लोकपाल पर दाखिल अवमानना याचिका: सुप्रीम कोर्ट ने सर्च कमेटी से कहा, 6 हफ्ते में नाम चयन समिति को भेजे, मोदी सरकार के चार साल में ठप्प रही प्रक्रिया

लोकपाल की नियुक्ति को लेकर दाखिल अवमानना याचिका पर सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने सर्च कमेटी से यह आग्रह किया है कि वो लोकपाल व इसके सदस्यों के नामों को शार्टलिस्ट कर 6 हफ्ते के भीतर चयन समिति को भेजे।

मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई की पीठ ने गुरुवार को कहा कि ये सूची फरवरी के अंत तक भेजी जानी चाहिए। पीठ ने केंद्र सरकार को यह निर्देश भी दिया है कि वो सर्च कमेटी को ढांचागत संसाधन उपलब्ध कराए।

हालांकि इस दौरान याचिकाकर्ता की ओर से पेश प्रशांत भूषण ने कहा कि सर्च कमेटी के सदस्यों के नाम तक वेबसाइट पर नहीं दिए गए हैं। उन्होंने पीठ से यह आग्रह किया कि इस संबंध में उचित निर्देश दिए जाएं। लेकिन पीठ ने इससे इनकार करते हुए मामले की सुनवाई 7 मार्च के लिए सूचीबद्ध कर दी।

4 जनवरी को सुप्रीम कोर्ट ने केन्द्र सरकार को यह निर्देश दिया था कि वह सितंबर 2018 से अभी तक सर्च कमेटी द्वारा उठाये गए कदम एवं लोकपाल की नियुक्ति को लेकर की गई कार्यवाही से संबंधित एक हलफनामा दाखिल करे। मामले की सुनवाई के दौरान अटॉर्नी जनरल के. के. वेणुगोपाल ने कहा कि सितंबर, 2018 से अभी तक कई कदम उठाए गए हैं, तब पीठ ने उनसे पूछा कि इतना वक्त क्यों लिया जा रहा है।

हालांकि AG ने कहा कि वो इस संबंध में एक नोट दाखिल कर सकते हैं, लेकिन पीठ ने कहा कि वो हलफनामे के जरिए ही इसे रिकार्ड पर लाएं।

गौरतलब है कि पिछले साल जुलाई में लोकपाल की नियुक्ति के मामले में दाखिल याचिका पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार के हलफनामे को असंतोषजनक करार देते हुए 4 हफ्ते में फिर से नया हलफनामा दाखिल करने के निर्देश दिए थे।

न्यायमूर्ति रंजन गोगोई, न्यायमूर्ति आर. बानुमति और न्यायमूर्ति नवीन सिन्हा की बेंच को केंद्र की ओर से यह भी बताया गया था कि 19 जुलाई 2018 को प्रधानमंत्री की हाई पॉवर सेलेक्शन कमेटी की मीटिंग हुई जिसमें मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा, लोकसभा स्पीकर सुमित्रा महाजन और भारत के पूर्व अटॉर्नी जनरल और वरिष्ठ वकील मुकुल रोहतगी ने हिस्सा लिया, जबकि विशेष रूप से आमंत्रित मल्लिकार्जुन खड़गे ने भाग लेने से इनकार कर दिया। वहीं केंद्र की ओर से पक्ष रख रहे अटार्नी जनरल के. के. वेणुगोपाल ने कहा था कि सर्च पैनल के लिए जल्द ही फिर से मीटिंग की जाएगी।

वहीं याचिकाकर्ता की ओर से पेश वकील प्रशांत भूषण ने कहा था कि कानून बने साढ़े चार साल बीत चुके हैं। इसे लेकर केंद्र सरकार गंभीर नहीं है। अब या तो अदालत अवमानना की कार्रवाई करे, या फिर संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत दिए गए अधिकार का प्रयोग कर लोकपाल की नियुक्ति करे। हालांकि बेंच ने कहा था कि वो समय अभी नहीं आया है।