लिए लिखेंगे। ऐसा नहीं है कि इस तरह की खबर लिखने के लिए बहुत खर्च या श्रम की आवश्यकता है। अमूमन धरनास्थल पर एक या दो आदमी इतनी जानकारी दे-देगा और संबंधित दस्तावेज की प्रतियां भी मुहैया करा देगा। मूल बात है अखबार को छापना क्या है। और सरकारी विज्ञापनों के लालच में वे कोई जोखिम उठाने को तैयार नहीं हैं। मैं दावे के साथ कह सकता हूं कि थानों के पास विज्ञापन का बजट होता तो हर थानेदार 56 ईंची सीने वाले घोषित कर दिया गया होता।

साभार:वरिष्ठ पत्रकार और अनुवादक संजय कुमार सिंह की रिपोर्ट। वाया भड़ास4मीडिया