सपा-बसपा गठबंधन: यूपी में मोदी के 11 मंत्रियों में से 7 पर हार का खतरा! माया-अखिलेश ने उड़ाई भाजपा की नींद!

2014 में सपा, बसपा, कांग्रेस अलग-अलग लड़ी थीं जबकि भाजपा गठबंधन के तहत चुनाव लड़ी थी।

प्रमोद प्रवीण

सपा-बसपा गठबंधन: 2019 के लोकसभा चुनावों के मद्देनजर सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश में दो धुर विरोधी पार्टियों (सपा और बसपा) ने भाजपा के खिलाफ गठबंधन कर अपनी मंशा जाहिर कर दी है। दोनों दलों ने आगामी चुनावों में सीट बंटवारे का भी एलान कर दिया है। इससे भाजपा खेमे में बेचैनी है। राज्य के सीएम योगी आदित्यनाथ ने सपा-बसपा के गठजोड़ को अवसरवादी, भ्रष्ट और जातिवादी करार दिया है। उधर, सपा-बसपा खेमे में खुशी है। खुशी इस बात की है कि राज्य की 80 संसदीय सीटों पर होने वाले लोकसभा चुनाव में न केवल गठबंधन अधिक सीटों पर जीतेगा बल्कि भाजपा के कई कद्दावर नेताओं को भी पटखनी देगा। बता दें कि अगर 2014 के लोकसभा चुनाव जैसा ही वोटिंग पैटर्न रहा तो मोदी सरकार के सात मंत्री लोकसभा चुनाव हार सकते हैं। हालांकि, 2014 जैसी मोदी लहर अब नहीं है। 2014 में सपा, बसपा, कांग्रेस अलग-अलग लड़ी थीं जबकि भाजपा गठबंधन के तहत चुनाव लड़ी थी।

केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार में उत्तर प्रदेश से कुल 12 मंत्री और एक खुद प्रधानमंत्री हैं। इनमें से 12 लोग लोकसभा के सदस्य हैं जबकि वित्त राज्य मंत्री शिव प्रताप शुक्ल राज्य सभा के सदस्य हैं। यानी मोदी सरकार के कुल 11 मंत्री यूपी से लोकसभा सांसद हैं। पीएम मोदी, गृह मंत्री राजनाथ सिंह, महिला एवं बाल विकास मंत्री मेनका गांधी, संतोष गंगवार और वीके सिंह को छोड़ दें तो 2019 के चुनाव में बाकी सभी मंत्रियों की हार हो सकती है। इसकी वजह सपा और बसपा के मतादाताओं की लामबंदी, बहुजन गोलबंदी और भाजपा सरकार के खिलाफ एंटी इनकमबेंसी फैक्टर हो सकता है।

सत्यपाल सिंह बागपत से भाजपा के सांसद हैं और केंद्र सरकार में मानव संसाधन विकास राज्यमंत्री हैं। 2014 में वो पहली बार लोकसभा चुनाव लड़े और संसद पहुंचे। उन्हें तब कुल 4 लाख 23 हजार 475 वोट मिले थे, जबकि उनके खिलाफ सपा के गुलाम मोहम्मद को 2 लाख 13 हजार 609 वोट मिले थे। वहां तीसरे नंबर पर रालोद के अजीत सिंह रहे थे जिन्हें 1 लाख 99 हजार 516 वोट मिले थे। इनके अलावा बसपा उम्मीदवार को कुल एक लाख 41 हजार 743 वोट मिले थे। अगर 2014 का ही चुनावी पैटर्न रहा और इन तीनों दलों ने मिलकर चुनाव लड़ा तो उन्हें कुल पांच लाख 54 हजार 868 वोट मिल सकते हैं। यह कुल वोट का 55.23 फीसदी है। यानी महागठबंधन की सूरत में सत्यपाल सिंह को हार का सामना करना पड़ सकता है।

मनोज सिन्हा गाजीपुर से सांसद हैं और मोदी सरकार में रेल, संचार राज्यमंत्री (स्वतंत्र प्रभार) हैं। 2014 में उन्हें कुल तीन लाख 06 हजार 929 वोट मिले थे जबकि दूसरे नंबर पर रहे सपा उम्मीदवार को 2 लाख 74 हजार 477 वोट और तीसरे नंबर पर बसपा प्रत्याशी को कुल 2 लाख 41 हजार 645 वोट मिले थे। यानी सपा-बसपा गठजोड़ को कुल पांच लाख 41 हजार 645 वोट मिल सकते हैं। यानी मनोज सिन्हा की भी हार हो सकती है।

