उत्तर प्रदेश में ताबड़तोड़ एनकाउंटर: CJI ने कहा कि मसला ‘ गंभीर’ है, 14 फरवरी को करेंगे सुनवाई

उत्तर प्रदेश में लगातार हो रही पुलिस मुठभेड़ पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि ये मुद्दा गंभीर है और इस पर गंभीरता से विचार किया जाना चाहिए। चीफ जस्टिस रंजन गोगोई, जस्टिस अशोक भूषण और जस्टिस एस. के. कौल की पीठ इस मामले में अब अगली सुनवाई 12 फरवरी को करेगी।

सोमवार को सुनवाई के दौरान मामले में हस्तेक्षप याचिका दाखिल करने वाले सिटीजन्स अगेंस्ट हेट (CAH) की ओर से पेश हुए वकील प्रशांत भूषण ने कहा कि इस मामले में UN ने भी प्रेस रिलीज जारी कर बताया है कि UN ने भारत सरकार को इस संबंध में रिपोर्ट भेजी है और उन्हें सरकार के जवाब का इंतजार है। NHRC भी इससे संबंधित 17 मामलों की जांच कर रहा है। उनकी दलील थी कि NHRC को यह निर्देश दिया जाए कि वो कोर्ट में स्टेटस रिपोर्ट दाखिल करें।

इस दौरान सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि ये गंभीर मामला है और इस पर 12 फरवरी को सुनवाई होगी।

वहीं राज्य सरकार की ओर से पेश हुए वरिष्ठ वकील मुकुल रोहतगी ने इस याचिका का विरोध करते हुए

कहा कि सारे मामलों की मजिस्ट्रेट द्वारा जांच हो चुकी है। इन मामलों में सुप्रीम कोर्ट व NHRC की गाइडलाइन का पालन किया गया है। उन्होंने आगे कहा कि जो लोग मुठभेड़ में मारे गए हैं, उनके खिलाफ कई आपराधिक मामले थे।

इससे पहले 2 जुलाई 2018 को पीपल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज ( PUCL) की याचिका पर मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा की अध्यक्षता वाली पीठ ने राज्य सरकार से दो हफ्ते में जवाब मांगा था।

वहीं राज्य सरकार ने एनकाउंटरों के खिलाफ डाली गई इस याचिका को राजनीति से प्रेरित और दुर्भावनापूर्ण बताया है। सरकार ने इस संबंध में सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा भी दाखिल किया था। हलफनामे में कहा गया है कि अपराधियों को पीड़ित बनाकर पेश किया जा रहा है। अल्पसंख्यकों का एनकाउंटर करने का आरोप गलत है। दरअसल मुठभेड में मारे गए 48 लोगों में से 30 बहुसंख्यक हैं।

सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता संगठन की ओर से पेश हुए वरिष्ठ वकील संजय पारिख ने कहा कि अभी तक की जानकारी के मुताबिक एक साल में करीब 1500 पुलिस मुठभेड़ हो चुकी हैं जिनमें 58 लोगों की मौत हुई है। इन सभी मुठभेड़ की कोर्ट की निगरानी या सुप्रीम कोर्ट के रिटायर जज की निगरानी में सीबीआई या SIT से जांच होनी चाहिए। साथ ही पीड़ितों के परिवारवालों को मुआवजा दिया जाना चाहिए। पारिख ने पीठ को बताया कि राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने भी इस मामले की जांच शुरू की है।

पीठ ने इस मामले में याचिकाकर्ता को याचिका की एक प्रति, यूपी सरकार की वकील ऐश्वर्या भाटी को देने के लिए कहा था।

याचिका में NGO ने यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के पुराने बयानों को भी शामिल किया है, जिनमें उन्होंने अपराधियों को गोली मारने की बात की है। याचिका में कहा गया है कि राज्य सरकार द्वारा NHRC को दिए गए आंकड़े के मुताबिक, 1 जनवरी 2017 से 31 मार्च 2018 तक मुठभेड़ में 45 लोगों की मौत हुई है जबकि सार्वजनिक तौर पर उपलब्ध आंकड़े कहते हैं कि पिछले एक साल में 1100 मुठभेड़ में 49 लोगों की मौत हुई और 370 लोग घायल हुए।

याचिका में PUCL बनाम महाराष्ट्र राज्य मामले में सुप्रीम कोर्ट के वर्ष 2014 के फैसले का हवाला दिया गया है जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने मुठभेड़ की जांच के लिए दिशा निर्देश जारी किये थे।

याचिका में मांग की गई है कि इन सभी मामलों की सीबीआई या SIT से जांच कराई जाए। जांच की निगरानी या तो सुप्रीम कोर्ट खुद करे या फिर सुप्रीम कोर्ट के रिटायर जज इसकी अगुवाई करें। इसके अलावा पीड़ितों के परिजनों को मुआवजा भी दिलाया जाए।

साभार: LIVELAW