नज़रिया: नई “डी कंपनी” का खुलासा – 2016 की भविष्यवाणी सच हुई

संजय कुमार सिंह

पुस्तक मेले से मैं जो किताबें लाया था उनमें एक किताब पढ़ने की मुझे जल्दी थी। नाम से तो गंभीर है ही, सरसरी निगाह से भी गंभीर लगी। एक मित्र ने कहा कि ताज्जुब की बात है कि इस पर अभी तक प्रतिबंध नहीं लगा। मुझे राणा अयूब की किताब की याद आई और यह भी कि उसकी चर्चा गलती से भी कौन लोग नहीं करते हैं। यह भी कि प्रतिबंध की मांग का क्या होता है। इसके बाद मैंने किताब को ध्यान से पढ़ना शुरू किया। अंग्रेजी किताब ध्यान से पढ़ने का मतलब होता है अनुवाद करके समझना भी। इसमें समय बहुत लगता है और मैं अभी तक 96 पन्ने ही पढ़ पाया हूं। सोचा था पढ़कर लिखूंगा पर एक अंश हाल की खबर से संबंधित है उसकी चर्चा जरूरी है।

पुस्तक का कवर

किताब का नाम है, “अ फीस्ट ऑफ वल्चर्स – दि हिडेन बिजनेस ऑफ डेमोक्रेसी इन इंडिया” यानी लोभियों की ऐश – भारत में लोकतंत्र का छिपा कारोबार। जोजी जोसफ की यह किताब किसी भी पत्रकार को पढ़नी चाहिए। और जो रोते हैं कि उनकी खबरें नहीं छपती वो जान सकेंगे कि नहीं छपने वाली खबरों का क्या किया जाता है। बाकी मजबूरी में नौकरी या धंधा तो सब कर ही रहे हैं। जोजी जोसफ की रपटों में आदर्श अपार्टमेंट घोटाला, नौसेना युद्ध रूम लीक कांड, कॉमन वेल्थ गेम्स घोटाले के कई मामले, 2जी स्पेक्ट्रम आवंटन घोटाला आदि शामिल है। पुस्तक में दिए गए परिचय के अनुसार प्रेम भाटिया ट्रस्ट ने 2010 में जोजी को भारत का सर्वश्रेष्ठ पॉलिटिकल रिपोर्टर चुना था। 2013 में उन्हें रामनाथ गोयनका जर्नलिस्ट ऑफ द ईयर अवार्ड मिला था।

हार्पर कॉलिन्स पबलिशर्स इंडिया द्वारा प्रकाशित यह किताब तीन हिस्से में है। पहला हिस्सा है द मिडिलमेन, दूसरा – द वेरी प्राइवेट प्राइवेट सेक्टर और तीसरा द बिग लीग। 10 वां और अंतिम अध्याय है अ हाउस फॉर मिस्टर अंबानी। दूसरा अध्याय आरके धवन और उनके जैसे लोगों पर है। नाम है – द माइटी टाइपिस्ट। तीसरा अध्याय है आर्म्स एंड द मिडिलमेन और चौथा द इनसाइडर्स एंड द आउटलॉज है। मैं अभी यही अध्याय पढ़ रहा हूं और यह पहले हिस्से का अंतिम अध्याय है। दूसरे हिस्से का पहला अध्याय बैटल फॉर द स्काईज है। यह भारत में निजी विमान सेवा से संबंधित है। मुझे नहीं लगता कि इस किताब के बारे में एक-दो बार और लिखे बगैर मैं रह सकूंगा। लेकिन अभी तो वो जो मौजूं है।

संबंधित अंश का अनुवाद, “हाल के वर्षों में जब कभी टैक्स हैवेन में शेल कंपनियों का ब्यौरा सार्वजनिक हुआ है, इस बात के पर्याप्त संकेत रहे हैं कि परम किस्म के मध्यस्थ तथा शक्तिशाली राजनीतिज्ञ अपने पैसे कैसे और कहां खपाते हैं और फिर कैसे इसे वापस भारत ले आते हैं। पनामा, लिखटेंसटाइन (Liechtenstein) या एचएसबीसी जीनिवा की गुप्त फर्मों और बैंक खातों के बारे में जो दस्तावेज सामने आए हैं उनसे इस बात के मोटे संकेत मिले हैं कि यह सब कैसे किया जाता है। सबसे शक्तिशाली मध्यस्थों और सरकारी खरीद तथा सार्वजनिक ठेकों के भ्रष्ट भारतीय लाभार्थियों की बड़ी कहानी अभी सामने आनी है। हालांकि, डिजिटल क्रांति निश्चित रूप से आने वाले वर्षों में और भी विशिष्ट जानकारियां सामने लाएंगी।

2016 के शुरू में जब मैं इस पुस्तक को अंतिम रूप दे रहा था तो नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में एक नई सरकार सत्ता में थी। उस समय तक कोई बड़ा घोटाला सामने नहीं आया था पर क्या होने वाला है इसके अशुभ संकेत हर ओर थे। विदेशी कारोबारी और प्रमुख कॉरपोरेट लीडर एक महत्वपूर्ण भाजपा नेता के बेटे का नाम दबी जुबान से ले रहे थे। ये अब एक प्रमुख सरकारी अधिकारी है। एक सौदे में वे स्पष्ट रूप से अनुचित दिलचस्पी ले रहे थे। वह दिन बहुत दूर नहीं लगता है जब हम एक दिन एक नए घोटाले की खबर सुनें। कौन जानता है?

नई दिल्ली स्थित सत्ता के गलियारे में एक ही निश्चितता रहती है कि करार कहीं हो रहा है और पेशेवर दलाल तथा राजनीतिक बिचौलिए इसकी पूरी तैयारी अच्छी तरह करते हैं। कौन का टैक्स हैवेन होगा, कितनी फर्जी कंपनियां, निर्यात या आयात फर्में, गैर सरकारी संगठन (एनजीओ) या ट्रस्ट होंगे, किसे क्या मिलेगा और किस अनुपात में। वे भारत में पारदर्शिता को बढ़ावा देने वाले तेजी से चल रहे डिजिटाइजेशन से निरंतर युद्धरत रहते हैं तथा लगातार और भी अच्छे उपायों की तलाश में रहते हैं ताकि अपनी अवैध कमाई प्राप्त करके संभाल सकें।”

कहने की जरूरत नहीं है कि यह तीन साल पहले लिखा गया था। इसमें नाम नहीं है पर स्पष्ट है कि मामला अजीत डोवाल से जुड़ा है। एक बड़ा घोटाला हाल में सामाने आया है। हो सकता है अभी कुछ और आए। पर मुद्दे की बात यह है कि लेखक ने 2016 में भांप लिया था पर “ना खाऊंगा ना खाने दूंगा” का दावा कर सत्ता में आए और “चौकीदार चोर है” के आरोपों के बावजूद दूसरों को चोर कहने वाले प्रधानमंत्री ना इसे रोक पाए, ना पकड़ पाए ना खुलासा होने पर कुछ क्रांतिकारी कहा या किया।

साभार: लेखक संजय कुमार सिंह वरिष्ठ पत्रकार और अनुवादक हैं। वाया-भड़ास4मीडिया