उमा भारती झांसी की सांसद हैं और केंद्रीय पेयजल एवं स्वच्छता मंत्री हैं। उन्हें पिछले चुनाव में कुल पांच लाख 75 हजार 889 वोट मिले थे जबकि उनके खिलाफ सपा को तीन लाख 85 हजार 422 और बसपा को दो लाख 13 हजार 792 वोट मिले थे। दोनों का वोट जोड़ दें तो यह पांच लाख 99 हजार 214 हो जाता है। यानी उमा भारती पर भी हार का खतरा मंडरा सकता है। हालांकि, इनकी तरफ से ऐसी खबरें पहले ही आ चुकी हैं कि वो इस बार चुनाव नहीं लड़ेंगी।

कृष्णा राज शाहजहांपुर सुरक्षित सीट से भाजपा की सांसद हैं और केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण राज्य मंत्री हैं। उन्हें 2014 में कुल पांच लाख 25 हजार 132 वोट मिले थे जबकि उनके खिलाफ बसपा को दो लाख 89 हजार 603 और सपा को दो लाख 42 हजार 913 वोट मिले थे। इन दोनों का जोड़ पांच लाख 32 हजार 516 होता है जो राज को मिले कुल मतों से ज्यादा है।

साध्वी निरंजन ज्योति फतेहपुर से भाजपा की सांसद हैं और केंद्र सरकार में खाद्य प्रसंस्करण राज्यमंत्री हैं। 2014 के चुनावों में उन्हें कुल चार लाख 85 हजार 994 वोट मिले थे जबकि उनके मुख्य प्रतिद्वंदी बसपा को दो लाख 98 हजार 788 और सपा को एक लाख 79 हजार 724 वोट मिले थे। सपा और बसपा के वोट को जोड़ दें तो यह आकंड़ा चार लाख 78 हजार 512 हो जाता है जो निरंजन ज्योति को मिले वोट से मात्र 7,482 कम होता है। यानी गैर मोदी लहर और सत्ता के खिलाफ असंतोष की हवा बनी तो निरंजन ज्योति भी हार सकती हैं। उन पर भी खतरा मंडरा रहा है।

महेश शर्मा गौतम बुद्ध नगर से भाजपा के सांसद हैं और केंद्रीय संस्कृति राज्यमंत्री (स्वतंत्र प्रभार) हैं। 2014 के चुनावों में उन्हें पांच लाख 99 हजार 702 वोट मिले थे। उनके खिलाफ सपा को तीन लाख 19 हजार 490 वोट और बसपा को एक लाख 98 हजार 237 वोट मिले थे। वैसे तो इन दोनों के जोड़ के बाद भी महेश शर्मा करीब 82 हजार वोट से आगे रहते हैं लेकिन मोदी लहर नहीं होने, बहुजन एकता और एंटी इनकमबेंसी फैक्टर की वजह से उन पर भी संकट मंडरा सकता है।

अनुप्रिया पटेल मिर्जापुर से अपना दल (सोनेलाल) की सांसद हैं और मोदी सरकार में स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण राज्य मंत्री हैं। 2014 के चुनाव में इनकी पार्टी ने भाजपा से गठबंधन किया था। उन्हें तब कुल चार लाख 36 हजार 536 वोट मिले थे जबकि उनके खिलाफ बसपा को 2 लाख 17 हजार 457 और सपा को एक लाख आठ हजार 859 वोट मिले थे। इन दोनों का जोड़ वैसे तो पटेल को नुकसान नहीं पहुंचाता दिख रहा है मगर उनकी पार्टी ने भाजपा से गठबंधन तोड़ा तो उनकी हार हो सकती है क्योंकि अपना दल का जनाधार नहीं है। बता दें कि अपना दल और भाजपा में इन दिनों तनातनी चल रही है। हालांकि इसकी संभावना कम है कि अपना दल भाजपा से गठबंधन तोड़े।

साभार: जनसत्ता ऑनलाइन की रिपोर्ट